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दुनिया मेरे आगेः विश्वास का संकट

पिछले कुछ दिनों से व्यक्तिगत काउंसिलिंग करते हुए कुछ ऐसे अनुभव हुए, जिन्हें जयपुर में कुछ समय पहले हुई आत्महत्या की चार घटनाओं के साथ कारणों के संदर्भ में जोड़ा जा सकता है।

Author Updated: January 7, 2017 2:48 AM
प्रतीकात्मक फोटो

ज्योति सिडाना  

पिछले कुछ दिनों से व्यक्तिगत काउंसिलिंग करते हुए कुछ ऐसे अनुभव हुए, जिन्हें जयपुर में कुछ समय पहले हुई आत्महत्या की चार घटनाओं के साथ कारणों के संदर्भ में जोड़ा जा सकता है। मेरे काउंसिलिंग के प्रकरण धन और प्रतिष्ठा वाले मध्यवर्गीय परिवारों से जुड़े हैं, जिनमें पति और पत्नी के बीच विश्वास संबंधी संकट है। लेकिन आश्चर्य यह है कि दोनों के पास सवाल एक ही है- क्या वे एक-दूसरे के मित्र नहीं हो सकते! यह दरअसल परंपरा और आधुनिकता का संघर्ष है। परंपरा की दृष्टि से भारतीय परिवारों में पति-पत्नी के संबंध संस्तरणमूलक और पुरुषसत्तात्मक हैं, जबकि आधुनिक संदर्भ में मित्रता दरअसल समानता और स्वतंत्रता का परिचायक है। ये दोनों संबंध एक-दूसरे के साथ आदर्श रूप में जुड़ने चाहिए। पर असमानता और पुरुष-सत्ता कहीं न कहीं विश्वास का संकट उत्पन्न करती है। यह संकट उस समय और अधिक गहरा हो जाता है, जब पत्नी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो या पति ऐसे पेशों का हिस्सा हो, जहां पुरुष और महिलाएं दिन में लंबे समय तक साथ काम करते हैं और आपसी बातचीत में अनौपचारिक घनिष्ठता को किसी न किसी रूप में व्यक्त करते हैं। विश्वास का यह संकट भावनात्मक हिंसा का रूप लेते हुए पता नहीं कब शारीरिक हिंसा में परिवर्तित हो जाता है। असल में स्त्री-पुरुष की समानता संविधान के मूल्य के साथ-साथ सार्वजानिक स्पेस में प्रभावी तरीके से स्थापित हुई है या फिर इसे स्वीकृति मिली है। मगर पारिवारिक संबंधों और नातेदारी के संबंधों में यह समानता दूर-दूर तक नहीं है। इसीलिए पारिवारिक और सार्वजनिक स्पेस की इस टकराहट ने भावनात्मक और शारीरिक हिंसा को व्यापक कर दिया है।

जयपुर की आत्महत्या की उन घटनाओं को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। पहली घटना में राजस्थान पुलिस सेवा के एक अधिकारी ने महिला मित्र के द्वारा की जाने वाली ब्लैकमेलिंग को आधार बना कर खुद को और महिला मित्र को गोली मार दी। इसके अलावा, तीन अलग-अलग घटनाओं में करोड़पति परिवार से संबद्ध तीन व्यापारियों ने पुत्र और पत्नी से परेशान होकर या शारीरिक हिंसा के कारण आत्महत्या कर ली। ये प्रकरण विघटित होते परिवार या तनाव और हिंसा के साथ जूझते परिवार के उभार की बानगी भर हैं। आज ज्यादातर परिवारों से बातचीत के दौरान कुछ ऐसा जरूर उभरता है जिससे लगता है कि वहां सब कुछ ठीक नहीं है। कोई न कोई संबंध ‘विश्वास के संकट’ का शिकार है।

कुछ लोग कहते हैं कि भावनात्मकता और पारस्परिक देखभाल की प्रवृत्ति कम हो रही है, तो कहीं ऐसा लगता है कि आवश्यकताओं की पूर्ति के अनेक संसाधनों को महज जुटा देना परिवार के कामकाजी सदस्यों का एकमात्र दायित्व रह गया है। क्या परिवार का यह बिखराव आर्थिक उदारवाद की एक अनिवार्य सामाजिक परिणति है या फिर राज्य द्वारा बनाए गए अनेक कानूनों के कारण कुछ ऐसी चर्चा होने लगी है जो पारस्परिक सद्भाव के लिए उपयोगी नहीं हैं? प्रौद्योगिकी के तीव्र विकास औए मीडिया के व्यापक प्रभाव ने संदेह को जन्म देकर एक-दूसरे पर निगरानी रखे जाने के मनोविज्ञान को जन्म दिया है। या फिर भौतिक समृद्धि ने व्यक्ति को परिवार में इतना एकाकी बना दिया है कि अचानक उत्पन्न होने वाला कोई भी तनाव उसे आत्महत्या करने या दूसरे सदस्य की हत्या करने की ओर ले जा सकता है। इनका उत्तर परंपराओं से तलाशा जाए या आधुनिकता से, एक ऐसा पक्ष है जो यह स्थापित करता है कि चेतना और परिवार दोनों ही वर्तमान में संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं। इसलिए उत्तर इतना आसान नहीं है जितना धारावाहिक आभासी यथार्थ के रूप में दिखाया जाता है।
दरअसल, निजीकरण ने आर्थिक क्षेत्र में सामूहिक हितों को आगे बढ़ाने वाले सार्वजनिक उद्योगों को तबाह किया है।

वहीं सामाजिक संबंधों और संस्कृति के क्षेत्र में निजित्व में खुद को स्थापित कर परिवार के सदस्यों ने सामूहिक हितों की उपेक्षा की है। जबकि उदारीकरण ने एक तरफ आर्थिक प्रणाली में नियमों को न्यूनतम किया, वहीं पारिवारिक क्षेत्र में नियमों के उल्लंघन के प्रति सहनशीलता या उपेक्षा को जन्म दिया है। परिवार के सदस्य ऐसे एकाकी और स्वकेंद्रित होते गए हैं, जहां व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान के प्रति इतना अधिक सजग हो जाता है कि वह उन सबके अस्तित्व को मानने से इनकार कर दे, जिनके जरिए वह इस स्थिति में पहुंचा है। इन विसंगतियों ने निम्न वर्ग में हत्या और उच्च वर्ग में आत्महत्याओं को जन्म दिया है।

वैश्वीकरण ने संस्कृति की बहुस्तरीयता को जन्म दिया है। गांव, कस्बा, नगर, महानगर और यहां तक कि जनजातीय गांव भी इस संस्कृति समरूपीकरण के प्रभावों को महसूस कर रहे हैं। इतना जरूर है कि यह प्रभाव विविधतामूलक है। हत्या और आत्महत्या अब सभी क्षेत्र में है, जिन्हें कहीं न कहीं नव्य-उदारवाद, बाजार कट्टरतावाद और उपभोक्तावाद के अंतर्गत मूल्यांकित करना जरूरी है। शायद अर्थशास्त्र में हत्या के कारकों और आत्महत्या के क्षेत्र में दुर्खीम के सिद्धांतों की पुनर्व्याख्या का समाजशास्त्रीय अवसर आ चुका है।

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