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दुनिया मेरे आगेः बचपन के बोल

यह कुछ अफसोस की बात है कि आज हम कई बाल-सुलभ चीजें बड़ों में कम पाने लगे हैं। बिस्मिल्ला साहब की हंसी-मुस्कान हो या फिर लाल बहादुर शास्त्री का बच्चों जैसा चेहरा, कहां देखने को मिलते हैं।
प्रतीकात्मक चित्र

वह बच्चा सात-आठ साल का है। उसके माता-पिता को शायद ‘धानी’ रंग पसंद होगा, इसलिए उसका नाम धानिन रख लिया गया होगा। पिछले दिनों मुंबई से अपनी मां के साथ आया था। मुझसे भी मुलाकात हुई। मैंने संवाद के लिए बच्चे से पूछा कि कहां रहते हो, तो उसने बताया- ‘बाम्बे में।’ मैंने पूछा- ‘मां मारती तो नहीं?’ तो उसने कहा कि ‘नहीं।’ फिर मैंने पूछा- ‘और पापा’, तब उसने कहा, ‘वे काम करते हैं। मेरे साथ खेलते नहीं।’ मैंने बात बढ़ाने के मकसद से जानना चाहा- ‘बाम्बे में क्या-क्या है?’ उसने कहा- ‘समुद्र।’ मेरा अगला सवाल था- ‘समुद्र क्या होता है’ तो उसने संक्षिप्त उत्तर दिया- ‘पानी।’

मुझे यह उत्तर बहुत अच्छा लगा और मैं हंसा। वहां बैठे बाकी सब भी हंस पड़े। वह कुछ चौंक कर हमारी ओर देखने लगा। मैंने कहा कि तुमने बहुत अच्छी बात बताई है। मैंने भी देखा है समुद्र! उसमें बहुत पानी होता है। उसने सहमति में सिर हिलाया और कुछ निश्चिंत हुआ कि उसकी बात को हंसी में नहीं उड़ाया गया है। उसके उत्तर से सभी खुश हैं। हमारी बातें कुछ देर तक चलती रही, फिर उसने कागज और पेन मांगा, एक ड्राइंग बनाने लगा।

मैं सोचने लगा कि जब उसने ‘पानी’ कहा था तो निश्चय ही उसके मन में ‘बहुत’ शब्द भी रहा होगा। बचपन में ऐसा होता है। हमें बताया जाता है कि अमुक चीज के लिए कौन-सा शब्द है और हम धीरे-धीरे उसे सीख लेते हैं। फिर उसी चीज को उसके भिन्न आकार-प्रकारों से जोड़ कर छवि बनाते जाते हैं। गिलास का पानी भी पानी होता है और नल का भी, चिड़ियों की प्यास के लिए रखे जल-पात्र का भी। फिर बारी आती है तालाब, नहर, नदी, झील, समुद्र की। लेकिन जाहिर है कि जब समुद्र का परिचय धानिन ने ‘पानी’ कह कर दिया तो वह उसमें बहुत ज्यादा पानी ही देख रहा था।

बच्चों के ‘उत्तर’ सचमुच बहुत दिलचस्प होते हैं। उनके बोल हमें बहुत प्यारे लगते हैं। अचरज नहीं कि किसी बच्चे से पूछा जाए कि पर्वत क्या होता है, तो वह कह बैठे- ‘ऊंचा।’ और सिर्फ इतना कह कर अपनी पूरी बात आप तक पहुंचा दे पर्वत की। निश्चय ही बचपन में शब्द-भंडार कम होता है और इसीलिए ‘वाक्य बनाओ’ जैसे पाठ भी स्कूली किताबों में होते हैं। लेकिन उस दिन मुझे यह सूझा कि बच्चों के संक्षिप्त उत्तरों का कारण चाहे जो भी होता हो, उनसे अभिव्यक्ति की यह ‘संक्षिप्त’ सीखने लायक है। बड़े होकर हम कई बार ‘बात का बतंगड़’ तो बनाते ही हैं, कई बार अनावश्यक और अतिरिक्त भी बहुत कुछ कहते हैं लिखने-बोलने में।

फिर ध्यान इस ओर भी गया कि आज कंप्यूटर के जमाने में संदेशों में अक्षरों और शब्दों की जो संक्षिप्ति बरती जा रही है, वह भी जाने-अनजाने कितनी नटखटी बन जाती है और उसमें से एक बचपना-सा झलकता है। भाषा का इस्तेमाल हम कई तरह से करते हैं बचपन से ही। आपने गौर किया होगा कि अक्सर बच्चे किसी ओर संकेत करते हुए इतना भर कहते हैं- ‘वो’, भले ही उन्हें उस चीज का नाम मालूम हो या न हो।

सोच रहा हूं कि बचपन के बोल हमें प्यारे क्यों लगते हैं! शायद इसलिए कि बड़ों की भाषा और भाषा को बरतने के ढंग से उनकी ‘भाषा’ बहुत भिन्न होती है। यह ‘भिन्नता’ हमें उनकी ओर नए सिरे से खींचती है। हम कौतूहल और विस्मय से उनकी बातें सुनते हैं। सच पूछें तो उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया, उनका बोलना, हंसना-फिरना सब हमें अच्छा लगता है। सूरदास के यहां बाल्य काल का वर्णन सचमुच अपूर्व है। केवल मनुष्यों का नहीं, जीव-जंतुओं का शैशव भी कितना आकर्षित करता है। नवजात बिल्ली के बच्चे में या फिर सिंह और बाघ के या चिड़ियों के, हम अपनी बोली और चाल में एक मधुरता का संदेश देते हैं। एक मिठास का! ‘अज्ञेय’ ने अपनी दूर्वादल कविता में याद किया है, न ‘विहग शिशु मौन नीड़ों में’। हां, पशु-पक्षी संसार के शिशुओं का ‘मौन’ भी प्रिय हो जाता है हमें।

यह कुछ अफसोस की बात है कि आज हम कई बाल-सुलभ चीजें बड़ों में कम पाने लगे हैं। बिस्मिल्ला साहब की हंसी-मुस्कान हो या फिर लाल बहादुर शास्त्री का बच्चों जैसा चेहरा, कहां देखने को मिलते हैं। पिकासो ने कहा था कि ‘मैं बच्चों की तरह के चित्र बनाना चाहता हूं’ तो इसीलिए कि जो बाल-सुलभ है, उसे खो देने पर बहुतेरे ‘बड़ों’ को लगता है कि हम उसे फिर से पा लें तो कैसा रहे! कभी किसी एक बच्चे को ही नहीं, दो-तीन बच्चे-बच्चियों को आपस में बात करते हुए सुनिए, उनकी बतकही, उनकी चंचलता, उनका मौन, फुसफुसाना, विस्मय, उनके शब्द मन मोहने वाले ही लगेंगे। वहीं बन जा सकता है ‘समुद्र’ सिर्फ ‘पानी’ और खुल सकता है उसका एक नया अर्थ!

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