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तपती दुपहरी में शीतल छाया

एक युवक तपती दोपहर में आया और अपनी एक योजना में शामिल होने के लिए निवेदन करने लगा।

जीवन में संघर्ष, द्वंद्व और ढेरों गम हैं। ये चीजें जीवन को भयावह बनाती हैं, तो रोचक, चुनौतीपूर्ण और जीने योग्य भी। हर व्यक्ति के जीवन का अपना फलसफा होता है, अलग सोच होती है। ठीक से शिक्षा मिल जाए, तो जीवन अर्थपूर्ण हो सकता है। जीवन हर सूरत में जीने का नाम है। बेहतर है कि इसे हंस कर, निस्वार्थ रूप में जिया जाए।

एक युवक तपती दोपहर में आया और अपनी एक योजना में शामिल होने के लिए निवेदन करने लगा। उसने अपने स्वयंसेवी संगठन के बारे में बताया। समाज सेवा के नाम पर ढेरों एनजीओ चल रहे हैं। कई अपने जीने के लिए एनजीओ चला रहे हैं। वैसे हर आदमी अपने जीने के लिए इस दुनिया में कुछ न कुछ करता ही है। युवक ने अपने एनजीओ के उद्धेश्य बताए- हम अनाथ, लावारिस, बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष की, बिना किसी जाति-धर्म का भेदभाव किए कानूनी और आर्थिक मदद करेंगे। और भी बहुत कुछ, जो उसकी योजना में था, धाराप्रवाह बताता गया।

कुछ दिनों पहले मुहल्ले के एक खंडहर के बारे में, जिसकी तरफ कोई देखता भी नहीं, वह खबर ले आया। अनजान युवक रात के अंधेरे में वहां आकर नशा करते हैं। शुरू-शुरू में उसकी ये बातें मामूली-सी लगती रहीं। सो, किसी ने अधिक ध्यान नहीं दिया। मगर वह अपने तर्इं प्रयास में जुटा रहा। जब तब मेरे पास आता, पूरा घटना क्रम बयान करता। लब्बोलुआब यह कि वह इस मामले को लेकर मीडिया, पुलिस और जिला कलक्टर से बराबर मिलता है। नशेड़ियों का अड्डा बनता खंडहर उसकी चिंता का सबब बन गया है।

व्यवस्था कितनी कठोर, बेरहम और असंवेदनशील है, जो हर कदम पर काम करने वाले का इम्तिहान लेती है। दिन में तारे दिखा देती है। पुलिस का रवैया हर कोई जानता है। सरकारी महकमे वैसे भी अपनी ही मौज में काम करते हैं। इसके बावजूद वह अपने मिशन में लगा रहता है। वह हर काम को तरीके से करता हुआ अंजाम देता है। सबसे पहले मुहल्ले का वाट्सऐप ग्रुप बना कर उसने पांच सौ घरों की बस्ती में से अस्सी परिवारों को जोड़ लिया। नियम बनाया गया कि ग्रुप में मुहल्ले की समस्याओं से इतर कोई भी धार्मिक, राजनीतिक फोटो, गुड मार्निंग वगैरह नहीं डाले जा सकेंगे।

यह मुहल्ला हो या किसी भी शहर का कोई दूसरा मुहल्ला, सब अपने में सीमित होकर जीने के आदी हो चले हैं। पड़ोसी से पड़ोसीपन का सरोकार नहीं रह गया है, जब तक कि व्यक्ति का कोई स्वार्थ न हो। सो, मुहल्लावासी पूरी तरह अपने घर की चारदीवारी तक ही सीमित होकर जीते थे। अब मुहल्ले की समस्याएं एक-एक कर सामने आने लगीं- नालियां मलबे से भरी हुई हंै, कितने दिन हो गए हैं? पानी की टंकी साफ नहीं हुई, पानी की टंकी हर छह माह में साफ होनी चाहिए। सड़क साफ करने वाले कितने दिन से नहीं आ रहे हैं? नाली टूट गई है, गंदा पानी सड़क पर फैल रहा है।

सवाल उठे- ‘नालियों की मरम्मत होनी चाहिए।’ पार्षद चुनाव जीतने के बाद लौट कर मुहल्ले में नहीं आता कि मुहल्लावासी किस हाल में रह रहे हैं। सवालों पर सवाल, ढेरों समस्याएं और सुझाव आने लगे। लोगों में दुआ-सलाम, हाल-चाल आदि का लेन-देन होने लगा। किसी के डेंगू की खबर सबको लग जाती। पानी टंकी की सफाई हो जाती, टूटी नाली की मरम्मत होने लगी है। मुहल्लावासियों के सम्मिलित प्रयास से खंडहर में नशा करने वाले एक दिन पकड़ लिए जाते हैं। अब पुलिस गस्त होने लगी है। स्थानीय मीडिया भी सक्रिय हो गया है।

समस्याएं हर शहर में हैं। रहेंगी ही, पर नागरिकों को अपने लोकतांत्रिक हक-हकूक भी मालूम होने चाहिए कि उन्हें साफ पानी, बिजली और साफ मुहल्ला रहने को मिले। इस तरह की छोटी-छोटी बातें, समस्याएं, जिन्हें हम नजरअंदाज करते रहते हैं। इसलिए कि हम कथित शहरी मध्यवर्गीय अपने घर से नौकरी या दुकान और घर के बीच ही कदमताल करते रहते हंै। हमारे सामाजिक सरोकार खत्म हो चले हैं, सामाजिक दूरियां बढ़ती जा रही हैं। हम मिल कर आवाज नहीं उठा पाते, क्योंकि राजनीतिक पार्टियों की खेमेबाजियों में बंट कर रह गए हंै, जबकि हम मुहल्ले के होकर भी रह सकते हैं। इस बात का अहसास सभी को अब शिद्दत से होने लगा है। मुहल्ले में सामुदायिकता का भाव पैदा होने लगा है। मुहल्ले की छोटी-बड़ी समस्याओं पर विचार-विमर्श होता है।

इक्कीसवीं सदी में वैसे भी समाज और परिवार का रूप बदल रहा है। भारतीय संस्कृति अब किताबों या नेताओं के भाषणों में सुनाई देती है। मुहल्लावासी आधुनिक रंग में डूब कर भाईचारा, पड़ोसीपन और सामाजिकता से दूर होते चले जा रहे हैं। ऐसे में हमारे एनजीओ युवक जैसे युवाओं की सक्रियता आश्वस्त करती है। आज जब बहुत से युवा गुमराह हो रहे हैं, एक युवा द्वारा मुहल्ले को एक सूत्र में पिरोने की पहल भरोसा जगाती है।

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