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दुनिया मेरे आगेः बदलती दुनिया में बच्चे

इस दौर में दुनिया भर में जो बहसें हो रही हैं, उनमें एक अहम मुद्दा यह भी है कि महामारी पर दुनिया की प्रतिक्रिया मनुष्य और उसकी बनाई व्यवस्था को किस हद तक प्रभावित करेगी, उन्हें कितना बदलेगी!

Author Published on: May 30, 2020 1:23 AM
बच्चे अब पूरे दिन टीवी या मोबाइल से चिपके रहने पर मजबूर हैं।

मोनिका भाम्भू कलाना

दरवाजे पर खड़े मेरे पांच साल के भतीजे से किसी ने पूछा कि कहां थे, आजकल दिखे नहीं! कहीं चले गए थे क्या? बच्चे ने कहा- ‘घर पर ही पड़ा रहता हूं। कहीं नहीं गया’। इस ‘पड़े रहने’ में कितनी जबर्दस्ती का भाव है जो तल्खी का रूप ले चुका है। इससे भी बड़ी बात है कि छोटे बच्चों तक को यह बात महसूस हो रही है। बच्चे, जो दिन गिन कर छुट्टियों का इंतजार करते थे, उनमें से कई तो रविवार की उम्मीद से ही छह दिन काटते थे, वे भी अब इस पूरी प्रक्रिया से परेशान हो चुके हैं। उन्हें यह बात अच्छी तरह समझ आ गई है कि केवल घर में रहना बेहद उबाऊ और थका देने वाली क्रिया है। व्यावहारिकता न समझने वाले बचपन के लिए तो यह यों भी किसी सजा से कम नहीं। गांव के वे बच्चे जो स्कूल से आते ही बस्ता फेंक देर रात मां की आवाज पर खाना खाने और सोने भर के लिए घर की तरफ आते थे, अब पूरे दिन टीवी या मोबाइल से चिपके रहने पर मजबूर हैं। यह उनकी आदत ही नहीं, सेहत पर भी नकारात्मक असर डालेगा।

फिक्र की एक वजह यह भी है कि आगे उनकी विद्यालयी दुनिया का क्या होगा, इसका कुछ भी अंदाजा अब तक नहीं लग पाया है। इसके अलावा, अमूमन घरों में पिता बाहर काम करते हैं और बच्चों को मां ही संभालती है। इस वजह से बच्चों का अपनी मां के साथ रिश्ते में जितनी सघनता और सहजता होती है, पिता से अक्सर उसी अनुपात में डर और गंभीरता का नाता होता है। आजकल बच्चे भी बड़ों की टोकाटोकी को हस्तक्षेप समझने लगे हैं और वे अपनी दिनचर्या में होने वाले बदलाव के प्रति सहज प्रतिक्रिया भी करते हैं। ऐसे में घर के सभी सदस्यों के प्रति अपनी समझ में बुनियादी परिवर्तन की भी उन्हें जरूरत पड़ रही है। इसके लिए उन्हें मानसिक तैयारी का अवसर भी नहीं मिल पाया। माता-पिता हर वक्त बच्चों को खाली देख कर यही कहते हैं कि पढ़ो, किताब हाथ में ले लो।

खाली आदमी के पास फुर्सत सबसे कम होती है। वयस्कों के आनंद का विषय केवल एक है- मोबाइल पर समय बिताना। गृहिणियों का काम पहले की तुलना में बढ़ा है। बच्चों के हिस्से का मां का वक्त और कम हो गया है। अकेलापन और संवादहीनता भी बच्चों को ही झेलनी पड़ रही है। असमय ही जिस चिड़चिड़ेपन से वे घिर रहे हैं, उसकी कोई भी वजह जानने-समझने के लिए अभी वे बहुत छोटे है। उनके अभिभावकों को भी नहीं समझ आ रहा कि आखिर कैसा व्यवहार उनके बच्चों के मन को माहौल के तनाव से उत्पन्न इस द्वंद्व से बचाने में कामयाब रहेगा!

इस दौर में दुनिया भर में जो बहसें हो रही हैं, उनमें एक अहम मुद्दा यह भी है कि महामारी पर दुनिया की प्रतिक्रिया मनुष्य और उसकी बनाई व्यवस्था को किस हद तक प्रभावित करेगी, उन्हें कितना बदलेगी! हमें यह भी सोचना चाहिए कि बच्चों की दुनिया में इस समय का हस्तक्षेप कहीं गहरा है और उनका भविष्य, जो दोस्तों के साथ खेलने से जुड़ा था, वर्तमान से भी ज्यादा प्रभावित होने वाला है। इसके बाद हम बचपन को किस तरह बचाएंगे, इस पर भी बात होनी चाहिए।

हमारी बनाई सामाजिक व्यवस्था में बच्चे केवल खिलौनों से नहीं, बल्कि असली बच्चों के साथ खेल कर बड़े होते आए हैं। बचपन की स्मृतियां उनकी तमाम उम्र की जमा-पूंजी में काफी इजाफा करती रही हैं। लेकिन क्या अब बच्चों के खेल भी केवल स्क्रीन पर खेले जाएंगे? या फिर बच्चे भी बड़ो की तरह ‘जेंटलमैन’ बन कर घरों की सीमाओं तक खुद को सीमित करके केवल कक्षाओं में टॉप करने की दौड़ में शामिल होने को ही असली दौड़ समझने लगेंगे? तमाम दुश्वारियों के बावजूद समय से पहले समझदार होते हुए बचपन के हिस्से जो थोड़ी उछल-कूद अब भी बची थी, क्या वह भी अब छिन जाने वाली है?

सवाल केवल बचपन का नहीं, परवरिश के अब तक के तरीकों में बदलाव का भी है। यह एक बड़ी समस्या है कि बच्चों के मामले में जिस अतिरिक्त सावधानी की जरूरत है, उसकी दुहाई हर कोई दे रहा है, लेकिन जो अतिरिक्त संवेदनशीलता बचपन के साथ अभिन्न है, क्या हम उसे रखने में कामयाब हो पाए हैं? तन के स्वास्थ्य से कहीं अधिक मायने मन की खरोंच के हैं और खरोंच कोई स्थायी निशान न बन सके इसके लिए बेहद सतर्कता की जरूरत है। बाल्यावस्था का यह समय सामाजिक व्यवस्था के प्रति उनकी अवधारणाओं के बनने में बड़ी भूमिका निभाता है। ऐसे में जरूरी है कि हम उनमें मनोग्रंथियां बोने के बजाय सकारात्मकता रोपने में कामयाब हो पाएं। बच्चे अभी तो अपना पक्ष नहीं रख सकेंगे, लेकिन भविष्य में जवाब अवश्य मांगेंगे। इसलिए उनके प्रति हमारी पीढ़ी की जिम्मेदारी दोहरी हो जाती है। इस पर न केवल नए सिरे से विचार किया जाना चाहिए, बल्कि उपलब्ध तमाम विकल्पों और संभावनाओं के बारे में शीघ्र सचेत प्रयास की जरूरत है।

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