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दुनिया मेरे आगेः नागरिक का दायित्व

कुछ दिन पहले सुबह छह बजे दिल्ली में गोल मार्केट से राजीव चौक मेट्रो स्टेशन तक पैदल ही चला आ रहा था। सोचा, सुबह-सुबह तो शहर यातायात की रेलमपेल और लोगों की भीड़भाड़ से मुक्त होकर शांत-सुंदर लग रहा होगा।

Author March 16, 2016 3:46 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

विवेक कुमार बड़ोला

कुछ दिन पहले सुबह छह बजे दिल्ली में गोल मार्केट से राजीव चौक मेट्रो स्टेशन तक पैदल ही चला आ रहा था। सोचा, सुबह-सुबह तो शहर यातायात की रेलमपेल और लोगों की भीड़भाड़ से मुक्त होकर शांत-सुंदर लग रहा होगा। लेकिन देश की राजधानी के केंद्रीय स्थल कनाट प्लेस को सुबह-सवेरे ही अव्यवस्था और गंदगी से सना हुआ पाकर मैं भीतर तक दुखी हो गया। जब सबसे सुरक्षित और व्यवस्थित कहे जाने वाले इलाके की यह हालत है तो दूरदराज के क्षेत्रों की दशा क्या होगी! शहीद भगत सिंह प्लेस कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के सामने और पास-पड़ोस की सड़कें तक दुरुस्त नहीं थीं। आसपास गड्ढे थे और कूड़ा-कचरा फैला हुआ था। एक पार्क की लोहे की छड़ों से बनी चारदिवारी जगह-जगह से टूटी-फूटी हुई थी। पार्क में हरी घास के बजाय सूखी जमीन थी और मिट्टी फैली हुई थी। नगर निगम के कूड़ेदान जगह-जगह पर उलटे लटके और टूटे-फूटे हुए थे। आवारा कुत्तों का भौंकना दुर्व्यवस्था के खिलाफ और ज्यादा विचलित कर रहा था। पेड़-पौधों का रूखा-सूखा स्वरूप देख कर उद्यान विभाग की गैरजिम्मेदारी और अकर्मण्यता साफ दिखाई दे रही थी।

वहीं रीगल सिनेमा हॉल के पास लगने वाले बाजार के पैदल-पथ से चलते हुए सड़क पर यह सोच कर रुक गया कि भूमिगत मार्ग का द्वार अभी खुला नहीं है, इसलिए यहीं से सड़क के उस पार चला जाऊं। जैसे ही दो कदम आगे बढ़ा, गलत लेन में चलती हुई एक कार तेजी से आई और मेरी सांसों को अटका कर चली गई। अगर खुद को नियंत्रित नहीं करता तो कार की टक्कर से पक्का मर जाता। याद आया कि जब एक केंद्रीय मंत्री तक दिल्ली के अस्त-व्यस्त और अनियंत्रित यातायात से खुद को नहीं बचा पाए तो एक आम आदमी के रूप में मेरी क्या औकात!
किसी तरह सड़क पार कर राजीव चौक भूमिगत मेट्रो स्टेशन की ओर बढ़ रहा था तो फिर दाएं-बाएं की सड़कों के किनारे नालियों और गड्ढों में भरे गंदे पानी, मंडराते मच्छरों, फुटपाथ पर सामान बेचने वालों से लेकर खरीदारों द्वारा फैलाई गई दिनभर की गंदगी पर नजर पड़ी। बहुत अफसोस हुआ कि क्या एक परिपक्व लोकतंत्र ऐसा ही होता है? क्या टेलीविजन, इंटरनेट, स्मार्टफोन, जनंसचार माध्यमों (मीडिया) में अपनी-अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाते राजनीतिक दलों का विकास यही है? इसी आभासी प्रगति के घमंड से राजनीतिक दल परस्पर वाद-विवाद में मशगूल हैं। और सामान्य नागरिक भी अपनी जिम्मेदारी से लापरवाह सिर्फ अपने में सिमटे जीते चले जा रहे हैं। नियम-कायदों की बात करके देश और समाज पर शासन करने वाली राजनीतिक पार्टियों पर भी क्या इस बात की जिम्मेदारी नहीं है कि वे कैसा समाज बनाते हैं?

फिर सोचा कि अगर कानून से ही सब कुछ ठीक होता है तो इस स्थान से दिल्ली के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के आवास की दूरी कुछ ही किलोमीटर होगी। जब वे अपने आवास के इतने नजदीकी क्षेत्र में सड़क पर पसरी दुर्व्यवस्था से अनजान हैं तो देश के बारे में तो कहना ही क्या! ऐसे दृश्य देखते हुए लगता है कि राज्य-व्यवस्था में एक आम आदमी के पास खुद को ठगा हुआ महसूस करने के अलावा क्या बचता है!
देशव्यापी स्वच्छता अभियान लोगों के बीच हलचल मचाता है। लेकिन उस दिन राजधानी के केंद्रीय क्षेत्र कनाट प्लेस में ऐसी हालत देख कर लगा कि देश की नागरिक समझ सार्वजनिक दायित्वों के लिए पता नहीं कब विकसित होगी। साफ-सफाई और सद्व्यवहार के लिए पहले तो नागरिकों को खुद ही सचेत होना चाहिए। ऐसा नहीं हो पाता तो शासन-प्रशासन को नागरिकों को इसके लिए किसी रूप में जागरूक और जवाबदेह बनाने के उपाय करने चाहिए।

मैं सेंट्रल पार्क में काफी ऊंचाई पर लहराते राष्ट्रीयता की भावना के तीन रंग के ध्वज के देखते हुए सामने सम्मान भाव से खड़ा था। लेकिन इस ध्वज और लोकतांत्रिक संविधान के आधार पर ही मैं कैसे महसूस करूं कि इस देश के नागरिकों में जागरूकता, दायित्व और लोकतांत्रिक चेतना का विकास हो गया है! हममें से अधिकतर भारतीय क्या प्रगति का नौसिखियापन नहीं ओढ़े हुए हैं? प्रगति के लिए सबको सबसे पहले अपनी-अपनी सोच को एक सार्वजनिक दायित्व-बोध से संचित करना होगा। समाज, पास-पड़ोस में जो भी अव्यवस्थाएं हमें विचलित करती हैं, वे हमारी ही लापरवाही का परिणाम होती हैं। जिस तरह किसी के घर में साफ-सफाई के लिए सरकारी नियम नहीं हो सकते, लेकिन तब भी लोग अपने-अपने घरों को भरसक साफ रखते हैं, उसी तरह की स्वच्छता-भावना लोग सड़कों और सार्वजनिक स्थलों के लिए क्यों नहीं रख सकते! लोगों को बाहर की सफाई के प्रति भी घर जैसी ही जागरूकता अपनानी होगी।

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