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दुनिया मेरे आगेः होड़ के हवाले बच्चे

विश्वविद्यालय में शिक्षा हासिल करने के दिनों में वहां पास का बाजार अचानक खाली लगने लगता था, क्योंकि वहां आए दिन पहुंचने वाले शिक्षकों और उनके परिवारजनों की भीड़ आनी बंद हो जाती थी।

विश्वविद्यालय में शिक्षा हासिल करने के दिनों में वहां पास का बाजार अचानक खाली लगने लगता था, क्योंकि वहां आए दिन पहुंचने वाले शिक्षकों और उनके परिवारजनों की भीड़ आनी बंद हो जाती थी। एक दुकानदार ने बताया था कि इन दिनों यहां स्थित एक स्कूल के इम्तहान चल रहे हैं। उस स्कूल को इलाके में अग्रणी माना जाता था और तमाम शिक्षकों के बच्चे उसी स्कूल में पढ़ते थे। एक कॉलेज शिक्षिका को जानती हूं। चूंकि सरकारी नौकरी है तो वे जितना न्यूनतम जिम्मेदारी निभा कर नौकरी बचाई जा सकती है, उतना ही करती हैं। क्लास के बच्चे अगर पिछड़ते हैं तो इसकी उन्हें कोई फिक्र नहीं, लेकिन अपने बच्चे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं होनी चाहिए और भरपूर गाइडेंस मिलना चाहिए, इसे वे सुनिश्चित करती हैं।

यों कौन नहीं चाहता कि उसका बच्चा आगे बढ़े, लेकिन मसला समझ और दृष्टिकोण का है। उनके बच्चे को लगातार पहली कतार में बने रहने की आदत बन गई। माता-पिता के अतिदबाव और खयाल रखने के क्रम में उसने स्कूली शिक्षा ठीक कर ली और वह मेडिकल में दाखिला पाने में सफल रहा। लेकिन अगली कतार में ही बने रहने के दबाव में वह गहरे अवसाद में चला गया। उसकी इस हालत का उसकी मां पर भी गहरा असर हुआ और वह भी अवसाद का शिकार हुई। किसी निजी संस्थान में होती तो नौकरी बचाना भारी पड़ता। हालांकि अपने विद्यार्थियों का भला वे पहले भी नहीं कर पा रही थीं।

इसी तरह, एक व्यक्ति बंगलुरु के किसी कंपनी में नौकरी कर रहे हैं। उनके माता-पिता स्कूल टीचर के सिर पर सवार रहते थे। अगर उनके हिसाब से बच्चे की परीक्षा में कहीं आधा नंबर भी कम हो तो वे जिरह करने और नंबर दुरुस्त करवाने स्कूल पहुंच जाते थे। पिता खुद किसी सरकारी स्कूल में टीचर हैं, लेकिन उनके स्कूल में ऐसे बच्चे पढ़ने आते हैं, जिनका शायद कोई भविष्य नहीं होता। उनका बेटा अब नौकरी कर रहा है, लेकिन बचपन से माता-पिता के साए की ऐसी आदत पड़ी है कि आज भी वह हर छुट्टी में घर चला आता है। अब आलम यह है कि नौकरी में भी मन नहीं लगता है।

अगर जीवन का लक्ष्य महज नौकरी हो और एक बार नौकरी में आ जाने पर महसूस हो कि आखिरी लक्ष्य हासिल हो गया, तब आगे फिर शून्य बचता है। इन दिनों सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन की गारंटी नहीं है, इसलिए कमा कर रख लेने की होड़ भी लगातार थका देती है। कुल मिला कर, एक प्रकार से जीवन नीरस और थकाऊ बन जाता है, जिससे मुक्ति के लिए तरह-तरह की कवायद करनी पड़ती है। कोई क्लब मार्का समाधान ढंूढ़ता है तो कोई नएपन की अनुभूति के लिए कुछ और करने लगता है। एक महिला ने अपने सारे संपर्क काट लिए, क्योंकि उन्होंने अपने बच्चे का जितना महिमामंडन किया था और उस पर अपना फोकस बना कर जो काम किया था, उसके अनुरूप उसका प्रदर्शन नहीं रहा। इसी वजह से उन्हें लोगों से बचना पड़ रहा था कि वह उन्हें क्या बताए कि उनके होनहार ने कॅरियर में कितने चांद लगाए!

आखिर माता-पिता बच्चों को इतना और इस तरह ‘सफल’ बनाने के पीछे क्यों पड़ जाते हैं? दरअसल, जैसे शिक्षा और कॅरियर को लेकर अत्यधिक चिंता, माता-पिता का दबाव या बाल्यावस्था की अपनी उपेक्षा की संतान के जरिए भरपाई करने की ललक या अपने अधूरे सपनों को अपनी संतानों के माध्यम से पूरा करने की दबी ख्वाहिश। अंग्रेजी भाषा में कहा जाता है- ‘हेलिकॉप्टर पेरेंट’। इसका इस्तेमाल डॉ हाईम गिनोट ने अपनी किताब ‘पेरेंटस एंड टीनेजर्स’ में पहली दफा किया था। कुछ किशोरों-किशोरियों ने बातचीत के दौरान अपने माता-पिता को लेकर कहा था कि किस तरह वे हेलिकॉप्टर की तरह उनके ऊपर मंडराते रहते हैं। बाद में यह शब्द इतना लोकप्रिय हुआ कि 2011 में अंग्रेजी डिक्शनरी में भी पहुंच गया।

इस दिशा में दूसरी भूमिका निजी शिक्षण संस्थान और कोचिंग सेंटर पूरा करते हैं। यहां लगातार आतंक बना रहता है कि कहीं टेस्ट में आप निचले पायदान पर न खिसक जाएं। और इस सवाल ने तो जीते जी अधमरा बना दिया है कि मोटी रकम देकर कोचिंग ले रहे हैं, फिर कुछ सौ सीटों के लिए लाखों अभ्यर्थी हैं, नंबर कहां से आएगा! जो इस हालत में टिक नहीं सकेगा, वह आत्महत्या तक कर लेता है। कोटा के कोचिंग संस्थानों पर यही सवाल खड़े हो रहे हैं। लेकिन जिम्मेदार केवल कोचिंग संस्थान नहीं हैं। कोचिंग वाले कह देंगे कि हम आपके घर आपको बुलाने नहीं गए थे… इतने कमजोर हैं तो यहां आए क्यों! और जब आ ही गए तो अब दौड़ में शामिल हो जाएं, जिसके लिए आपने बच्चे को वहां भेजा है!
कहने का आशय यह भी नहीं कि हमें बच्चों को छोड़ देना चाहिए कि वे जो समझें वहीं करें। उन्हें शिक्षा देने और उचित ढंग से मार्गदर्शन का प्रयास अवश्य होना चाहिए, लेकिन दृष्टि सही होना जरूरी है।

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