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परंपरा की किरचें

जब हर तरफ घनघोर अंधकार हो तो उस समय मद्धिम लौ के साथ टिमटिमाता एक दीया भी मनुष्य को अंधेरे के आगोश से निकालने का माद्दा रखता है।

सांकेतिक फोटो।

संगीता सहाय

जब हर तरफ घनघोर अंधकार हो तो उस समय मद्धिम लौ के साथ टिमटिमाता एक दीया भी मनुष्य को अंधेरे के आगोश से निकालने का माद्दा रखता है। आवश्यकता बस इतनी होनी चाहिए कि इंसान उस दीये के हल्के उजास पर भी विश्वास रखे और अपने कदम सही दिशा में बढ़ाता जाए। कुछ दिन पहले मेरी एक अजीज मित्र कोरोना से ग्रसित हो गई और तमाम कोशिशों के बावजूद हम सबको छोड़ कर चली गई। उसके दोनों बच्चे काफी दिनों तक उससे उबर नहीं सके। उन्हें घर पर ही एकांतवास में रखा गया था।

चूंकि मैं खुद इस स्थिति में नहीं थी कि वहां जा पाऊं, इसीलिए बहुत चिंतित थी कि पता नहीं कैसे मेरी दोस्त के पति एक साथ बीमार बच्चों की तीमारदारी और मृत्यु के बाद किए जाने वाले विस्तृत विधि आदि को पूरा करेंगे। बड़ी बात यह भी थी कि वे इन नियमों और परंपराओं को बहुत मान देते थे, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से लोगों के काफी समझाने-बुझाने पर उन्होंने इस दौरान किए जाने वाले कर्मकांडों को अत्यंत कम समय, कम खर्च और गिने-चुने लोगों के बीच ही पूरा किया और साथ-साथ अपने बीमार बच्चों की देखभाल भी करते रहे।

ऐसी ही स्थितियां मैंने कई अन्य परिवारों में भी देखीं। ग्रामीण इलाकों से भी ऐसी कुछ खबरें मिली हैं। महामारी की भयावहता और मौत के मातम के बीच भी कुछ बातों ने मुझे गहन अंधकार के बीच रोशनी फैलाने को आकुल टिमटिमाते दीये का एहसास कराया। वास्तव में मृत्यु शाश्वत है। अकाल नहीं, पर जो आया है, उसे जाना ही है। काश मृत्यु के दुख के चरम के इस हालात में मृत्यु के बाद किए जाने वाले पेचीदे और खर्चीले कर्मकांडों और मृत्युभोजों की भी समाप्ति हो जाए। यह परंपरा, अंधविश्वास और झूठे सम्मान के नाम पर लाखों परिवारों को गरीबी, बर्बादी और कर्ज के दलदल में डुबो देता है।
हमारा भारत परंपराओं, नियमों और रिवाजों के छोटे-बड़े मनकों के आधार पर चलने वाला देश है।

सदियों से चली आ रही अनगिनत अलिखित रीतियां आज भी समाज के संचालन का आधार बनी हैं। इन रीतियों ने समाज को बनाने, बढ़ाने, सजाने और इसमें रंग और जीवंतता भरने में अहम भूमिका निभाई है। पर कुछ रिवाज ऐसे भी हैं जो आरंभ से ही अपनी तमाम खामियों, महत्त्वहीन गतिविधियों के बावजूद हमारे बीच उपस्थित है। ऐसा ही एक रिवाज है परिजनों की मृत्यु पर उनका कथित परलोक सुधारने और आत्मा की शांति के नाम पर किया जाने वाला कर्मकांड और मृत्युभोज।

गौरतलब है कि प्राचीन भारत में मृत्यु पर किए जाने वाले कर्मकांड का उद्देश्य मृतक के अपनों को मृत्यु की कठोर सच्चाई से अवगत कराना और शांतिपाठ, हवन आदि के जरिए घर के वातारण में बदलाव और उसमें सात्विकता का संचार करना माना जाता था। लेकिन वे सामान्य प्रक्रियाएं और प्रथाएं कब और कैसे कट्टरता, दिखावा और कुछ चालाक लोगों की कमाई का जरिया बन गर्इं, गरीबों को और गरीब या निम्न मध्यवर्ग को कर्जदार बनाने लगी, लोग यह समझ भी नहीं पाए।

हमारे धार्मिक ग्रंथों में ‘तेरहवीं के भोज’ और उस अवसर पर वस्तुओं के दान आदि का जिक्र नहीं मिलता है। किसी भी धर्मग्रंथ में मृत्युभोज का विधान नहीं है। ‘महाभारत’ के अनुशासन पर्व में लिखा है कि, ‘मृत्युभोज खाने वाले की ऊर्जा नष्ट हो जाती है।’ जिस परिवार में मृत्यु जैसी विपदा आई हो उसके साथ इस संकट की घड़ी में जरूर खड़े हों और तन, मन, धन से सहयोग करें। लेकिन बारहवीं या तेरहवीं पर होने वाले मृत्युभोज में भाग न लें। महाभारत के युद्ध के दौरान कृष्ण लड़ाई रोकने के लिए दुर्योधन के पास जाते हैं।

वहां दुर्योद्धन द्वारा उनसे भोजन के लिए आग्रह करने पर वे कहते हैं- ‘संप्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुनाई:’, यानि ‘जब भोजन खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो, जब भोजन करने वाले का मन प्रसन्न हो, तभी भोजन करना चाहिए। जब खिलाने वाले और खाने वाले दोनों के दिल में दर्द हो तो कतई भोजन नहीं करना चाहिए।’ हमारे महान मनीषियों यथा, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी आदि सबों ने मृत्युभोज और मिथ्या कर्मकांडों का विरोध किया था।

सबसे अफसोस की बात यह है कि हममें से ज्यादातर इस कुप्रथा से होने वाली हानियों और इससे जुड़े नकारात्मक तथ्यों पर गौर भी नहीं करते। बल्कि इन्हें एक सामान्य प्रक्रिया मान कर सहजता से अपनाए हुए हैं। कुछेक लोग जो इसकी खामियों को जानते-समझते हैं, वे भी सिर झुकाए, चुप्पी साधे झूठी सामाजिकता के नाम पर इसे स्वीकार किए हुए हैं।

सामाजिक दबाव, मिथ्या भय, मन की शांति आदि के नाम पर इस प्रथा को खाद-पानी देने वाले लोगों को सोचना होगा कि हमारे पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था को यह प्रथा किस प्रकार चोटिल कर रहा है। यह आवश्यक है कि पढ़े-लिखे समझदार और जागरूक लोग इस कुप्रथा से उपजने वाली विसंगतियों और हानियों पर चर्चा करें और इस पर आवाज उठाएं। बदलाव की शुरुआत अपने घर से करें। यों राजस्थान में इसकी पहल हो चुकी है। शुरुआत में कुछ लोगों की यह कोशिशें शेष लोगों तक भी पहुचेंगी और बदलाव का बयार साबित होंगी।

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