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दुनिया मेरे आगेः नाम पुराण

वेल्स में अदालत ने एक महिला को उसकी बेटी का नाम ‘साइनाइड’ (एक प्रकार का अति विषैला रासायनिक पदार्थ) रखने से रोक दिया है। निश्चय ही यह बहुत असाधारण चुनाव है।
Author October 17, 2016 02:08 am

महेंद्र राजा जैन

वेल्स में अदालत ने एक महिला को उसकी बेटी का नाम ‘साइनाइड’ (एक प्रकार का अति विषैला रासायनिक पदार्थ) रखने से रोक दिया है। निश्चय ही यह बहुत असाधारण चुनाव है। अपनी ओर से महिला का तर्क था कि यह बहुत ही सुंदर और प्यारा शब्द है, क्योंकि इस ड्रग का प्रयोग हिटलर ने खुदकुशी के लिए किया था और मेरे विचार से उसका ऐसा करना ठीक था। इस दलील को अदालत ने नहीं माना। लेकिन आजकल बच्चों के नाम जिस प्रकार रखे जा रहे हैं उसे देखते हुए ‘साइनाइड’ तो कम ही लगता है। किसी समय बच्चों के नाम रखना बहुत आसान माना जाता था। तब जान-पहचान के लोगों के कुछ चुने हुए नामों से जो आपको पसंद हो, वह रख दिया जाता था और कोई कुछ नहीं कहता था। लेकिन आजकल के माता-पिता अनन्य रूप से कुछ विशिष्ट नाम रखना चाहते हैं। इसलिए अंग्रेजी में रोलो, एमिलियो, रेफर्टी, ग्रे और उनकी बहनें औरेलिया, बार्तोलूमिया और प्लम जैसे नामों से जानी जाती हैं।

कुछ वर्ष पहले तक इंग्लैंड में तीन में से एक नाम ‘जॉन’ था। अब यह नाम ब्रिटेन के सौ सामान्य नामों की सूची में भी नहीं है। इसी प्रकार लड़कियों के दो सौ सामान्य नामों की सूची में ‘मेरी’ भी नहीं है। अब ‘मेरी’ की अपेक्षा लूना, जोया, स्कइलार जैसे नाम पसंद किए जाते हैं। 2014 में ब्रिटेन में केवल दस लोगों के नाम ‘ब्राउन’ रखे गए। अब कहा जा रहा है कि फूलों, शहरों और रंगों के नाम नहीं रखे जाने चाहिए, पर जानवरों और मौसम के नाम रखे जा सकते हैं। आजकल कुछ लोग तो कारों के नाम भी रखने लगे हैं, मसलन- निसान, स्कोडा, एस्टन। बल्कि ऐसा लगता है कि अब एक नई परंपरा ‘डोरोथी’ और ‘क्लिओपेट्रा’ जैसे नामों के स्थान पर इलेक्ट्रा, एस्मेरेल्डा, तालिया जैसे नाम रखने की शुरू हो गई है।

बच्चों के नाम रखने के संबंध में शायद इंटरनेट का प्रभाव पड़ा है। इंटरनेट ने आइ-डी में नामों के साथ संख्या जोड़ने की शुरुआत की थी। यूरोप में संयुक्त नाम तो बहुत समय से प्रचलित हैं, अब भारत में भी इस प्रकार के नाम शुरू हो गए लगते हैं। विवाह के बाद कुछ महिलाएं अपना पहला कुल-नाम बरकरार रखते हुए उसके बाद पति का कुल-नाम जोड़ लेती हैं, जैसे वंदना त्रिपाठी-मिश्रा। दूसरी ओर, सिखों में अक्सर नाम से लिंग का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। केवल ‘नवजोत’ से स्त्री-पुरुष का भेद नहीं मालूम होगा, जब तक कि उसके आगे कौर या सिंह न जोड़ा जाए। ऐसा लगता है कि सिखों से ही अंग्रेजों ने भी इस प्रकार के नाम रखना शुरू कर दिया है। ‘फॉर्च्यून’ शब्द से आप क्या समझेंगे- लड़का या लड़की? यह दरअसल दोनों में से किसी का भी नाम हो सकता है। प्रसिद्ध लेखक एवलिन वाघ की पहली पत्नी का नाम भी एवलिन था। जानी कैश ने अपने बेटे का नाम ‘सू’ रखा था जो परंपरागत रूप से लड़कियों का नाम माना जाता है। लेकिन लड़कों के इस प्रकार के नाम अभी ज्यादा प्रचलन में नहीं आए हैं। हालांकि लड़कियों के सेबेस्टियन, क्वेंटिन, मेक्सवेल जैसे नाम रखना शुरू हो चुका है जो परंपरागत रूप से पुरुषों के नाम माने जाते हैं। जब संवाद ई-मेल या ट्वीट के माध्यम से हो रहा हो तो कभी-कभी दूसरी ओर के व्यक्ति का जेंडर जाने बिना भी संवाद पूरा हो जाता है।

कहा जाता है कि इस प्रकार के नाम रखने का एक कारण लोगों में समाज में अपने को कुछ ऊंचा देखने का खयाल भी है। पहले उच्च अभिजात वर्गों में ही असामान्य नाम रखे जाते थे। यूरोपीय राज-परिवारों में नाम के आगे प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ रखने की प्रथा तो सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। अभिजात घरानों में नाम के आगे ‘सीनियर’ या ‘जूनियर’ लिखना भी सामान्य बात है। अब मध्यम वर्ग में भी यह प्रचलन शुरू हो गया है। बॉलीवुड के एक पटकथा लेखक ने अपने बच्चों के नाम बरखा, नदिया और गीत रखे हैं। हमारे एक परिचित ने हिटलर, बटलर और मटलर बिना इनके अर्थ जाने रख लिया।

मान्यता है कि नाम किसी व्यक्ति की भौतिक पहचान के साथ-साथ उसके आंतरिक गुणों और व्यवहार आदि का भी वर्णन करता है। हालांकि कुछ लोग बिना कुछ सोचे-समझे बच्चों के नाम रख देते हैं। कुछ लोगों के दो-दो नाम होते हैं- घर का नाम अलग और बाहर का नाम अलग। बच्चों के नाम और अर्थ वाले एक वेबसाइट पर एक लाख से अधिक भारतीय नामों के अर्थ, मूल और लोकप्रियता के संबंध में दिलचस्प जानकारी मिलती है। बर्बादी और तबाही लाने वाले चक्रवात, तूफानों आदि का भी विधिवत नामकरण किया जाता है। नरगिस, लैला, कैटरीना, नीलम, हेलेन, नीलोफर और सुनामी- ये सब पिछले वर्षों में दुनिया भर में आए समुद्री तूफानों के नाम हैं।

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