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दुनिया मेरे आगे: उम्मीदों के दीये

मानव युगों से यह कशमकश कर रहा है और वह अज्ञानता का यात्री होने के बावजूद ज्ञान की खोज कर रहा है। पृथ्वी, आग, हवा, पानी और आकाश- इन पंच महाभूतों के गोलाकार में तेजोनिधि देवता यानी- सूर्य। सूर्य की उपासना हमारी परंपरा है। क्या यह ज्ञानोपासना की परंपरा नहीं है? इस निसर्ग के असंख्य और अनाकलनीय बातों को खोज लेने वाला मानव एकमात्र प्राणी है। उसे एक छठी इंद्री भी मिली है- मन।

Author Updated: November 14, 2020 1:06 AM
दीप पर्व दीपावली पर आकर्षक रंगोली के बीच दीप का उजियारा।

विलास जोशी

घनघोर अंधियारा और रात के अंधियारे में आकाश के सारे ही ‘रत्न’ यानी चांद-तारे लुप्त। अचानक तेजस्व का साम्राज्य कहां से आया होगा? इसके स्वर्णिम प्रकाश में सारा सौरमंडल कैसे निखर आया होगा? असंख्य बिजलियों का तेज और बादलों की गड़गड़ाहट… मानो नटराज ‘एक सौ आठवां’ नृत्य कर रहे हों- तांडव नृत्य। वह कैसा होगा? उत्पत्ति के साथ प्रलय की तरह? दुनिया के निर्माण की प्रक्रिया कैसी रही होगी? ये सारे सवाल अज्ञानरूपी, लेकिन ज्ञान प्राप्ति का प्रखर आकर्षण लिए हैं। ज्ञान को जिज्ञासा से बाहर निकालने के लिए अधीर हो रहे ये सवाल। ये अधीरता ही ज्ञान मार्ग की तरफ बढ़ती है। अंधियारे के राज का नाश करते हुए ज्ञान के साम्राज्य की स्थापना करती ये अनगिनत जिज्ञासाएं।

अधीरता और जिज्ञासा को प्रकाश मार्ग दिखाने वाली चेतना ज्ञान को निकट करती है। अज्ञानता के अंधकार को चीरते हुए वह ज्ञान को अपने बाहुपाश में ले लेती है। अंधकार से प्रकाश की तरफ जीवन का मार्ग चलाने की कशमकश सिखाती है। दृष्टिबाधित को भी सहारे के लिए लाठी देने वाली ये ज्ञानमार्ग की प्रकाशमय राह यानी ‘ज्ञान का सूर्योदय’। इस ज्ञानरूपी सुबह के स्वप्न से अमावस के घोर अंधकार को प्रत्यक्ष रूप से तेजोमय करती है दीपावली की असंख्य दीपमालाएं।

मानव युगों से यह कशमकश कर रहा है और वह अज्ञानता का यात्री होने के बावजूद ज्ञान की खोज कर रहा है। पृथ्वी, आग, हवा, पानी और आकाश- इन पंच महाभूतों के गोलाकार में तेजोनिधि देवता यानी- सूर्य। सूर्य की उपासना हमारी परंपरा है। क्या यह ज्ञानोपासना की परंपरा नहीं है? इस निसर्ग के असंख्य और अनाकलनीय बातों को खोज लेने वाला मानव एकमात्र प्राणी है। उसे एक छठी इंद्री भी मिली है- मन।

इस मन के गर्भ में जन्म लिया जिज्ञासा, जिजीविषा और प्रज्ञा ने। इस प्रतिभा को बुद्धि का वैभव प्राप्त हुआ और लाखों बिजलियों की तेजोमय बुद्धि से नहा कर निकला मानव का जीवन। नष्ट हो गया तो अज्ञान का अंधकार। साम्राज्य फैल गया पृथ्वी पर तो केवल प्रकाश का। फिर इस तेजस्व की एक परंपरा चल पड़ी। त्योहारों और उत्सवों की शुरुआत हो गई मानवीय संस्कृति में। इस संस्कृति ने स्वीकार किया तेजस्व की आराधना को। फिर वह सूर्य की हो, चंद्रमा की हो या असंख्य तारे हों। इंसान ने अग्नि का तेज संभाल कर रखा है। इस तेजोमय परंपरा के त्योहार को सहेजने का काम किया है मानव ने। यह त्योहार यानी- जगमगाती दीपावली।

अमावस के घोर अंधियारे में तुलसी-वृंदावन में तेजोनिधि ‘पंथी’ सूर्यकुल की सच्ची वारिस मालूम पड़ती है। फिर लगने लगता है कि वह ‘सूर्य’ और ‘पंथी’ है, या ‘शिव’ और ‘शक्ति’? पंथी यानी- ‘माया’। दूसरे शब्दों में पंथी यानी प्रकृति। इसीलिए ये पंथी का महा उत्सव है ‘दीपावली’। इसीलिए दीपावली में आंगन को गोबर से लीपते हैं, रंगीन रंगोलियों से सुसज्जित करते हैं। सफेद कपास की बत्तियों को मूंगफली के तेल में भिंगो कर उसे तेजोमय करते हैं। महालक्ष्मी की पूजा यानी केवल रुपए-पैसे, सोना-चांदी की पूजा नहीं, बल्कि यह कृषिवीरों के श्रम संस्कृति के कर्मोंं की पूजा है। एक दाना बोकर असंख्य हजार दाने करने की श्रम प्रक्रिया यानी ‘लक्ष्मी’। एक के दो करने की संस्कृति यानी पैसा। जबकि एक दाने का हजार दाना करना यानी ‘धनलक्ष्मी’।

लक्ष्मी के उपासक कहते हैं- ‘सारी पीड़ा टले, बलि राजा का राज्य बढ़े।’ बलि राजा का राज्य बढ़ने का मतलब है कृषि और श्रम करने वालों का राज्य स्थापित होना। दीपोत्सव हमें ऐसी अनंत प्रेरणाएं देता है। ज्योत से ज्योत जलानी पड़ती है, तब कहीं जाकर एक बड़ी ‘दीपमाला’ बनती है। इस दीपमाला का हर एक दीया यानी ‘दीपावली’। ‘ज्योत से ज्योत जलाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो’ का मतलब ही है कि प्रेम भाव, मानवता और परस्पर आदरभाव बढ़ाते जाना यानी दीपावली।

कोई भी त्योहार हो, उसकी पूर्णता ‘रंगोली’ से ही होती है। सच यह है कि रंगोली ‘कला घराने’ की प्रतिनिधि है। यों रोजाना सुबह अपने घर के दरवाजे और आंगन में रंगोली निकालने की प्रथा बहुत प्राचीन है। प्राचीन ‘चौंसठ कलाओं’ में रंगोली अपना एक विशेष स्थान रखती है। अपने ग्रंथों में जगह-जगह रंगोली का उल्लेख है। महाराष्ट्र में इसे ‘रंगोली’, तो गुजरात में ‘करोटी’ कहते है। तमिलनाडु में इसे ‘कोलम’, तो आंध्र प्रदेश में ‘मग्गी’ कहते है।

बंगाली लोग इसे ‘अल्पना’ तो राजस्थान में इसे ‘मांड़ना’ कहते हैं। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में चावल के आटे से भी रंगोली सजाई जाती है। दक्षिण भारत में ‘चौकोनी रंगोलियां’ निकाली जाती है, जबकि राजस्थान में ‘गोलाकार’ में। महाराष्ट्र में लक्ष्मी के पदचिह्न, स्वास्तिक, ओम आदि प्रतीक चिह्नों से रंगोली से बनाए जाते हैं। कभी रंगोली में केवल हल्दी और कूंकू का इस्तमाल होता था, लेकिन अब रसायनिक विविध रंगों की रंगोलियां बाजार में मिलती हैं और अधिकतर वही उपयोग की जाती हैं।

विविध रंगों से सजी रंगोलियां देखने पर मन प्रसन्न हो जाता है।एक नया प्रकार यह भी आया है कि कुछ रंगोली विशेषज्ञ पानी पर तैरती कल्पनाशील रंगोली भी बनाते हैं। रंगोली सृष्टिसुख देती है। सच तो यह है कि दीपावली सुख और समृद्धि का महोत्सव है। दीपावली के दीयों और रंगोलियों से हमारे जीवन को उम्मीद के साथ एक नई ऊर्जा मिलती है।

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