ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: जीवन का पहिया

अगर हम आज बेहतर परवरिश करें तो हमें आने वाले कल के लिए ज्यादा माथापच्ची न करना पड़े। बच्चों के सवाल रोचक और कई बार गंभीर प्रवृत्ति के होते हैं और कभी-कभार तो उनके प्रश्नों से पेट में गुदगुदी शुरू हो जाती है और चेहरे पर मुस्कान की छटा बिखर जाती है। यह तनाव की लकीरों को मिटा कर हमें खुश होने का अवसर प्रदान करता है।

Author Published on: July 1, 2020 1:16 AM
बच्चों के कोमल मस्तिष्क में सवालों का भंडार और सीखने का असीम चाह है।

कुंदन कुमार
अब अगर कोई कहे कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं, तो शायद ही किसी को यह कोई नई बात लगेगी। लेकिन यह हर कसौटी पर साबित भी होता रहता है। बाल मन में किसी के प्रति कोई द्वेष-भाव, ईर्ष्या या जलन नहीं होता है। उनकी भोली सूरत और मधुर वाणी चेहरे पर तनाव की लकीरों को मिटा कर अनमोल मुस्कान की छटा बिखेर जाती है। शायद बच्चे जब कोई गलती करके भोली सूरत बना कर अपनी बेगुनाही का प्रमाण अपने अभिभावक के सामने प्रस्तुत करते हैं तो पत्थर दिल इंसान का भी कलेजा उनके भोलेपन से पिघल जाता है।

सुबह-सुबह उठते ही पेड़-पौधों के सान्निध्य में टहलना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होता है। जब हम इस नुस्खे से अनभिज्ञ थे, उसी समय से इसे मैंने अपनी आदत में शुमार कर लिया था। हरी-हरी मुलायम घास के ऊपर ओस की बूंदों पर पांव रखना मुझे बहुत भाता था और यही वजह है कि गांव की टूटी पगडंडियों से शहर की चमचमाती सड़कों के चकाचौंध में भी मैंने प्रकृति से अपना नाता जोड़े रखा।

आजकल सुबह की पहली किरण के साथ प्रकृति का सौंदर्य निहारने मैं घर से निकलता हूं तो तीन साल का मेरा भतीजा भी मेरे साथ-साथ होता है। बचपन में जब मैं अपने दादा जी के साथ प्रकृति दर्शन के लिए निकलता था तो मैं उनसे ज्यादा सवाल-जवाब नहीं करता था। मैं सिर्फ उनके पीछे-पीछे चलता था। लेकिन आजकल के बच्चे बात-बात पर सवालों की बौछार शुरू कर देते हैं और होना भी यही चाहिए कि बचपन में ही हम बच्चों को ‘सवालों की संस्कृति’ से अभ्यस्त करा दें, ताकि आगे चल कर वे जिम्मेदार नागरिक बन सकें और अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार और अधिकारों के प्रति सजग रहें।

अगर हम आज बेहतर परवरिश करें तो हमें आने वाले कल के लिए ज्यादा माथापच्ची न करना पड़े। बच्चों के सवाल रोचक और कई बार गंभीर प्रवृत्ति के होते हैं और कभी-कभार तो उनके प्रश्नों से पेट में गुदगुदी शुरू हो जाती है और चेहरे पर मुस्कान की छटा बिखर जाती है। यह तनाव की लकीरों को मिटा कर हमें खुश होने का अवसर प्रदान करता है।

हम पैदल क्यों चलते हैं? घास के उपर पानी किसने डाला? घास की ऊपरी सतह पर ओस की बूंदों को तीन साल का बच्चा आमतौर पर पानी ही समझता है। रात में सूरज के अदृश्य हो जाने की वजह भी अक्सर बच्चे पूछा करते हैं। बच्चों को लगता है कि रात होते ही जैसे वे अपने घरों में कैद हो जाते हैं, वैसे ही सूरज भी रात होते ही अपने घरों में आराम फरमाने चला जाता है। कभी-कभी बच्चे एक ही बात को इतनी बार दोहराते हैं कि उनके अभिभावकों को गुस्सा आ जाता है। अक्सर बच्चों के यक्ष प्रश्न इतने गंभीर प्रवृत्ति के होते हैं कि हम उनके प्रश्नों के सामने निरुत्तर हो जाते हैं।

दरअसल, बच्चा जब मां के गर्भ में होता है, तभी से उसके सीखने की प्रक्रिया की शुरुआत हो जाती है। लिहाजा महिलाएं जब गर्भावस्था में होती हैं, तो उन्हें सलाह दी जाती है कि वे अच्छी किताबें पढ़ें और अच्छी-अच्छी बातें सुनें, ताकि उनका बच्चा सभ्य और ज्ञानी हो। एक महिला ने अपनी पड़ोसन से पूछा कि आपका बच्चा हमेशा किताबों में खोया रहता है… मैं जब भी आपके घर आती हूं, तो इसे पढ़ते हुए देखती हूं। वहीं मेरा बेटा आपके बेटे का हमउम्र है, लेकिन वह हमेशा मोबाइल फोन में खोया रहता है।

वह कभी धोखे से भी किताब के पन्नों को नहीं पलटता है। पड़ोसन बोली कि मेरा बेटा मुझे हमेशा किताबों से चिपके हुए देखता है और शायद यही वजह है कि इसको किताबों से यारी है। दरअसल, बच्चों के सीखने की क्रिया में आसपड़ोस के वातावरण का महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। अगर हमारे आस-पड़ोस का वातावरण दूषित और हिंसक होगा तो हमारे बच्चे भी आगे चल कर वैसे ही हो जा सकते हैं।

हालांकि उन्नीसवीं शताब्दी में बालकों के लालन, पालन और शिक्षण के लिए बाल मनोविज्ञान की आवश्यकता संसार के प्रमुख विद्वानों ने महसूस की थी, लेकिन इसका ठीक से विकास बीसवीं शताब्दी में ही संभव हो सका। सबसे पहले दार्शनिक हरबर्ट स्पेंसर ने इस बात पर जोर दिया था कि हरेक नागरिक की शिक्षा में बाल मनोविज्ञान की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। विभिन्न अध्ययनों से भी यह स्पष्ट हो चुका है कि बाल मनोविज्ञान के बिना हम अपने बच्चों का बेहतर मार्गदर्शन नहीं कर सकते।

जर्मनी के विद्वानों ने बच्चों के सीखने की प्रक्रिया पर अनेक प्रयोग किए और सीखने की क्रिया के गूढ़ रहस्य को समझाने के लिए मौलिक खोज की। उसमें यह बात उभर कर सामने आई कि मानसिक विकास मानव जीवन में बाल्याकाल से लेकर प्रौढा़वस्था तक जारी रहता है। हमारे बच्चों का आने वाला कल सुखमय हो सकता है, अगर हम अपने जीवन का कुछ पल उन्हें दे दें। उनके साथ समय बिता कर हम अपने तनाव को तो कम कर ही सकते हैं, साथ ही उनके शारीरिक तथा मानसिक विकास के क्रम को आसानी से समझ कर उनके जीवन के पहिए को सकारात्मक दिशा प्रदान कर सकते हैं।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: पैरोडी की कला
2 दुनिया मेरे आगे: समय का चक्र
3 दुनिया मेरे आगेः सुनने की सलाहियत