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दुनिया मेरे आगे: भरोसे की रोशनी में

मौजूदा दौर में महामारी के संकट ने हमें जितनी आर्थिक चोट पहुंचाई है, उससे कई गुना ज्यादा हम मानसिक और भावनात्मक आघात झेल रहे हैं। अर्थव्यवस्था आज नहीं तो कल पटरी पर दौड़ेगी ही, लेकिन खौफ का जो मंजर मन में बैठ गया है और जिस तरह हमारी दिनचर्या से लेकर सामाजिक आचार-व्यवहार में बदलाव आ रहा है, उनकी पकड़, पता नहीं कब ढीली होगी।

Author November 4, 2020 3:07 AM
देश में कोरोना फैलने से सांस्‍कृतिक एवं पर्यटन कार्य प्रभावित।

गुलाबी ठंडक के साथ ही देश में त्योहारों और शादियों के मौसम ने दस्तक दे दी है। त्योहार और घर में मांगलिक कार्यक्रम दोनों ही परिवार और समाज की रीढ़ को मजबूत करते हैं। आपसी प्रेम और सहयोग को सुदृढ़ करते रीति-रिवाज और परंपराएं इस समाज की प्राण शक्ति हैं। मगर दशकों बाद यह ऐसी ठंड है, जब किसी भी उत्सव के लिए मन में वह उत्साह नहीं दिख रहा जो वास्तव में होना चाहिए। हमने अपने दिमाग को डर की एक ऐसी चारदिवारी में कैद कर लिया है, जिसमें घुप्प अंधेरा ही अंधेरा है। मन में उत्साह की जगह अवसाद पनप रहे हैं और मांगलिक गीतों की जगह भय की चीख है।

मौजूदा दौर में महामारी के संकट ने हमें जितनी आर्थिक चोट पहुंचाई है, उससे कई गुना ज्यादा हम मानसिक और भावनात्मक आघात झेल रहे हैं। अर्थव्यवस्था आज नहीं तो कल पटरी पर दौड़ेगी ही, लेकिन खौफ का जो मंजर मन में बैठ गया है और जिस तरह हमारी दिनचर्या से लेकर सामाजिक आचार-व्यवहार में बदलाव आ रहा है, उनकी पकड़, पता नहीं कब ढीली होगी।

रामलीला न होने से कहीं सैकड़ों साल की परंपराएं टूट गर्इं तो कहीं घरों में कन्या-भोज से लेकर दुर्गा-पंडालों की व्यवस्थाएं बदली नजर आईं।
कितने अनुनय-विनय और आग्रह के बाद भी इस बीमारी के डर से लोगों ने अपनी बच्चियों को कन्या-भोज में पड़ोस तक में जाने नहीं दिया। पिछले वर्ष तक नन्ही बच्चियों की टोलियां पूरे मोहल्ले में घूमती थीं, चाहे आमंत्रण हो या ना हो! मगर आज स्थितियां एकदम विपरीत हैं।

छोटे बच्चे जो मेले के नाम पर दो दिन पहले से ही खरीदारी की सूची बनाते थे इस बार मायूस दिखे। मैंने ऐसे घर भी देखे, जहां परिवार बच्चों को बाहर घुमाने ले जाना चाहता था, पर बच्चे खुद तैयार नहीं हुए। कारण पूछने पर अधिकतर ने यही कहा कि आॅनलाइन कक्षा में मेरी शिक्षक ने जाने से मना किया है या वह खुद खबरें और विज्ञापन देख कर सहमे से लगे। मन-मस्तिष्क पर कोरोना की यह मार सबसे घातक और लंबी चलने वाली है।
मनुष्य सामाजिक प्राणी है।

समाज के इतर या तो वह दैवीय गुणों का धारक होता है या फिर दानवी दोषों को वहन करता है। घरेलू हिंसा के बढ़ते वारदात और अवसाद के लपेटे में आता व्यक्ति नकारात्मक ऊर्जा को ही प्रतिबिंबित कर रहा है। यह सच है कि इस बीमारी को हम महामारी के रूप में जानने लगे हैं और और सतर्कता भी बेहद जरूरी है। मगर जितनी मारक क्षमता इस बीमारी में नहीं है, उससे ज्यादा तो हमने खुद आत्मशक्ति को मार डाला है। दुनिया भर से ऐसे संदेश आ रहे हैं कि हमें इस वायरस के साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। वैसे भी हम लाखों जीवाणुओं और कीटाणुओं के साथ लाखों वर्ष से पता नहीं कितनी पीढ़ियों से जी ही रहे हैं।

उनमें से कई कोरोना से भी ज्यादा घातक हैं। लेकिन मनुष्य ने और दूसरे जीवों ने या तो उन सबका सामना किया है, उन्हें कमजोर करके जीवन क्षमता हासिल की है या फिर उनके साथ अपने जीवन को सहज कर लिया है।

जीवन अनमोल है। इसके प्रत्येक क्षण में सकारात्मक प्राणवायु का संचार होना चाहिए। यह बीमारी भी ‘इम्यून सिस्टम’ यानी शरीर के रोगों के प्रति प्रतिरोध करने की क्षमता या उसके स्तर पर ही टिका है। बहुत साधारण और साबित हुई बात है कि अगर हम अवसाद या चिंता में हैं तो रोगों से लड़ने की हमारी क्षमता शिथिल पड़ती है।

शरीर आवश्यक रोग प्रतिरोधक नहीं बना पाता और न ही रोगों से लड़ने के लिए जरूरी हारमोन या रसायनों का उत्सर्जन ही कर पाता है। ऐसे में सबसे पहले हमारा पाचन तंत्र प्रभावित होता है और फिर धीरे-धीरे शरीर के अन्य तंत्र भी कमजोर पड़ते हैं। ऐसे में जब शरीर दैनिक क्रियाओं को ही ढंग से निष्पादित नहीं कर पाएगा तो रोगों से भला कैसे लड़ेगा?

एक पहलू यह भी है कि इस एक बीमारी ने हमें बाकी बीमारियों के प्रति लापरवाह भी बनाया है। हम मौसमी बीमारियों के प्रति अब सजग नहीं दिख रहे हैं। इस समय मच्छर से होने वाली बीमारियां और बुखार हर साल बहुत आम है। अब जरूरत है कि सावधानियों के साथ हम जीवन को पटरी पर लेकर आएं। नकारात्मक भय और अंदेशे ने जीवन में जो खालीपन भर दिया है, अब उनको भरने की बारी है।

भय से उत्पन्न स्थिति हमारे शरीर-मन-मस्तिष्क को दुर्बल कर दे सकती है। इसके बाद हम खुद से और समाज से भी अपने आप ही दूर होते जाएंगे। इसलिए हमें इस बीमारी से बचने के उपायों का पालन करते हुए बस अब जीवन से भय को बाहर निकालना है। सावधानियों के साथ जीवन में मिलना-जुलना, उत्सव-पर्व में हर्षोल्लास, अब इन सबकी वापसी जरूरी है। एकाकीपन का अंधेरा हमसे उम्मीद की किरणों को दूर कर देता है और हमारी जिंदगी छीन लेता है।

हमारे गांव में बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि आदमी नहीं चलता, उसका विश्वास चलता है। आत्मविश्वास सभी गुणों को एक जगह बांध देता है। यानी विश्वास की रोशनी में मनुष्य का संपूर्ण व्यक्तित्व और भविष्य उजागर होता है। इसी आत्मविश्वास को संजीवनी देना है।

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