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दुनिया मेरे आगे: खुलना भीतर के तालों का

यह वक्त गुजर जाएगा। यकीनन हम वापस अपनी-अपनी जिंदगी में लौट आएंगे। सब पहले जैसा हो जाएगा। लेकिन वह क्या हमें सब पहले जैसा ही चाहिए? क्या हमें पहले से बेहतर दुनिया नहीं चाहिए? मेरी एक दोस्त कहती है कि आपदा का यह समय बीत जाने के बाद अगर हम बचे रह जाएं और हम एक बदले हुए मनुष्य न हों तो मरना बेहतर है। सच ही तो कहती है वह।

Author Published on: April 8, 2020 5:25 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रतिभा कटियार
अरसे बाद सुबहों को सुन पा रही हूं। शामों में जो एक धुन होती है न शांत-सी, मीठी-सी, उसे गुनगुना पा रही हूं। चाय की मिठास में पंछियों की चहचहाहट घुल रही है। वक्त के पीछे भागते-भागते वक्त का कोना भूलने लगे थे हम शायद। आज वक्त मिला है खुद को समझने का है। अपने आप से बात करने का है। सोचने का कि मशीन की तरह यह जो हम भागते जा रहे थे, उसके मायने क्या थे आखिर। द्वेष, ईर्ष्या, बैर इन सबका अस्तित्व क्या है आखिर। जीवन बहुत कीमती है। इसे प्यार करना, लम्हों को युगों की तरह जीना, लोगों को अपने होने से बेहतर महसूस करवा सकना और क्या?

इससे बात करना पसंद नहीं, उसने ऐसा क्यों कहा, वह ऊंचा है, वह फलां धर्म का है, मैंने तो हमेशा सबके लिए अच्छा किया, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ..! जैसे जाने कितने खयाल हैं जो हमें बेहतर मनुष्य होने से रोकते हैं। जाहिर है, ये खयाल हम लेकर तो नहीं जन्मे थे, ये सब यहीं मिले हमें सामाजिकता, दुनियादारी के टीकाकरण (वैक्सिनेशन) के बाद। हम वह विचार और व्यवहार अपना समझ कर ढोने लगे, जो न हमारे थे, न हमारी पसंद थे। तो हम अपने भीतर किसी और को जी रहे हैं इतने बरसों से?

यह मुश्किल वक्त हमसे कुछ कहने आया है। इतना विनाशकारी वायरस भी हमें कुछ सिखा रहा है कि वह हमें सिर्फ मनुष्य के तौर पर पहचानता है। उसके लिए इस बात के कोई मायने नहीं कि आप किस देश के, किस राज्य के, धर्म के, जाति के हैं। कौन से ओहदे पर हैं और क्या सामाजिक-आर्थिक हैसियत है आपकी! उसके लिए हमारा मनुष्य होना ही काफी है! और इधर हम न जाने कितने खांचों में बंटे हैं! एक पिघलन-सी महसूस हो रही है भीतर। जी चाहता है कि अपने सब जानने वालों से जोर-जोर से बोलूं कि उनसे प्यार है। सबसे माफी मांग लूं कि कभी दिल दुखाया हो शायद मैंने। कहूं कि देखो न आज गले भी नहीं मिल सकते और गले मिलने के वे सारे लम्हे जब पास थे, हमने उन लम्हों को झगड़ों में गंवा दिया।

यह वक्त हमें वह सिखाने आया है जो सीखने के लिए लोग न जाने कितने पुस्तकालयों की खाक छानते रहे, कितने वृक्षों के नीचे धूनी जमाने के लिए भटकते रहे। मनुष्यता का पाठ। हाल ही में हमने आग देखी है, बर्बर हिंसा देखी है। हिंसा बाहर बाद में आती है, पहले वह भीतर जन्म लेती है। वह किसी भी बहाने बाहर फूट पड़ने को व्याकुल होती है। यह समय अपने भीतर की उस हिंसा को समझने का है, उसे खत्म करने का है।

यह वक्त गुजर जाएगा। यकीनन हम वापस अपनी-अपनी जिंदगी में लौट आएंगे। सब पहले जैसा हो जाएगा। लेकिन वह क्या हमें सब पहले जैसा ही चाहिए? क्या हमें पहले से बेहतर दुनिया नहीं चाहिए? मेरी एक दोस्त कहती है कि आपदा का यह समय बीत जाने के बाद अगर हम बचे रह जाएं और हम एक बदले हुए मनुष्य न हों तो मरना बेहतर है। सच ही तो कहती है वह।

यह वक्त अपने भीतर नमी को सहेज लेने का है, उन सबके प्रति प्रेम से भर उठने का, जिनके प्रति कभी भी जरा भी रोष रहा हो। क्या होगा इस हिसाब-किताब का कि किसने क्या कहा, किसने क्या किया!

अपने भीतर के विन्रमता के पौधे को, मनुष्यता के पौधे को खूब खाद-पानी देने का समय है। जी भर कर रो लेने का, प्यार से भर उठने का समय है। यह समझने का भी कि हमारे ईश्वर, अल्लाह, नानक ने हमें हमारे ही हवाले किया है, हमारी चेतना और संवेदना के हवाले। सोचना है कि हम उनके नाम पर कर क्या रहे हैं। सामाजिकता ने हमारे भीतर जो खांचे बनाए हैं, जिनमें न जाने कब से हम अनजाने ही घरों में बंद हैं, उनसे खुद को मुक्त करना है। हम बेहतर मनुष्य होकर लौटेंगे और ज्यादा ऊर्जा और सकारात्मकता से काम पर जाएंगे। अपने भीतर पनप रहे नकारात्मकता के वायरस को खत्म करके हाथ भी मिलाएंगे, गले भी मिलेंगे। यकीनन इस बार हम पहले से बेहतर मनुष्य होकर मिलेंगे।

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