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दुनिया मेरे आगेः शहर में शोकसभा

एक बड़ा आदमी मरा। कोई बड़ा यानी ऊंचे कद वाला आदमी मरता है तो शोकसभा आयोजित करना ‘स्टेटस सिंबल’ बन जाता है। बड़े आदमियों को श्रद्धांजलि देने के दो फायदे होते हैं।

Author March 18, 2016 3:33 AM
(file Photo)

एक बड़ा आदमी मरा। कोई बड़ा यानी ऊंचे कद वाला आदमी मरता है तो शोकसभा आयोजित करना ‘स्टेटस सिंबल’ बन जाता है। बड़े आदमियों को श्रद्धांजलि देने के दो फायदे होते हैं। एक तो अखबार में नाम छप जाता है और दूसरा यह कि किसी भी बड़े आदमी के मर जाने के बाद आप उससे नजदीकी के मनगढ़ंत किस्से सुना सकते हैं। दरअसल, कोई आदमी कितना ही बड़ा होकर क्यों नहीं मरे, प्रकृति ने उसे कभी यह अवसर प्रदान नहीं किया कि अपनी शोकसभा में मनगढ़ंत किस्से कहने वाले व्यक्ति को किसी तरह चुप करा सके। शोकसभा और लोकसभा में कही जाने वाली तमाम बातों का अगर सूक्ष्म विवेचन किया जाए तो अनगिनत सनसनीखेज खुलासे हो सकते हैं!
मैं ठहरा एक मामूली आदमी। मुझे अभी तक लोकसभा में जाने का मौका नहीं मिला है, इसलिए अब तक की लोकसभा के बारे में मेरी सारी जानकारी सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है।

लेकिन संयोग से मुझे शोकसभा में कई बार जाना पड़ा है। कुछ दिनों पुरानी बात है। खबर मिली कि एक पुराने मित्र की सास चल बसीं। मित्र नजदीकी रहे हैं, इसलिए मैं उदासी ओढ़ कर शोकसभा में भागीदारी के लिए पहुंचा। मित्रवर कहीं नहीं दिखे। नजर दौड़ाने पर पता चला कि वे एक पान की दुकान पर खड़े हुए इलाके के विधायक के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनका कहना था कि शोकसभा को कुछ देर के लिए रोका जा सकता है, क्योंकि विधायक जी के आने से न केवल अखबार में अच्छा कवरेज मिल जाएगा, बल्कि उनके अपने विभाग में उनका प्रभाव भी बढ़ जाएगा। विधायक जी को शोकसभा तक लाने की जिम्मेदारी उन्होंने अपने साले के एक अन्य उस बहनोई को सौंपी थी, जो एक अखबार में विज्ञापनों का काम देखता था। मित्र का कहना था कि यह फंडा काम करेगा, क्योंकि बड़े-बड़े तीसमार खां अखबार वालों से पंगा नहीं लेते। आखिर जिस आदमी की सिफारिश पर उन्होंने अपने विभाग का राज्यस्तरीय पुरस्कार प्राप्त कर लिया था, उसी की सिफारिश पर विधायक को अपनी सास की शोकसभा तक क्यों नहीं ला पाएंगे!

लेकिन ऐन वक्त पर सब गुड़-गोबर हो गया। विधायक जी को जरूरी मीटिंग के लिए राजधानी रवाना होना पड़ा और मित्रवर की शोकसभा सूनी रह गई। बाद में कुछ लोगों ने उन्हें यह कहते भी सुना कि जब शोकसभा में विधायक जी ही नहीं आ पाए तो सासू जी के मरने का क्या फायदा हुआ! इस कथन से आप अनुमान लगा सकते हैं कि हमारे मित्रवर को बुद्धिजीवी तबके में गिना जाता है या फिर वे खुद ऐसा मानते हैं। दरअसल, मेरे उस मित्र की तरह के लोगों का एक बड़ा लक्षण यह भी होता है कि वे जीवन और मरण के व्यामोह से दूर रह कर निरंतर अपने ‘लक्ष्य’ के प्रति समर्पित रहते हैं और अक्सर उनका लक्ष्य अपना उल्लू सीधा करना होता है! उन्हें शोक सभाओं में नए संबंधों की, आम सभाओं में नए यश की और राजसभाओं में नए पुरस्कारों की तलाश होती है!

तो जब वह बड़ा आदमी मरा, तो कुछ बुद्धिजीवियों ने शोकसभा का आयोजन करने का फैसला किया। शोकसभा के लिए बाकायदा अध्यक्ष और मुख्य अतिथि तय किए गए। बुद्धिजीवियों द्वारा की जाने वाली शोकसभाओं में अध्यक्ष का होना शोकसभा को थोड़ा जीवंत कर देता है! फिर लोगों ने दिवंगत के बारे में ऐसे-ऐसे किस्से सुनाए, जिन्हें अगर दिवंगत सुन पाता तो उसे भी आश्चर्य होता। कुछ ने उसे अपनी प्रेरणा बताया तो कुछ बुजुर्ग यह तक कहने में नहीं हिचके कि जब दिवंगत अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहा था, तब एक बार उन्होंने भी अपने मार्गदर्शन से उसकी सफलता का मार्ग प्रशस्त किया था।

सच और झूठ का पता सबको था, लेकिन फिर भी लोग चुपचाप सुन रहे थे। शायद शोकसभा ही एक ऐसा स्थान होता है, जहां बुद्धिजीवी किस्म के लोग दूसरों की बातों से असहमत होने के बावजूद उन्हें शांति से सुन लेते हैं। हालांकि कभी-कभी किसी वक्ता की बात पर कुछ बुद्धिजीवी इस तरह तिलमिलाते हुए दिखाई देते हैं, मानो उन्हें मौका मिल जाए तो वे उस वक्ता की शोकसभा का आयोजन भी हाथोंहाथ ही कर डालें!
बहरहाल, शोकसभा खत्म हुई। बुद्धिजीवी अपने-अपने घरों के लिए रवाना हुए। इस बार उनके चेहरे पर शोक नहीं था, उत्साह था और आनंद था। आनंद इस बात का कि उन्हें अपने मन की भड़ास निकालने का मौका मिल गया और उत्साह इस बात का कि यह शहर की अंतिम शोकसभा नहीं थी!

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