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दुनिया मेरे आगे- बाल साहित्य मेला

भरत-मिलाप से लेकर रामलीला और धनतेरस के कई मेले लगते थे। धीरे-धीरे हम ‘बड़े’ होते गए और हमारे जीवन में इन आनंद के मेलों की जगह छोटी होती गई।

Author November 20, 2017 5:13 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो)

दीनानाथ मौर्य 

मेले सामुदायिक जीवन की सार्वजानिक अभिव्यक्ति हुआ करते हैं। पूरा का पूरा समाज वहां अपने तमाम रिश्तों-नातों के साथ उपस्थित होता है। बचपन के मेलों में हम केवल खरीदारी करने नहीं जाते थे। हमारी खरीदारी के और-और भी जरिए और जगहें हुआ करती थीं। स्कूल के लिए सिलाए नए कपड़ों को भी मेला जाने के लिए बचा कर रखते थे और उसकी धौंस मेलों में अपनी दोस्त मंडली में जमाते थे। हमारे लिए मेलों का मतलब उछल-कूद और हंगामा भी हुआ करता था। घर से लेकर बाहर तक। मेले में हम मिलने-मिलाने, खुल कर खेलने और खुद के निर्णय के क्षणों को जीने भी जाते थे। अपने इन गांव के मेलों के लिए हमारे जेहन में मेला शब्द एक भीड़ का आयाम लेकर बसा हुआ था और ‘भीड़’ भरे मेले के कई रूप हमने बचपन से अब तक देखे थे। उन दिनों गांव में लगने वाला तेरस (महाशिवरात्रि) का मेला हम बच्चों के लिए साल भर बातचीत का मसाला दे जाता था। गुड़ की जलेबी इन मेलों का पर्याय होती थी। हम मेले में भी उसका स्वाद लेते थे और घर आकर भी जलेबी पर अपनी हिस्सेदारी जताते थे। दशहरा और दीपावली जिस महीने में होती थी, वह मेलों के जश्न का महीना हुआ करता था।

भरत-मिलाप से लेकर रामलीला और धनतेरस के कई मेले लगते थे। धीरे-धीरे हम ‘बड़े’ होते गए और हमारे जीवन में इन आनंद के मेलों की जगह छोटी होती गई। ‘बड़े बाजार’ हमारे अनुभव का हिस्सा बनते गए। और हमारे बचपन की दुनिया सिमटती गई। उत्तराखंड में पिछले दिनों एक मेले में जाने का अवसर मिला। यह एक अनोखा मेला था जिसने मेरे जेहन में बनी हुई मेले की शक्ल को एक नया आयाम दिया। दरअसल, यह अठारह स्कूलों के बच्चों और शिक्षकों द्वारा आयोजित ‘बाल साहित्य मेला’ था। इस पूरे मेले में सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को देखा। इसकी संकल्पना से लेकर आयोजन तक में हिस्सेदारी की। बच्चे भाषा पढ़ और लिख तो रहे ही थे, साथ ही जिसे हम ‘भाषा का बरतना’ कहते हैं उसके लक्षण भी बच्चों की रचनाओं में साफ दिखाई पड़ रहे थे। इस बाल साहित्य मेले में शामिल अधिकांश लोग सरकारी स्कूलों के थे, जो शिक्षा में तथाकथित निजी स्कूलों की चमक-दमक से दूर एक नई संस्कृति की पौध तैयार कर रहे हैं। यह देखने में खुरदुरी जरूर लग रही थी पर उसमें न्याय और समतापूर्ण समाज के निर्माण का एक स्केच तैयार हो रहा था। एक लोकतांत्रिक समाज की डगर के राही उन बच्चों के साथ काम करना, जो अभी स्कूल में हैं, एक अनोखा अनुभव रहा। मैंने देखा कि उनमें से अधिकांश बच्चे कमोबेश कमजोर वर्ग के थे, लेकिन उनमें प्रतिभा की कमी नहीं थी।

सीखने की पूरी प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बनाता यह मेला कई तरह से हमारे नजरिए को खोलता है। सीखना केवल बंद कक्षाओं में नहीं होता। भाषा का सीखना दरअसल समूची समझ का विकास करना है। सभी विषयों की प्राथमिक कक्षाएं बुनियादी रूप में भाषा की ही कक्षाएं होती हैं और यहीं से अंतर-विषयक ज्ञान के कई आयाम खुलते हैं। यह मेला इस बात का भी साक्षी रहा कि मौके दिए जाएं तो बच्चे कठिन से कठिन चीज सीखने को भी उत्सुक रहते हैं। मेले में कक्षा एक से लेकर आठवीं तक के विद्यार्थियों ने अपनी स्वरचित कविताओं, कहानियों, संस्मरणों वगैरह की प्रदर्शनी लगाई। हल्की ठंडी हवाओं के साथ पहाड़ की गोद में लगे इस मेले में बच्चों की दुनिया हमारे सामने थी।  हमने उनकी प्रदर्शनियां देखीं और उनकी क्षमताओं को पहचाना। अलग-अलग स्कूल के स्टाल थे और हर स्टाल पर संबंधित स्कूल के शिक्षक-विद्यार्थी और अभिभावक तथा समाज के लोगों की उपस्थिति एक नई ऊर्जा का सृजन कर रही थी। ‘बाघ की कहानी’, ‘नाना के घर की कहानी’, ‘पिता की पहली डांट’, ‘शिक्षक के साथ की गई यात्रा’ से लेकर ‘बिल्ली मौसी की कविता’ और ‘दूध-भात वाली दादी’ जैसी बाल रचनाएं हमारे सामने थीं। यहां किसी और चीज की दुकान न थी। साहित्य ही हमारे चारों तरफ बिखरा हुआ था और यह साहित्य बच्चों का लिखा हुआ था, जो हम जैसे ‘बड़ों’ के ज्ञान का विस्तार कर रहा था। बच्चे अपने बाहर और अंदर की दुनिया को अक्षरों की शक्ल में देख पा रहे थे। हमने यह भी देखा कि जो बच्चे पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे वे भी इस मेले में जिज्ञासु दर्शक की तरह मौजूद थे। इस पूरे माहौल में बच्चे खूब आनंदित हो रहे थे। मेला ऐसा भी हो सकता है! यह जानकर सुखद लगा। सचमुच एक सार्थक प्रयास।
हमें इसमें गांव वाले मेले की जलेबी तो नहीं मिली, पर जो कुछ मिला वह जलेबी से कम मीठा न था। लौटते समय मैं यही सोच रहा था कि ऐसे मेले जगह-जगह आयोजित होने चाहिए। वैसे तो दिल्ली से लेकर तमाम शहरों में साहित्य और संस्कृति के बड़े-बड़े मेले लगते हैं, लेकिन यहां दूरदराज जगह पर यह मेला बहुत कुछ कह गया।

 

 

 

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