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किताबों का दायरा

स्तक, पुस्तक मेला, शिक्षा के संदर्भ में ज्यादातर शिक्षकों और अभिभावकों का यही गड्डमड्ड चेहरा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

मेरे एक संबंधी शिक्षक रहे हैं। उन्हें खूब सफल कहा जाता है, क्योंकि उनके पास लगातार ट्यूशनों की भीड़ लगी रहती है। उनकी बेटी ‘स्टार अप’ पर एक किताब पढ़ रही थी। जब उनकी नजर पड़ी तो पहले उन्होंने उस पुस्तक को उलट-पुलट कर देखा, फिर सूंघते हुए बोले- ‘तुम इस किताब को क्यों पढ़ रही हो?’ बेटी उत्साह और संकोच दोनों भावों से बताने लगी। लेकिन पिता ने कहा- ‘क्या फायदा ऐसी किताबों का! अपना दिमाग खराब करो, दूसरों का भी!’ बेटी तुनक गई और बोली- ‘क्या हम रामायण बांचें? हमें आपने बचपन में रामायण न पढ़ने को दिया होता तो हम भी कहीं के कलक्टर बनते। जब देखो, तब रामायण! पढ़ने में ठीक होने का एक और खामियाजा भुगतना पड़ा कि जिस रिश्तेदार, पड़ोसी के घर अखंड रामायण होती, तो ‘जा बेटी रामायण पढ़ दे जाकर! बस लाउडस्पीकर और माइक पर पढ़े जा रहे हैं रामायण की चौपाइयां! जब भी स्कूल का होमवर्क लेकर बैठो, कुछ पढ़ो, मम्मी का हुक्म कि ‘पढ़ कर कलक्टर नहीं बनोगी, लो इन भाइयों को पकड़ो।’ छोटी उम्र में ही दो-दो भाइयों को संभाला, फिर ऐसे घर में ब्याह।’ बेटी रुआंसी होकर चुप हो गई।

यह संवाद भारतीय समाज की कई परतें खोलता है। थोड़ी देर के लिए सदियों से बदस्तूर जारी लड़की के साथ भेदभाव को नजरअंदाज कर सिर्फ पढ़ने के संदर्भ में इस पर विचार करते हैं। उन दिनों पुस्तक मेला चल रहा था। मैंने उन्हीं मास्टरजी से पूछा- ‘क्या कभी पुस्तक मेले गए?’ उन्होंने लगभग अनसुना करने की कोशिश की। कुरेदने पर बोले- ‘नहीं, हम कभी नहीं गए।’ शायद जो नहीं कहा, वह यह कि इतने बड़े परिवार के बीच हमें पुस्तक मेला जैसी बातों के लिए कभी कहां फुर्सत थी। मैंने फिर कहा- ‘लेकिन आप तो बारहवीं तक के बच्चों को पढ़ाते थे! आप उन्हें तो पुस्तक मेले के बारे में बताते होंगे और वे बच्चे तो जाते होंगे!’ वे यह कह कर उठे और चले गए- ‘नहीं, हमें नहीं पता।’

पुस्तक, पुस्तक मेला, शिक्षा के संदर्भ में ज्यादातर शिक्षकों और अभिभावकों का यही गड्डमड्ड चेहरा है। दिल्ली जैसे शहर में पचास वर्ष बिताने के बाद मास्टरजी का किताबों और शिक्षा के बारे में आज भी कोई बुनियादी अंतर नहीं आया है। लड़कियों के प्रति चाहे बचपन में उनका रवैया हो या आज। और वही किताबों के प्रति। सिर्फ उसे पढ़ो जो पाठ्यक्रम में हो। रटते रहो और विद्यार्थियों के अच्छे नंबर पर साल के अंत में खुशी का भ्रम। ट्यूशन में इसीलिए ऐसे शिक्षक ज्यादा सफल रहे जो नाक की सीध में सिर्फ पाठयक्रम के प्रश्नों की ही बात करें। ऐसे मां-बापों की भी कभी नहीं जो पाठ्यक्रम से इतर कोई किताब बच्चों को छूने भी नहीं देते। लेकिन बच्चों में न पढ़ने को दोष हर समय उनकी जुबान पर रहता है।

मैंने मास्टरजी की बेटियों और बेटों से एक साथ पूछा कि क्या कभी पिताजी ने आपको ऐसी किताब का नाम बताया या उसके बारे में बताया जो जरूर पढ़नी चाहिए। पांचों चेहरों पर सपाट चुप्पी थी। सभी एक से सांचे में ढले थे। या तो उन्होंने सिर्फ कोर्स की किताबें पढ़ी थीं या फिर कोई धर्म ग्रंथ। पूरे हिंदी समाज की सोच इसी से मिलती-जुलती है। मैंने करीब चालीस से पचपन की उम्र के घेरे पहुंच चुके उन बेटे-बेटियों से अगला प्रश्न किया कि आप अपने बच्चों को, रामायण और कोर्स की किताब के सिवा कौन-सी किताब का नाम सुझाएंगे! कहने की जरूरत नहीं, फिर उनमें से किसी के पास कोई जवाब नहीं था। यानी दो-तीन पीढ़ियां दुनिया भर के ज्ञान-विज्ञान की किताबों से वंचित, बंजर। इस बात की भी पुष्टि हुई कि अगर आप चाहते हैं कि बच्चे पढ़ें तो आपका भी कुछ दायित्व है।

पढ़ने-पढ़ाने के संदर्भ में स्कूल के साथ मां-बाप, समाज, रिश्तेदार सभी की भूमिका पर यहां प्रश्न उठता है। न शिक्षक पढ़ने और ज्ञान के संस्कार दे रहा है, न मां-बाप। जिन्हें वे संस्कारों का नाम देते हैं वे हैं मंदिर-मस्जिदों की परिक्रमा। यह वही समाज है जो आजादी के बाद सरेआम कहता रहा है कि लड़के की तनख्वाह तो इतनी है, लेकिन ‘ऊपरी आमदनी’ बहुत है; उसके घर तो काम करने वाले अर्दली हैं और वह जब चाहे दफ्तर जाए, न जाए! यानी निकम्मेपन, बेईमानी, भ्रष्टाचार की साक्षात प्रतिमूर्ति। वंशवादी राजनीति और नवजात लोकतंत्र के नाम पर यही होना था और इसलिए ऐसी शिक्षा-व्यवस्था गढ़ी गई जो आज भी यथास्थितिवादी है।

ग्लोबलाइजेशन का इतना तो आभार है कि सरकारी नौकरियों का चौखटा ही नहीं तड़क रहा, मोबाइल, मीडिया, सूचना तकनीक की खिड़कियों से ऐसी रोशनी भी आ रही है जो प्रौढ़ महिलाओं को अपने मां-बाप से प्रश्न-प्रतिप्रश्न करने की हिम्मत भी दे रही है। निस्संदेह इस चेतना को शिक्षा के माध्यम से पूरे देश में जल्दी से जल्दी फैलाने की जरूरत है- विशेषकर धर्म के नाम पर बढ़ते उन्माद के दौर में।

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