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दुनिया मेरे आगे: सीखने के पैमाने

महान दार्शनिक अरस्तू जैसे विद्वानों का मानना था कि सामुदायिक जीवन में पूर्ण सक्रिय भागीदारी और भूमिका निभाए बिना कोई परिपूर्ण मानव बनने की आशा नहीं कर सकता।

स्कूल से बाहर समाज में जो सीखने का अवसर मिलता है और समाज सिखाता है, वह स्कूल कभी नहीं सिखा सकता है।

आलोक कुमार मिश्रा

मुश्किलों से जूझते हुए लोगों ने धीरे-धीरे वक्त के साथ कदम ताल करना शुरू कर दिया है। इस बीच लोगों के बीच एक बड़ी चिंता बच्चों की पढ़ाई की रही कि स्कूल कब और कैसे खुलेंगे और क्या फिलहाल स्कूलों में बच्चों को भेजना सुरक्षित होगा! इस चिंता के बीच आनलाइन कक्षाएं एक विकल्प के रूप में उभरी हैं, पर उसकी अपनी सीमाएं हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यहां ठहर कर यह भी सोचा जाना चाहिए कि क्या बच्चे सिर्फ स्कूल में रह कर ही सीखते हैं! क्या वे घर पर रह कर अपने परिवार, पड़ोस और साथियों के बीच बच्चे ऐसा कुछ नहीं सीखते जो जीवन में मूल्यवान हो? प्रतिस्पर्धा आधारित स्कूलों की चूहा-दौड़ से परे क्या यह पारिवारिक, सामुदायिक मूल्यों को सीखने का चाहे-अनचाहे मिला अवसर नहीं है?

दरअसल, हमारा आधुनिक समाज शिक्षा को औपचारिक स्कूली पढ़ाई से जोड़ कर देखने का आदी है। वह इस तथ्य को भी झुठला देना चाहता है कि बच्चे अधिकतर कौशल और मूल्य स्कूल की अनुशासित कक्षा से बाहर अनौपचारिक सामाजिक दायरे में ही सीखते हैं। दुनिया भर में शिक्षाविदों और बौद्धिकों का एक समूह तो संस्थानीकृत स्कूली पढ़ाई के दुष्प्रभावों को जोरदार ढंग से रेखांकित करने लगा है। ईवान इलीच जैसे विचारक ने ‘डीस्कूलिंग सोसाइटी’ यानी समाज को स्कूलों से मुक्त करने की बात तक की है। वे स्कूलों को बच्चे की नैसर्गिक क्षमताओं को कुंद करने वाली, स्थानीय-सामुदायिक ज्ञान विवेक का हरण करने वाली और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी अनुशासित और आज्ञापालक नागरिक बनाने वाली फैक्ट्री मानते हैं।

अमेरिकी शिक्षक विद्वान जॉन टेलर गेट्टो अपनी किताब ‘डम्बिंग अस डाउन’ में कहते हैं कि अमेरिकी स्कूल अपने विद्यार्थियों को सात पाठ पढ़ाते हैं- भ्रमित रहना, वर्ग स्थिति बनाए रखना, तटस्थ और उदासीन बनना, भावनात्मक और बौद्धिक रूप से निर्भर बनना, संपूर्ण आत्मसम्मान के बजाय कामचलाऊ आत्मसम्मान की भावना पैदा करना और निगरानी में रहने को स्वाभाविक मान लेना। गेट्टो यह भी कहते हैं कि अपने अनुशासित और खंडित जीवनचर्या से स्कूल हमारे शिशुओं को सामुदायिक जीवन में सक्रिय भूमिका का निर्वहन करने की संभावना से दूर ले जाता है। जबकि अरस्तू जैसे विद्वानों का मानना था कि सामुदायिक जीवन में पूर्ण सक्रिय भागीदारी और भूमिका निभाए बिना कोई परिपूर्ण मानव बनने की आशा नहीं कर सकता।

स्कूलों की इस तरह की आलोचना को हम भले ही पूरी तरह से स्वीकार न करें, लेकिन इतना तो मानेंगे ही कि आज स्कूलों ने बच्चों के पूरे बचपन को गंभीर रूप से अपने घेरे में ले लिया है। स्कूली समय के बाद भी बच्चों को होमवर्क और ट्यूशन जैसी अनिवार्य-सी बन चुकी गतिविधियों में खपना होता है। खेलने-कूदने, गप्प मारने, प्रकृति को निहारने और उच्च और मध्यवर्गीय परिवारों में घरेलू कामों में बड़ों के साथ संलग्न होते हुए सीखने के अवसर लगभग शून्य हो गए हैं।

मुझे अपने बचपन के दिन याद हैं जब हम बच्चों को स्कूल जाने के अलावा भैंस चराने, घास काटने, पोखरे और नदी में नहाने, खेलने-कूदने, खेत के सामूहिक कामों में भागीदारी करने, प्रकृति के नजदीक रहने के ढेरों अवसर मिलते थे। इस सूची में जिसे हम विशुद्ध काम समझ रहे हैं, दरअसल वे हमारे लिए साथियों के साथ मिलने, खोज करने, खेलने और कल्पना करने के अवसर भी थे। स्कूलों में भी आज के जैसी प्रतिस्पर्धा की जगह समूह में मिलजुल कर सीखने, मूल्यों को प्रदर्शित करने और अल्प निगरानी और नियंत्रण करने की प्रवृत्ति थी। ऐसा वातावरण सहज सीखने के अवसरों से भरा था, जो समाज से पूरी तरह संबद्ध भी होता था। पर आज इसकी घोर कमी महसूस होती है।

आखिर क्यों आज बहुत से पढ़े-लिखे और सफल लोग अपने समाज और समुदाय से कट कर रहना पसंद करते हैं? आज पूरी दुनिया में ‘होमस्कूलिंग’ (घर पर शिक्षा) और ‘अनस्कूलिंग’ (स्कूल में प्रवेश नहीं लेना) आंदोलन अपनी जगह बना रहा है। अकेले अमेरिका में दस लाख से अधिक अभिभावकों ने बच्चों को घर पर शिक्षा देने का विकल्प चुन लिया है। हमारे देश में बहुत सीमित ही सही, पर कुछ अभिभावक इसे अपना रहे हैं। हालांकि ये सब सुविधाप्राप्त वर्गों के ही विकल्प हैं।

यों पिछले कुछ महीनों के दौरान घर पर रहते हुए मैं अपने तीन बच्चों के साथ अच्छी तरह जुड़ पाया और उनके सीखने के तौर-तरीकों का अवलोकन भी कर सका। तीनों बच्चे दिनभर तरह-तरह की गतिविधियों और नए कौशल सीखने में संलग्न रहते। साइकिल से अपने पिता को लेकर गुरुग्राम से बिहार गई किशोरी ज्योति पर आॅनलाइन कक्षा में पत्र लिखने का काम मिला तो छोटी बेटी ने साइकिल चलाना सीखना ठान लिया और सीख लिया।

बड़ी बेटी ने यूट्यूब पर देख कर बहुत से क्राफ्ट बनाने की कोशिश की और सफल रही। इसी तरह तीन साल का बेटा अब कुछ देर के लिए अपनी मां के साथ शाम को गली में खेलने के लिए निकलने लगा है। आसपास की महिलाएं और उससे बड़े बच्चे उसके बोलने की क्षमता में हुए विकास पर हैरानी जताने लगे हैं। ये बदलाव बताते हैं कि स्कूल से बाहर की दुनिया में भी सीखना अबाधित रूप से चलता रहता है।

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