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दुनिया मेरे आगे: उत्सवों के उदास रंग

कोरोना ने इस बार न तो महाराष्ट्र के मुंबई में ठीक से मशहूर गणेश पूजा उत्सव ही मनाने दिया, न उत्तर प्रदेश के ब्रज में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और न ही पश्चिम बंगाल के कोलकत्ता में दुर्गा पूजा।अब यही माना जा रहा है कि बिहार का प्रमुख पर्व छठ भी सांकेतिक तरीके से ही मनाया जाएगा।

Author Updated: October 30, 2020 12:45 AM
होली का उत्‍सव मनाते लोग। फाइल फोटो।

मनोज कुमार मिश्र

अपने देश में साल भर त्योहार चलते ही रहते हैं, लेकिन रक्षाबंधन से गंगा दशहरा तक एक के बाद एक अनेक पर्व आते हैं। मगर इस साल कोरोना महामारी ने उत्सवों के अपने देश को बेरंग कर दिया। दिल्ली की रामलीलाएं भी अछूती नहीं रहीं। इसी के चलते शायद अब दीपावली भी ठीक से नहीं मनाई जा सकेगी। अपने देश में यह महामारी होली से पहले आ गई थी और रंगों के इस त्योहार को बेरंग कर गई थी।

होली एक-दूसरे से मिलने का ही पर्व है, जबकि महामारी ने आपस की दूरी बढ़ा दी। यों शायद ही कोई दिन ऐसा होता हो, जब देश के किसी कोने में कोई न कोई पर्व नहीं मनाया जाता हो। लेकिन कुछ पर्व समाज और प्रदेश की पहचान बन गए हैं।

कोरोना ने इस बार न तो महाराष्ट्र के मुंबई में ठीक से मशहूर गणेश पूजा उत्सव ही मनाने दिया, न उत्तर प्रदेश के ब्रज में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और न ही पश्चिम बंगाल के कोलकत्ता में दुर्गा पूजा।अब यही माना जा रहा है कि बिहार का प्रमुख पर्व छठ भी सांकेतिक तरीके से ही मनाया जाएगा। इन हिंदू त्योहारों के अलावा ईद, बकरीद, क्रिसमस आदि अनेक पर्व कोरोना की भेंट चढ़े या चढ़ेंगे। इन त्योहारों से धार्मिक और सामाजिक मान्यताएं तो जुड़ी हैं ही, लाखों लोगों के रोजगार भी जुड़े हैं।

मुगल काल से दिल्ली की पहचान बनी रामलीलाएं आम जन से जुड़ी हुई थीं। तब दिल्ली केवल आज की पुरानी दिल्ली थी। आधुनिक दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पिछले साल तक करीब दो हजार रामलीलाएं होती थीं। मगर इस बार दिल्ली के गिने-चुने इलाके में सांकेतिक रामलीला ही हुई। यानी पहली बार रामलीला ठीक से नहीं हो पाई।

जिस तरह से कोलकता आदि में दुर्गा पूजा विसर्जन से ही अगले साल के पूजा की तैयारी शुरू हो जाती है, उसी तरह दिल्ली और आसपास के इलाके में रावण दहन के लिए बड़े पुतले बनाने की होड़ लगती है और भरत मिलाप समाप्त होते ही अगले रामलीला के आयोजन की तैयारी शुरू हो जाती है। गणेश पूजा, छठ आदि की तैयारी भी एक पूजा समाप्त होते ही दूसरे के लिए होने लगती है। दुर्गा पूजा और रामलीला ही नहीं, अमूनन हर पर्व के आयोजक अपने स्तर पर साल भर तैयारी में लगे रहते हैं।

पहले के जमाने में शादी के लिए लड़का-लड़की देखने का काम भी कई बार रामलीला के मेले में ही होता था। पहले लड़की देखने के बाद शादी करना अनिवार्य था, इसलिए लोग बिना सार्वजनिक किए रामलीला के मेले में भी लड़की पसंद करते थे। दूसरे पर्दा प्रथा के चलते महिलाओं को घरों से निकलने का मौका कम मिलता था। इसलिए महिलाओं को खासतौर पर रामलीला का इंतजार रहता था। मगर अब परिवार की पाबंदियां खत्म हो गर्इं, हर इलाके में मॉल-बाजार हैं, जहां मनचाही चीजें और मिलने-मिलाने के मौके उपलब्ध हैं।

इसके बावजूद इन कामों के लिए रामलीला का आकर्षण कम नहीं हुआ है। लेकिन अब अपने इलाके के अलावा मनचाहे स्थान पर रात को रामलीला देखने और घर वापस आना भी एक चुनौती से कम नहीं है। शायद इन्हीं सब वजहों से इस बार बहुत सारे लोगों ने पिछले सालों के आयोजनों को ही याद करके अपने मन को मनाने का प्रयास किया।

हर पर्व की तरह पिछले कुछ दशकों से रामलीला का आयोजन भी राजनीति और दिखावे का प्रतीक बन गया है। पहले पुरानी दिल्ली की रामलीला में देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और आला नेताओं को बुला कर रावण दहन कराने की परंपरा-सी बन गई थी। लेकिन इस बार बड़ी रामलीलाएं नहीं हुर्इं। इसीलिए कुछ रामलीला के आयोजकों ने अन्य नेताओं से रावण जलवाने की औपचारिकता पूरी करार्इं।

इसके अलावा, लोकप्रियता हासिल करने के लिए आर्थिक संसाधनों के बूते फिल्मी कलाकारों आदि को भी लीला में बुलाया जाता रहा है। एक-एक आयोजन पर लाखों रुपए खर्च कए जाते हैं। मगर इस बार कोरोना ने सारे आयोजनों पर पानी फेर दिया।

रामलीला का आयोजन मुख्य रूप से उत्तर भारत में ही होता है। लेकिन दीपावली देश भर में मनाई जाती है। उसके दो दिन बाद भाई दूज और छह दिन बाद छठ महापर्व मनाया जाता है। यह पर्व बिहार से शुरू होकर अब देश के दूसरे राज्यों और विदेशों तक में पहुंच गया है। फिलहाल महामारी की मार के चलते शायद इस बार छठ सांकेतिक रूप से ही मनाया जाए। हमारे देश में अमूमन सभी त्योहार धार्मिक आस्था से अधिक अपने समाज की पहचान बन गए हैं।

लेकिन कोरोना की वजह से उसमें उत्साह और तीव्रता कम हुई है। इस महामारी ने पूरे देश और दुनिया के लोगों को अपने दायरे में समेट दिया है। हर आदमी इससे डरा हुआ है। बेरोजगारी, आर्थिक मंदी ने देश-दुनिया को लाचार बना दिया है। शायद सौ साल पहले प्लेग और स्पेनिश फ्लू के समय भी ऐसे ही हालात रहे होंगे।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री भी बताया कि इस साल जिस केरल में कोरोना का मामला सबसे पहले रिपोर्ट किया गया, उसने सबसे पहले कोरोना को काबू में किया। लेकिन ओणम पर्व मनाने के लिए राज्य में जुटी भीड़ की वजह से केरल में फिर से कोरोना के मामले बढ़ने की खबरें आ रही हैं। इसीलिए जरूरी है कि पर्व-त्योहार घर में मनाएं। जान बचेगी तो आस्था भी बचेगी।

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