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दुनिया मेरे आगेः परंपरा के रंग

इक्कीसवीं सदी में भले ही मनुष्य ने विज्ञान की दुनिया में असीम प्रगति कर ली है, पर समाज में रहते हुए उसे अपने ही बनाए नियमों का पालन करना होता है।

(File Photo)

इक्कीसवीं सदी में भले ही मनुष्य ने विज्ञान की दुनिया में असीम प्रगति कर ली है, पर समाज में रहते हुए उसे अपने ही बनाए नियमों का पालन करना होता है। इस वजह से अपनी दबी हुई रुचियों और कुंठाओं का वह शिकार न हो जाए, इसके लिए समाज उसे कुछ विशेष त्योहारों के रूप में अवसर देता है। जिन चीजों पर समाज में पाबंदी होती है, उन्हें भी कहने या करने की आजादी कुछ त्योहार देते हैं। प्रगतिशील मनुष्य ने अपनी सुविधानुसार इस तरह के त्योहारों में विशेष रुचि दिखाई है, जिनमें वह अपनी दबी इच्छाओं और कुंठाओं को निकाल सके। भारत का प्रमुख त्योहार होली को भी इसी दृष्टि से देखा जा सकता है। परंपरा में मनाई जाती रही होली विभिन्न दंतकथाओं से जुड़ी होते हुई भी अपनी वैज्ञानिकता और सामाजिक सौहार्द की भावना की वजह से विश्वभर में जानी जाती है।

त्योहारों के संबंध में दुनिया भर में लोग उत्सुकता दिखाते हैं। इनके माध्यम से जहां लोगों की सामजिक भागीदारी बढ़ती है, वहीं पर्व संपूर्ण मानवता के लिए प्रेम का संदेश भी लेकर आते हैं। होली के संबंध में प्रकृति भी पूरे जोश-खरोश से भरी होती है। दरअसल इसके पीछे विश्व-मानव की भावना काम करती है जो सभी लोग एक साथ मिल कर इसे मनाते देखे जाते हैं। कहा जाता है कि ‘मनुष्य की सामाजिक स्थिति उसकी आर्थिक स्थिति से तय होती है।’ पर इस दिन सभी लोग रंगों में रंगे एक जैसे नजर आते हैं। यही कारण है कि अर्थाभाव में भी त्योहारों के दबाव से होली हमें पूरी तरह मुक्त करती है। इस दिन हर कोई प्रेम और सौहार्द के रंग में रंगा नजर आता है। इस दिन प्रयोग किया जाने वाला वाक्य ‘बुरा न मानो होली है’ ज्यादातर लोगों की जुबान पर होता है जो बड़े-छोटे के भेद को मिटा देता है।

पूरे विश्व में आधुनिक त्योहारों की शुरुआत लगभग सत्तर के दशक के बाद होती है, जब ये अपनी लय पकड़ते हैं और आज इन्हें दुनिया भर में लोग परंपरा का हिस्सा मान कर मनाते हैं। स्पेन में ‘टोमेटिना फेस्टिवल’ मनाया जाता है, जिसमें दुनिया भर से लोग एकत्रित होते हैं। यह विश्व का बहुत बड़ा सामूहिक आयोजन होता है, जिसमें एक दूसरे पर टमाटर फोड़ कर मारने का चलन है। लोग पूरी तरह टमाटरों के रंग में रंग जाते हैं। वास्तव में यह स्पेन की होली है।

ऐसा ही अप्रैल महीने में मनाए जाने वाले थाईलैंड के ‘वाटर फेस्टिवल’ में देखा जा सकता है, जब वहां गरमी अपने चरम पर होती है और लोग पानी फेंक कर आपस में सभी को भिगोते हैं। इससे जहां गरमी से निजात मिलती है वहीं एक दूसरे पर पानी डाल कर स्नेह प्रदर्शन करने वाले इस त्योहार में रंगों का प्रयोग नहीं होने पर भी लोग पूरी तरह पानी के रंग में रंगे नजर आते हैं। उसे हम थाइलैंड की होली मान सकते हैं। इसी तर्ज पर इटली में ‘आॅरेंज बेटल’ नामक त्योहार मनाया जाता है, जिसमें लोग टीम बना कर आपस में संतर फेंक कर आत्मीयता का प्रदर्शन करते हैं। इसका स्वरूप हमारे यहां की होली से कतई भिन्न नहीं है। बल्कि अपने सही अर्थों में यही इटली की होली है। इसके बहाने से लोग एक दिन के लिए सभी से मिलते हैं, खूब खेलते हैं और ढेरों तकलीफों को भुला कर आगे के लिए खुद को तैयार करते हैं।

आस्ट्रेलियाई ‘वाटर मेलन’ त्योहार भी दुनिया भर के लोगों को तरबूज के साथ वही करने की आजादी देता है जो इटली में संतरे और स्पेन में टमाटर के साथ किया जाता है। इसमें कटे तरबूज की खीरी का इस्तेमाल किया जाता है। यह पूरी तरह तरबूजियाई होली है, जिसे मनाने हर साल दुनिया भर से लोग आॅस्ट्रेलिया में इकट्ठा होते हैं। इसी तरह का एक त्योहार साउथ कोरिया में ‘मड फेस्टिवल’ के नाम से मनाया जाता है। इसमें लोग एक दूसरे पर मिट्टी पोतते हैं। यह मिट्टी ही होली के रंगों का प्रतिरूप है। रंगों के स्थान पर मिट्टी का प्रयोग होने से यह हृदय के और नजदीक आ जाता है। इस दिन लोग सब कुछ भूल कर मिट्टी पोतने में मस्त रहते हैं।

ये सभी त्योहार किसी न किसी रूप में होली के प्रतिरूप हैं। आखिर होली की तर्ज पर इन आधुनिक त्योहारों की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? आज सीमाओं में बंधे होने पर भी मानव हृदय को बांधा नहीं जा सकता। इसीलिए शायद होली जैसे त्योहारों की जरूरत संमूचे विश्व को है। दौड़-धूप भरी जिंदगी में कुछ पलों के आनंद के उद्देश्य से लोग दुनिया भर से एक जगह जुटते हैं और होली अपने अलग-अलग रूपों में पूरे साल दुनिया के कई कोने में मनाई जाती है। मानव ने आज बहुत कुछ पा लिया है, पर उसे संपूर्ण विश्व को एक सूत्र में पिरोने की आवश्यकता आज भी है। इसका एक जरिया होली जैसे त्योहार हैं जो अपने वास्तविक संदर्भों में ‘विश्व मानव’ की अवधारणा को पुष्ट करते नजर आते हैं।

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