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योग्यता अधिक मूल्यवान है

वंशवाद को ज्यादातर राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाता है। इसका कारण यह है कि कुछ नेताओं ने अपने ही बेटे-बेटियों को राजनीति में उतारा है।

अरुणा कपूर

आजकल वंशवाद या परिवारवाद को लेकर टीवी चैनलों पर बड़ी बहस सुनाई पड़ती है। समाज में भी इसी विषय को लेकर चर्चाएं चलती रहती हैं। पिछले दिनों फिल्म उद्योग में बढ़ते वंशवाद या परिवारवाद को लेकर काफी चर्चाएं हुर्इं। इस प्रवृत्ति के चलते नए या बाहर से आए लोगों को मौका न मिल पाने पर चिंता प्रकट की गई। हालांकि वंशवाद को ज्यादातर राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाता है। इसका कारण यह है कि कुछ नेताओं ने अपने ही बेटे-बेटियों को राजनीति में उतारा है। यहां तक कि अपने अन्य सगे-संबंधी और नजदीकी व्यक्तियों को, अपने स्वार्थ से प्रेरित होकर चुनाव लड़ने के लिए टिकट और धन का प्रबंध करके राजनीति में उतारा है। चाहे उस व्यक्ति की उतनी योग्यता न भी हो।

कुछ लोग वंशवाद को अपराध के साथ जोड़ कर देखते हैं, यह सही नहीं है। कुछ दशक पहले समाज में यह मान्यता व्याप्त थी कि किसी ने अपराध किया है और वह जेल की सजा काट कर लौटा है या जेल में ही है, तो उसके आगे के वंशज भी आपराधिक मानसिकता वाले होंगे। उन पर किसी तरह का कोई भरोसा नहीं किया जा सकता। मगर आज के जमाने में समाज की मानसिकता यह नहीं है। लोग समझ गए हैं कि वंशवाद अपनी जगह है और आपराधिक प्रवृत्ति अपनी जगह है। कई बार कुछ अपराधियों को वंशवाद के अंतर्गत गलत कार्य को अंजाम देते देखा गया है, लेकिन यह अपवाद है। अपराधी किसी भी क्षेत्र, जाति, धर्म से और आर्थिक दृष्टि से किसी भी वर्ग से संबंधित हो सकता है।

इतना ही नहीं, इसका उम्र से भी कोई वास्ता नहीं होता। अपराध सात-आठ वर्ष का बच्चा भी कर सकता है और अस्सी वर्ष का बूढ़ा व्यक्ति भी कर सकता है। अपराध करने के पीछे भी अनगिनत कारण होते हैं, सिर्फ वंशवाद नहीं होता। वैसे ही कोई देशभक्ति से प्रवृत्त होकर कोई प्रशंसनीय कार्य करता है। तो यह समझ लेना कि उसके वंशज भी उसी की तरह शूरवीर होंगे और देश के लिए अच्छे कार्य ही करेंगे, ऐसा मानना गलत है।

वंशवाद को दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच का संबंध! माता-पिता का अपने बच्चों के साथ और आगे उनके बच्चों के साथ कुदरती तौर पर एक संबंध स्थापित होता है। यह सकारात्मक दृष्टिकोण है। इसके अंतर्गत हर माता-पिता अपनी अगली पीढ़ी को कुछ न कुछ देने की इच्छा से ओतप्रोत होता है। इसमें जमीन-जायदाद, कमाया हुआ धन और यहां तक कि समाज से प्राप्त इज्जत-मान भी होता है।

जो लोग व्यवसायी होते हैं, वे अपना व्यवसाय भी अपने बच्चों को ही सौंपने की चेष्टा करते हैं। यह सदियों से चलता आ रहा है। ये सभी एक परिवार के सदस्य होने के नाते, एक दूसरे को सहारा देकर आगे बढ़े हैं। पुराने जमाने में राजा के बेटे को ही राजा बनाया जाता था। रामायण और महाभारत की कहानियों में इसका विस्तृत उल्लेख मिलता है। पुराने जमाने के और भी कई उदाहरण इस तरह के हैं। सामान्य लोगों में भी यही होता आ रहा है। एक दुकानदार अपने ही बेटे, बेटी, जमाई या भाई-भतीजे को आगे के लिए दुकान का कारोबार सौंपता है।

हां, नया व्यवसाय शुरू करने वालों की तादाद भी बहुत बड़ी है। नई दुकान शुरू करनी या फिल्म उद्योग में किसी रिश्तेदार या पहचान वाले के बगैर कदम रखना साहस का कार्य है। इसमें आपकी योग्यता देखी जाती है। यहां भी योग्यता के बल पर काम में सफलता प्राप्त की जा सकती है। ऐसा नहीं कि वंशवाद के चलते किसी नए व्यक्ति को मौका नहीं मिल सकता। अगर ऐसा होता तो जाने-माने कलाकार, जो फिल्म उद्योग के लिए बाहर के व्यक्ति हैं; कामयाब नहीं हो सकते थे। इन सभी को उन्हीं लोगों ने आगे बढ़ने का मौका दिया, जो पहले से इस क्षेत्र में रचे-बसे थे। उन्होंने अपने अपने बेटे-बेटियां और अन्य रिश्तेदारों के आसपास होते हुए भी बाहरी व्यक्तियों को काम करने का मौका उपलब्ध कराया।

मेरे पड़ोसी की मिठाई की दुकान है। उनकी दुकान पुरानी थी और बहुत अच्छी चल रही थी। उन्होंने उम्रदराज होने पर अपने यहां काम करने वाले कुशल नौकर की योग्यता पहचानी और उसे अपनी दुकान का कारोबार सौंप दिया। वह दुकान अच्छे से संभाले हुए है। दरअसल, हमारे पड़ोसी का अपना बेटा वकील है और वह अपने आप को मिठाई की दुकान चलाने योग्य समझता नहीं था, इसलिए उन्हें यह निर्णय लेना पड़ा। बेटा भी अपने पिता के निर्णय से सहमत है। ऐसा नहीं कि किसी भी क्षेत्र में, बाहरी व्यक्ति को नकारा जाता है या उसे मौके नहीं मिलते। योग्यता सभी जगह पूजी जाती है। इसलिए व्यक्ति की योग्यता का आकलन उसकी बुद्धिमत्ता के आधार पर होना चाहिए, वंश या परिवार को आधार मान कर नहीं।

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