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दुनिया मेरे आगेः भ्रम के विज्ञापन

क्या हम विज्ञापनों से जी रहे हैं? टीआरपी के हिसाब से चैनल अपने धारावाहिक और अन्य कार्यक्रमों के बारे में फैसला करते हैं। दर्शकों की पसंद और उनके मूल्यांकन का कितना महत्त्व है, यह सभी जानते हैं।

क्या हम विज्ञापनों से जी रहे हैं? टीआरपी के हिसाब से चैनल अपने धारावाहिक और अन्य कार्यक्रमों के बारे में फैसला करते हैं। दर्शकों की पसंद और उनके मूल्यांकन का कितना महत्त्व है, यह सभी जानते हैं। उन्हें आकर्षित करने के लिए उनसे एसएमएस आमंत्रित किए जाते हैं और कथित तौर पर सबसे अधिक मत पाने वाले कार्यक्रम दिखाए जाते हैं। यही चलन अब विज्ञापनों और उत्पादों में भी चल पड़ा है। अगर क्रिकेट का माहौल हो तो विज्ञापनों में ही नहीं, विभिन्न उत्पादों में भी क्रिकेट से जुड़े मुहावरे और वार्तालाप दिखा कर बाजार में अपनी पकड़ मजबूत की जाती है। होली-दिवाली या ईद जैसे त्योहारों को भी इसी फार्मूले पर भुनाया जाता है।

हाल में संपन्न हुए टी-20 विश्वकप के दौरान कुछ विज्ञापनों को देख कर साफ पता चलता है कि बाजार कैसे मौके को बेचता है। मसलन, एक विज्ञापन में पति-पत्नी परिधान की दुकान में हैं। पत्नी ट्रायल रूम से एक गाऊन पहन कर निकलती है और पति से पूछती है कि वह कैसी लग रही है! पति अपने मोबाइल पर मैच देखते-देखते रुक-रुक कर बोलता है कि ‘वाइड बॉल था।’ इस पर सेल्समैन मुस्करा कर टिप्पणी करता है- ‘वाइड बॉल पर हिट विकेट आउट हो गए।’ दूसरे विज्ञापन में लड़का अपने माता-पिता के साथ विवाह के लिए लड़की देखने जाता है और लड़की को पसंद कर लेता है। पर जब लड़की के पिता लड़के से पूछते हैं तो वह कह देता है- ‘फाइन लेग’ और आगे कहता है- ‘फाइन लेग पर कैच छूटा।’ इसी तरह के और भी विज्ञापन टीवी पर दिखाए गए। होली के विज्ञापनों और उत्पादों, जैसे गुलाल, पिचकारी और रंग के नाम राजनेताओं और मशहूर लोगों से जुड़े रहे।

आज मानसिकता ऐसी बन गई है कि जब कोई मशहूर व्यक्ति किसी चीज का विज्ञापन करे तो वह दर्शकों को आकर्षित और प्रभावित भी करता है, भले वह खिलाड़ी हो या अभिनेता। वह तेल का विज्ञापन करे, गहनों का या फिर खाने-पीने की चीज का। क्या वाकई दर्शक इतने भोले हैं कि विज्ञापनों में बताई और कही हुई बातों को सच मान लेते हैं? भले ही ऐसा न हो, पर विज्ञापन कंपनियां और उत्पाद बेचने वाले तो यही मानते हैं कि दर्शक उन पर भरोसा करेंगे। वे अपनी टीआरपी के हिसाब से ही नीति बनाते हैं।

मेरे एक परिचित हैं। वे अपने बेटे को एक खास कंपनी और उसके ब्रांड की बिस्किट इसलिए खिलाते हैं, ताकि वह मान जाए कि उसमें इससे चीते जैसी ताकत आ जाएगी। उन्होंने लगातार किसी हीरो का विज्ञापन दिखा कर उसे इसके लिए राजी कर लिया। ऐसे न जाने कितने विज्ञापन हैं, जिसमें कोई मशहूर अभिनेता या खिलाड़ी किसी उत्पाद का प्रचार करता नजर आता है। क्या वाकई इन उत्पादों में वे गुण होते हैं जो बताए जाते हैं?

बड़ी कंपनियां विज्ञापनों पर काफी धन खर्च करती हैं, क्योंकि मौके का फायदा उठाना जिसे आता है, वही जिंदगी की इस दौड़ में आगे रहता है। किसी भी लोकप्रिय गतिविधि को नहीं छोड़ा जाता, बल्कि उसका पूरा दोहन कर लिया जाता है। इसीलिए जब होली हो तो विज्ञापनों में सब जगह होली, दिवाली हो तो दिवाली और क्रिकेट हो तो सब तरफ क्रिकेट ही दिखना चाहिए। भले ही टेलीविजन के धारावाहिक हों या आम जिंदगी से जुड़ी रोजमर्रा की घटनाएं। खिलाड़ी या अभिनेता भले ही दाढ़ी बढ़ाए रहते हों, पर बड़ी चतुराई से शेविंग क्रीम और ब्लेड का विज्ञापन करते हुए दिखाए जाते हैं। सिंहस्थ के मौके पर महाकाल मिष्ठान्न, महाकाल पूजा सामग्री, महाकाल भांग और ठंडई और महाकाल या शिव विश्राम गृह भी इसी प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। मकर संक्रांति पर विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतीक चिह्न और राजनेताओं के चित्रों वाली पतंगें भी देखी जा सकती हैं। मुमकिन है कुछ लोग पैसा देकर अपनी ओर से यह प्रचार करते या करवाते हों। इसे भी मौके का फायदा उठाना ही कहते हैं।

बहती गंगा में हाथ धोना, अवसर का फायदा उठाना, आंधी के आम बीनना- यह सब तो बरसों से होता आया है। चतुर लोग बाकी लोगों को धकिया कर खुद को आगे कर लेते हैं और चूंकि यह जमाना मार्केटिंग और विज्ञापन का है, इसलिए अपनी डफली खुद बजानी पड़ती है। बड़े-बड़े नेता या अभिनेता खुद अपना प्रचार करते फिरते हैं। सोशल मीडिया की मदद के लिए बाकायदा आइटी की टीम साथ रखते हैं। जो ये नहीं कर पाते, वे अलग-थलग पड़ जाते हैं। आजकल खुद को आगे बढ़ाने का काम व्यवस्थित, व्यावसायिक और प्रभावशाली तरीके से हो रहा है। मोटी रकम देकर लोकप्रिय सितारों से कंपनियां अपनी-अपनी वस्तुओं की तारीफ में जो चाहे, कहलवा रही हैं। लेकिन किसी उत्पाद की गुणवत्ता के मुकाबले उसके बारे में किए गए झूठे दावों का खमियाजा अगर उपभोक्ता को उठाना पड़ता है तो उसकी भरपाई कौन करेगा!

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