छवि के पैमाने

किसी व्यक्ति को देखने के हमारे पैमाने क्या होते हैं? उसके बारे में हमारी धारणा कैसे तय होती है और इस राय पर उसका अतीत कितना हावी होता है?.

किसी व्यक्ति को देखने के हमारे पैमाने क्या होते हैं? उसके बारे में हमारी धारणा कैसे तय होती है और इस राय पर उसका अतीत कितना हावी होता है? हम उसके वर्तमान को कैसे देखते हैं? इस तरह के तमाम सवाल हमारे सामने मूल्यांकन की मांग करते हैं, जब हम इस मसले पर विश्लेषण को थोड़ा विस्तार देते हैं। मैं एक मित्र के दफ्तर में जैसे ही भीतर गई तो वहां पहले से आपस में हंस कर बात करते हुए सभी लोग अचानक चुप हो गए। मैंने कहा- ‘अरे, आप लोग अचानक रुक क्यों गए!’ उनमें से एक ने मुझे बताया कि कंपनी का एक नया प्रोडक्ट आ रहा है और उसी की तैयारी चल रही है। लेकिन बात बस इतनी नहीं थी। दरअसल, कंपनी का एक नया प्रोडक्ट बाजार में आने वाला था, जिसके बारे में दावा था कि यह पुरुषों की काम-शक्ति बढ़ाता है। उसके विज्ञापन के लिए वे सनी लियोनी को मॉडल के तौर पर लेना चाहते थे। हंसी-मजाक का विषय यही था। मैंने यों ही कहा कि पुरुषों के उपयोग की वस्तु के लिए बतौर मॉडल आप सनी लियोनी को ही क्यों रखना चाहते हैं! अपनी कंपनी के दूसरे उत्पादों के लिए तो आप उसे मॉडल नहीं बनाते! फिर इस प्रोडक्ट के लिए किसी और को भी तो ले सकते हैं! उन्होंने मुस्कराते हुए कहा- ‘जब अगरबत्ती जैसा कुछ बनाएंगे तो किसी और को लेंगे! अभी प्रोडक्ट के हिसाब से सनी ही सूट करेगी!’

किसी की स्थापित हुई या की गई छवि हमारे दिमाग में जब स्थिर हो जाती है तो हम उस व्यक्ति विशेष के बारे में उससे परे शायद कुछ नहीं सोच पाते। आज सनी लियोनी मुख्यधारा के सिनेमा में लगातार काम रही हैं। लेकिन अपनी उस पुरानी छवि से मुक्त नहीं हो पा रही हैं, जिसमें उन्हें सिर्फ एक खास नजरिये से देखा जाता था। मुंबइया मुख्यधारा की फिल्मों में उनके लिए वैसी ही भूमिकाएं लिखी जा रही हैं, जिनमें उनकी भूमिका शरीर या यौन-दृश्यों के इर्द-गिर्द घूमती हो। बल्कि उनकी भूमिकाओं में अंग प्रदर्शन की गुंजाइश जबरन भी बनाने या ठूंसे जाने की कोशिश साफ दिखती है। फिल्मों से इतर उन्हें विज्ञापनों में भी ऐसी ही भूमिकाएं मिल रही हैं जो या तो कंडोम या पौरुष यौन शक्तिवर्धक दवाइयों के विज्ञापन होते हैं या समाज में पसरी यौन कुंठाओं को आकर्षित करने वाली।

यानी अपनी छवि के साथ खुद सनी एक ‘कामुक प्रोडक्ट’ के तौर पर सिमट कर रह गई हैं। अश्लील फिल्मों की दुनिया छोड़ने के बाद भी उन्हें ऐसे काम मिल रहे हैं जो उनकी उसी पुरानी छवि को भुनाते हैं। उनके नाम पर चुटकुले बनते हैं और रस लेकर बातें की जाती हैं। बाजार भी दरअसल समाज के माइंडसेट यानी सोचने-समझने के नजरिए को ही बेचता है! यहां मकसद सनी लियोनी के प्रति सहानुभूति जताना नहीं है। लेकिन यह सच है कि अपने आसपास के समाज में भी हम किसी स्त्री के बारे में कुछ पूर्व निर्धारित छवियां अपने दिमाग में बैठा लेते हैं और उसका आकलन उसी के अनुसार करते हैं। मसलन, अगर कोई लड़की सिगरेट या शराब पीती है तो वह बहुत ‘बोल्ड’ है और कुछ भी कर सकती है; उसका चरित्र ठीक नहीं है और वह आसानी से सबके लिए ‘उपलब्ध’ है; अगर किसी लड़की का तलाक हुआ है तो फिर उसमें ही कोई कमी होगी; किसी बड़े शहर में नौकरी करती है, अकेली रहती है तो उसके तमाम पुरुष मित्र होंगे…! इस तरह की तमाम बातें अपनी ओर से जोड़ दी जाती हैं।
किन्हीं वजहों से किसी स्त्री की कोई खास छवि रूढ़ हो जाती है या कर दी जाती है, तो वही उसके बाद के कामों पर भी हावी रहती है। लेकिन अगर किसी स्त्री ने पहले के जीवन में कोई बड़ी उपलब्धि हासिल की हो और बाद में उसकी नकारात्मक छवि सामने हो तो उसके पहले के जीवन को याद नहीं किया जाता। यहीं समाज की दोहरी और स्त्री-विरोधी मानसिकता खुल कर सामने आती है।

कुछ समय पहले मेरी एक मित्र का विवाह के लिए रिश्ता तय होते-होते रह गया। वजह यह थी कि लड़के ने अपने घर से दूर शहर में अकेली रहने के करण उसके चरित्र पर शक जताया था। उसके पुरुष मित्रों के बारे में बहुत छानबीन की। मेरी मित्र ने इसे अपना अपमान समझा और ऐसे शक्की व्यक्ति से नाता तोड़ना बेहतर समझा। लेकिन समाज इस रिश्ते के नहीं हो पाने की वजह क्या समझेगा? जाहिर है, वह इसके लिए स्त्री के बारे में बनी-बनाई पूर्व धारणा के हिसाब से यह कहते हुए मेरी मित्र को ही कठघरे में खड़ा करेगा कि अगर लड़की के चरित्र में कोई खोट नहीं था तो उसे लड़के को जांच करने देना चाहिए था। लेकिन क्या कोई पुरुष अपने बारे में इसी तरह की जांच करने या अपने अकेले रहने के चलते चरित्र पर सवाल उठाने को लेकर सहज रहेगा? जब तक यह माइंडसेट बना रहेगा, पलेगा-बढ़ेगा, तब तक हम समानता आधारित समाज की कल्पना नहीं कर सकते।

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