ताज़ा खबर
 

संप्रेषण के तार

आज स्थिति यह है कि ट्रेन के कूपे में बैठा आदमी यात्रा समाप्त होने तक एक दूसरे से एक शब्द भी नहीं बोल पाता। हाथ में मोबाइल होता है और दूर कहीं बात चलती रहती है, पर बगल में बैठे आदमी से दो मीठे बोल भी नहीं बोल सकता।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

हेमन्त कुमार पारीक

मित्र की बुजुर्ग मां गांव से आई हुई थीं। मित्र ने आम दिनों की तरह बुलाया तो मुझे उनकी मां से मिलने का मौका मिला। उनकी उम्र तकरीबन पचहत्तर वर्ष होगी। इतनी उम्र में भी उनका चेहरा सलवट से मुक्त चमकता-दमकता था और वे पूरी तरह स्वस्थ दिख रही थीं। उनके दांत चमक रहे थे और आंखें बड़ी-बड़ी। मुझे देखते ही वे बोली- ‘चश्मा कब से चढ़ा है?’ मैंने कहा- ‘करीब बीस वर्ष हो गए। लेकिन आपको तो अभी भी साफ दिखाई देता है। चश्मा नहीं है। आपकी उम्र की अधिकतर महिलाएं बिना चश्मा के देख ही नहीं पातीं।’ उन्होंने कहा- ‘बचपन में माता-पिता ने ध्यान रखा। हर्बल का रस आखों में डालते थे पिताजी। देशी दवाएं होती थीं और अम्मा हर महीने सरसों का तेल कान में डालती रहीं। परंपरा थी हमारे परिवार में, इसलिए आजतक न तो कभी कान में दर्द हुआ और न आंखें खराब हुईं।’ मैंने सवाल किया कि दांतों के लिए क्या करती थीं तो बोलीं- ‘शुरू में नीम की दातुन करते रहे। नीम बड़ा गुणकारी होता है। हमारे यहां नीम के तीन-तीन झाड़ है। दद्दू ने लगाए थे। एक छोटा-सा बगीचा भी है, जिसमें सभी कुछ है। आंवला भी है, संतरा, नीबू, सीताफल वगैरह।’ आंवले की मार्फत शायद वे अपने बालों की बात करना चाह रही थीं, जिनकी तारीफ करना मैं भूल गया था। उन्होंने कहा- ‘हर्बल में स्वस्थ रहने की चाभी है। अभी भी बहुत कुछ है जो हम भूल गए हैं। वैसे हर्र-बहेड़ा, आंवला तो ज्यादातर लोग जानते हैं।’ मैंने कहा कि ये हर्बल मैंने सुने हैं। आंवले की उपयोगिता तो सभी जानते हैं, पर हर्र-बहेड़े की उपयोगिता बहुत कम लोगों को पता होगी।’

उन्होंने कहा- ‘एक बार हमारे गांव में आकर देखिए। गांव की आबोहवा में एक विशेष ऊर्जा मिलती है। जो चीजें वहां आसानी से उपलब्ध हैं, यहां बड़ी जद्दोजहद के बाद मिलती हैं। इसलिए शहर में दो दिन से ज्यादा रुकने का मन नहीं करता। ये धूल-धक्कड़, भीड़भाड़ और दिनभर भागता इंसान! वहां सुकून है। आपस में भाईचारा है। यहां तो आदमी पड़ोसी को भी नहीं पहचानता। शाम को घर में घुसा तो फिर सुबह ही बाहर निकलता दिखता है। हमारे घर में गाय, भैंस, तोता-मैना, कुत्ते आदि सब कुछ हैं। शाम को आम और इमली के पेड़ों पर चिड़ियों का चहचहाना इतना कि बगल वाले की आवाज सुनाई न दे। मगर अच्छा लगता है। ये पक्षी भी आपस में बातें करते हैं। उनकी भी अपनी भाषा होती है।’ मैंने कहा- ‘हां, तोता-मैना को लेकर कई जातक कथाएं गढ़ी गई हैं। प्राथमिक कक्षा की किताबों में मिलती हैं, पर ये रूपक बन कर रह गई हैं। बच्चों तक सीमित रहीं। हो सकता है कि ऐसा होता हो। इंसान जानवरों की भाषा समझता हो। विज्ञान कहता है कि पशु-पक्षियों की भाषा हमारी शार्टहैंड भाषा से भी संक्षिप्त होती है। वे भी अपने सुख-दुख की बातें करते हैं।’

वे बोली कि आश्चर्य होता है कि हम उनकी भाषा नहीं समझ पाते, पर वे समझते हैं। हमारे घर में एक कुतिया ब्लैकी है। उसे इसी नाम से पुकारते हैं। बिना किसी ट्रेनिंग के वह सब समझती है। बस कहने भर की देर है। सामने खाना रखा रहता है, पर जब तक उसे खाने को नहीं कहते, वह खाने की तरफ देखती तक नहीं। ऐसे माहौल से जब मैं शहर आती हूं तो बड़ा अजीब-सा लगता है। वहां किसी के घर मेहमान आता है तो सारा गांव इकट्ठा हो जाता है और निमंत्रणों का तांता लग जाता है। शाम के समय चौपालों पर लोग झुंडों में बतियाते दिखते हैं और रात में थकी-हारी औरतें ढोलक पर भजन गाती मिल जाती हैं। संप्रेषण के तार हैं।’ विश्वास नहीं होता अब। गुजरे जमाने की बाते हैं। फिर भी उन्हें देख कर यह लगता तो है।

आज स्थिति यह है कि ट्रेन के कूपे में बैठा आदमी यात्रा समाप्त होने तक एक दूसरे से एक शब्द भी नहीं बोल पाता। हाथ में मोबाइल होता है और दूर कहीं बात चलती रहती है, पर बगल में बैठे आदमी से दो मीठे बोल भी नहीं बोल सकता। लेकिन आदमी के सामाजिक होने की जरूरी शर्त है कि वह आसपास रहने वालों से, चाहे जड़ हो या चेतन, अपने आपको व्यक्त करता रहे। यह संप्रेषण ही उसके अस्तित्व की चाभी है। जैसा कि ऊपर कहा गया है आदमी मूक प्राणियों से भी बतियाता है। वे भी प्यार की भाषा समझते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में हम मंदिर में ईश्वर की अमूर्त अवधारणा से मन की बात करते हैं। उसके सामने याचक की तरह मूक खड़े होते हैं। हमें प्रकृति को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने इन मूक प्राणियों को मोबाइल जैसी इंद्रियों से सुसज्जित नहीं किया। कल्पना करता हूं कि तब क्या होता!

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: स्वार्थ के रिश्ते
2 दुनिया मेरे आगे: सुंदरता के पैमाने
3 दुनिया मेरे आगे: प्रबुद्ध भारत की ओर
यह पढ़ा क्या?
X