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दुनिया मेरे आगेः संवाद की संवेदना

पूंजीवादी सिद्धांत का विवेचन करते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है कि ‘कोई भी वाद या व्यवस्था अपने उत्थान में कल्याण को देखती है और पतन के समय विनाश को।

Author April 2, 2016 2:57 AM
(Photo-myentrepreneur.org)

पूंजीवादी सिद्धांत का विवेचन करते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है कि ‘कोई भी वाद या व्यवस्था अपने उत्थान में कल्याण को देखती है और पतन के समय विनाश को। इसलिए जो पूंजीवाद अपने उत्थान के समय कल्याणकारी थी, वह पतन के समय तक आते-आते अपने विनाशकारी रूप को दिखा चुकी थी’। पूंजीवाद के विनाश का एक कारण जो मुझे इस व्याख्या से समझ आया, वह यह कि किसी भी व्यवस्था को बनाए रखने में दो चीजें महत्त्वपूर्ण होती हैं। पहला विचार और दूसरा व्यवहार। अक्सर हरेक विचार अपने उत्थान के समय में प्रभावी, आकर्षक और कल्याणकारी लगता है। लेकिन जब वह व्यवहार में लाया जाता है तो उसके ‘ड्रॉ-बैक्स’ यानी कई खामियां भी नजर आने लगती हैं। इसी के बाद दुविधाओं और बहसों का सिलसिला शुरू होता है। इस परिप्रेक्ष्य में अगर एक मानवीय भाव या संवेदना के बतौर प्रेम के समझने की कोशिश की जाए तो हम पाते हैं कि प्रेम भी संबंधों की एक व्यवस्था ही है!

दरअसल, ‘व्यवस्था’ शब्द अपने आप में एक प्रकार की क्रमबद्धता की मांग करता है। स्त्री-पुरुष के बीच प्रेम संबंधों में भी व्यवस्थित होने के लिए एक प्रकार की क्रमबद्धता की अपेक्षा होती है। और जब दोनों अपनी-अपनी भूमिकाओं में इस क्रमबद्धता को व्यवहार में लाते हैं तो यह व्यवस्था सुचारु रूप से चलना प्रारंभ करती है। लेकिन सवाल है कि क्या यह व्याख्या वाकई इतनी सरल और सीधी है? वह भी तब, जब हम एक जटिल पूंजीवादी समाज में जी रहे हैं? समाज और उसका ढांचा जटिल है श्रम को लेकर, विचारों-मान्यताओं और संबंधों के मसले पर और व्यक्तिगत रूप में अपनी-अपनी निजताओं को लेकर। इतनी तरह की जटिलताओं के बीच ‘प्रेम’ रूपी भाव की इतनी सरल व्याख्या कहीं किसी प्रकार की जल्दबाजी का नतीजा तो नहीं! जबकि एक भाव के रूप में ‘प्रेम’ की यह जटिलता ही है कि वह बहुत ‘सरल’ है।

हमारे आधुनिक समाज में आजकल जो सरल है, उसी को समझना बहुत जटिल है। ‘दो व्यक्ति एक-दूसरे से प्रेम करते हैं!’ यह वाक्य अपने आप में कितना सरल और सुंदर लगता है। पर जैसे ही इस ‘सरल’ भाव पर जटिल समाज की नजर जाती है तो जटिलताओं का पहाड़ टूट पड़ता है। जबकि सच यह है कि प्रेम एक ऐसा ‘सरल’ भाव है, जो बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के जाति, धर्म, देश आदि की सीमाओं और यहां तक कि उम्र की भी सभी जटिलताओं को तोड़ देता है। जब यह सरल-सा लगने वाला भाव समाज की इन धारणाओं पर टिके जटिल ढांचे पर चोट करता है तो खाप पंचायत या इस जैसी संस्थाएं सामने आती हैं। फिर दिखता है समाज का वह रूप जो दिखावे की आधुनिकता की दौड़ में संवाद को भुला चुका है। इसमें बचा है तो केवल विवाद और हिंसा। ऐसी स्थिति में कई बार दो लोग इस विवाद और हिंसा के आगे घुटने टेक देते हैं या फिर इन जटिलताओं से आगे जाने या इनके दायरों से बाहर जाने का खमियाजा उन्हें अपने प्राण गंवा कर उठाना पड़ता है।

इस सबके बावजूद अगर दो लोग साथ रहने में कामयाब हो भी जाते हैं तो समाज और परंपरा की जटिलताएं उनके साथ के जीवन पर इस कदर हावी होती हैं कि वाद-विवाद बढ़ जाता है। इसका स्वाभाविक असर आपसी व्यवहार पर पड़ता है और संवाद कहीं लुप्त होने लगता है। एक प्रकार की चुप्पी इस रिश्ते में हावी होने लगती है। कथाकार मृदुला गर्ग ने इस स्थिति को ऐसे देखा है- ‘किसी भी रिश्ते में संवाद तभी होता है, जब विवाद हो। अगर कोई विवाद ही नहीं है और मौन स्वीकृति और चुप्पी है तो यह चुप्पी संकेत है उस रिश्ते में गड़बड़ियों का’। रोजमर्रा की इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में जब अपने रिश्तों में मैं भी यह मौन महसूस करती हूं तो लगता है कहीं यह मौन और सघन चुप्पी किसी तरह की गड़बड़ी का संकेत तो नहीं! कई बार दो लोगों के प्रेम में यह चुप्पी ही एक बड़े विवाद का कारण बन जाती है, क्योंकि जटिल समाज के जटिल जीवन की गुत्थियां जब ‘प्रेम’ रूपी सरल भाव पर हावी होती हैं तो विवाद ही की ही जीत होती है और संवाद कहीं खो जाता है। इस प्रकार दो व्यक्तियों के सुख और कल्याण के भाव और उसी बुनियाद से जन्मा प्रेम समाप्ति की ओर अग्रसर होने लगता है। संवाद और संवेदना के बीच का द्वंद्व जब दूरी में तब्दील होने लगे, तब एक समाज के सुखद भविष्य की उम्मीद धुंधली पड़ जाती है।

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