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दुनिया मेरे आगेः धारणाओं का सिरा

जब भी टीवी के पर्दे पर किसी मदरसे का चित्रण आता है तो उसमें यह दिखाया जाता है कि बच्चे सिर पर टोपी पहने हुए आगे-पीछे हिलते हुए पढ़ रहे हैं। क्या पढ़ रहे हैं, यह पता नहीं चल पाता है।

अमित चमड़िया

जब भी टीवी के पर्दे पर किसी मदरसे का चित्रण आता है तो उसमें यह दिखाया जाता है कि बच्चे सिर पर टोपी पहने हुए आगे-पीछे हिलते हुए पढ़ रहे हैं। क्या पढ़ रहे हैं, यह पता नहीं चल पाता है। लेकिन दूसरे धर्म को मानने वाले साधारण लोगों के बीच बनी धारणा के मुताबिक यह मान लिया जाता है कि ऐसा करते हुए वे कुरान पढ़ रहे होते हैं। हाल में इसी सवाल से मेरा सामना हुआ। एक पढ़ी-लिखी महिला ने सवाल के साथ जवाब देते हुए कहा कि मुसलिम बच्चों के ऐसे आगे-पीछे हिलते हुए पढ़ने के पीछे उनका धर्म है। मैंने उनसे कहा कि इससे धर्म का कोई लेना-देना नहीं है। मैं भी बचपन में स्कूल की दरी पर बैठ कर इसी तरह हिल कर पढ़ता था।

दरअसल, पढ़ते हुए इस तरह हिलने के पीछे की वजह धर्म नहीं, बल्कि किसी पाठ को याद करने का एक तरीका है। इस तरीके से हम उस पाठ में मग्न हो जाते है और पाठ जल्दी याद हो जाता है। लेकिन वे महिला इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थीं। शायद अपने बचपन में पढ़ाई के दौरान उन्हें इस तरह जमीन पर बिछी दरी पर बैठ कर पढ़ने का मौका नहीं मिला होगा। यह मेरे लिए विचित्र विषय था कि किसी समाज में अपने से इतर किसी समुदाय के बारे में ऐसी धारणा कैसे बन जाती है। मैं अपनी राय को लेकर आश्वस्त हूं। फिर भी मैंने अपने एक मुसलिम दोस्त से इस बारे में पूछा कि पढ़ते हुए हिलने की क्या वजह होगी। तब उसका जवाब भी वही था जो मेरा था।

बेंच पर बैठ कर हिलते हुए नहीं पढ़ा जा सकता है। यह काम दरी पर बैठ कर ही संभव है और ज्यादातर मदरसों में आज भी दरी पर बैठ कर ही पढ़ने की व्यवस्था है। जिन मदरसों में विद्यार्थियों के पढ़ने के लिए बेंच और डेस्क हैं, वहां उन्हें इस तरह हिलते हुए नहीं देखा जा सकता। लेकिन अगर उसे भी टीवी के पर्दे पर दिखाया जाए तो बहुत सारे लोगों को अपने मन में बैठी इस तरह की धारणा और पूर्वग्रह पर विचार करने का मौका मिल सकता है। जिन अन्य स्कूलों में बेंच पर बैठ कर पढ़ने की व्यवस्था होती है, वहां किसी भी बच्चे को बैठे हुए आगे-पीछे हिलने की जरूरत नहीं पड़ती है, चाहे पढ़ने वाला बच्चा किसी भी मजहब का हो। यहां एक बात और स्पष्ट करने की जरूरत है कि जमीन पर बिछी दरी पर बैठ कर पढ़ने का कारण भी धर्म नहीं है। स्कूलों में जहां भी संसाधनों की कमी होती है, वहां आज भी विद्यार्थी जमीन पर बिछाई गई दरी पर बैठ कर ही पढ़ते हैं। मेरी बिल्कुल शुरुआती कक्षाओं की पढ़ाई दरी पर बैठ कर ही हुई है, क्योंकि स्कूल के पास संसाधनों की कमी थी।

यह बात दिखने में बहुत मामूली लगती है, लेकिन इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। इसी तरह की कई धारणाओं के चलते किसी जाति और धर्म के बारे में भी हम पूर्वग्रह पाल लेते हैं। समाजशास्त्रीय सिद्धांत यह कहता है कि सामाजिक संरचना में निचले पायदान पर समझी जाने वाली जाति और धर्म के लोगों के दिनचर्या में शामिल क्रियाकलापों को उसके धर्म और जाति से जोड़ कर देखा जाता है। जबकि इसी संरचना में ऊंचे पायदान पर समझी जाने वाली जाति के सदस्य अपने क्रियाकलापों की वजह में वैज्ञानिकता का अंश देखते हैं। उस महिला की सोच में भी यही बात है, इसीलिए वे हिल-हिल कर पढ़ने के पीछे धर्म को कारण मानती हैं। यह केवल एक उदाहरण है।

दरअसल, धारणा बनाने में हमारी शिक्षा व्यवस्था काफी हद तक जिम्मेवार है। यह शिक्षक की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि समाज में फैली हुई वैसी धारणाओं और पूर्वग्रहों को खत्म करे, जिसका कोई आधार नहीं है और इस तरह की सामग्री को पाठयक्रम का हिस्सा न बनाया जाए जो लोगों की तार्किकता को नष्ट कर रहा हो। इस संदर्भ में बिहार के सासाराम शहर के एक निजी विद्यालय में नौवीं कक्षा के हिंदी व्याकरण की किताब के एक अंश में है- ‘दलित भारत की विधवा हैं।’ इस पंक्ति के माध्यम से उपमा के बारे में समझाया गया है। सवाल है कि उपमा का अर्थ और उसका प्रयोग समझाने के लिए लिखने वालों को क्या यही लाइन समझ में आई? क्या उन्हें समाज के ढांचे और उसमें दलित समुदाय के प्रति सामाजिक व्यवहार की वास्तविक समझ होगी? भाषा के जरिए सामाजिक यथास्थिति को कैसे बनाए रखा जाता है, क्या इस पर भी विचार किया जाएगा? हमें यह सोचना चाहिए कि हम बच्चों को किस तरह की चीजें पढ़ने के लिए दे रहे हैं। बच्चों को पढ़ाई जाने वाली किसी किताब या रचना में हम अगर इसी तरह की सामग्री देंगे तो निश्चित रूप से एक सामान्य गतिविधि के बारे में उनके भीतर किसी जाति और धर्म को लेकर पूर्वग्रहों का जन्म होगा।

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