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सड़क पर बदलती तस्वीर

भारतीय स्त्रियों का निजी गाड़ी पर सवार होना किसी सामाजिक क्रांति से कम नहीं।

दीप्ति कुशवाह

समय दृश्यों को किस तरह बदल देता है! अधिक समय नहीं बीता, जब युवा लड़कियों को सखियों के घर जाते समय छोटे भाई को साथ रखना पड़ता था। सड़क पर पैदल चलते हुए भी। आज वे स्कूटर और मोटरसाइकिल चलाती, लोगों की आंखों को हैरान-परेशान छोड़ धड़धड़ाती निकल जाती हैं। यह नई स्त्री की तस्वीर है जो टैक्सी-आटो चला रही है, ट्रेन-इंजन दौड़ा रही है, यात्री-विमान से लेकर लड़ाकू विमान उड़ा रही है, पुलिस वर्दी पहनकर गुंडों को पकड़ रही है, पत्रकार के रूप में दूरदराज की खबरें ला रही है। इन स्त्रियों ने परंपरा के पुराने चौखटों को ध्वस्त किया है।

एक समय स्कूटर कंपनियों ने सोचा भी नहीं था कि स्त्रियां इस कदर दुपहिया वाहनों पर आम हो सकती हैं। सिर्फ पुरुषों के लिए गाड़ियां बनती थीं। फिर साइकिल का स्वचालित संस्करण ‘लूना’ आई। कह सकते हैं कि यह इसी युवा पीढ़ी के लिए पहली बार हुआ। इसे स्त्रियों और बुजुर्गों का वाहन माना गया। लड़कियों की क्षमता जांचने का पैमाना कंपनियों को जल्द ही बढ़ाना पड़ा। आज नई उम्र की लड़कियों में भारी तादाद में लड़कियां दुपहिया चला रही हैं।

भारतीय स्त्रियों का निजी गाड़ी पर सवार होना किसी सामाजिक क्रांति से कम नहीं। गाड़ी की सवारी ने स्त्रियों के लिए आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता के नए दरवाजे खोले। स्त्री के पास अपनी गाड़ी है, इसने आम मध्यमवर्गीय परिवारों का चित्र बदल कर रख दिया है। एक छोटी-सी चाबी उनके लिए ‘अलादीन का चिराग’ पाने से कम नहीं। अब वे पति या पुरुष-सदस्यों से चिरौरी नहीं करतीं, खुद गाड़ी स्टार्ट कर निकल रही हैं। स्त्रियों की वाहन-आत्मनिर्भरता के समाजशास्त्रीय मायने हैं। स्कूटर चलाती स्त्रियां परिवार की सोच में आधुनिकता भर रही हैं, बंद सिरों को खोल रही हैं।

सार्वजनिक जीवन में उनकी उपस्थिति बढ़ी है। वे अपने शौक-रुचियों को निखार रही हैं। बच्चों की बेहतर परवरिश कर रही हैं और दूसरों की मदद भी कर रही हैं। घर में आपात-स्थिति आने पर त्वरित मदद ले आना वाहन-चालन से आसान हुआ है। वे सहेलियों से मिल आती हैं, रिश्तेदारी में आना-जाना करती हैं। रास्ते पर अकेली खड़ी, टैक्सी का इंतजार करती या किसी परिचित के आने तक रुकी स्त्री के मुकाबले अपनी दुपहिया पर समय से निकल जाने वाली स्त्री अधिक सुरक्षित है।

इसी दुपहिया-चालन ने मुश्किलें आसान की हैं नौकरी की। आय के बेहतर मौके उपलब्ध कराए हैं। घर और बाहर दोनों मोर्चों पर अपनी काबिलियत साबित करने की लड़ाई आम स्त्री के लिए आज भी आसान तो नहीं है। सामान्यत: यही सुनाया जाता है कि ‘तुमसे न हो पाएगा।’ ऐसे में उसका परिवहन के लिए किसी पर निर्भर होना परिवार के लिए ‘न’ कहने का बहाना हो जाता है। कितने ही परिवारों में स्त्रियां अगर कार्यालय जाने के लिए पुरुष पर निर्भर हैं तो यह रोज होने वाली तू-तू-मैं-मैं का कारण बनता है। जिसकी परिणति उनके लिए नौकरी छोड़ने के विवश निर्णय के रूप में होती है।

स्कूटर के दो पहिए स्त्रियों को आर्थिक सबलीकरण के मार्ग पर बड़ी ताकत दे रहे हैं। इस हुनर ने समय की उत्पादकता और गुणवत्ता भी बढ़ाई है। बचे हुए इस समय से संबंधों के समीकरण सुधरते हैं, यह आशा गलत नहीं होगी। इससे परिधान के मिथ भी टूटे हैं। स्वतंत्रता की नई परिभाषाएं लिखी हैं, स्त्रियों की इस द्विचक्रीय आत्मनिर्भरता ने।

परिवार में एक वाहन स्त्री-पुरुष दोनों के काम आ रहा है। यह आजादखयाली है और समाज की प्रगतिशीलता की निशानी भी। यह संकेत पूरे समाज के भविष्य के लिए सुखद है। पिता, भाई और पति के रूप में उन्होंने बेटी, बहन या पत्नी पर निषेधाज्ञा जारी नहीं की है। स्त्रियां ड्राइवर और पुरुष पीछे, यह देख हम चौंकते नहीं। आने-जाने के लिए दूसरों का मुंह न ताकतीं स्त्रियों ने अपनी इच्छा के लिए परिवार में स्वीकृति बनाई है। सास-ससुर के भरोसे को जीता है, माता-पिता को आश्वस्त किया है, अपने भय पर भी जय पाई है। यह आवाज दूर से नहीं, करीब से आ रही है कि हम यहां भी लड़कों से कम नहीं, अवसर तो दीजिए।

महिलाओं के वाहन-चालन को लेकर चुटकुले रच कर पुरुष अपने अहं की तुष्टि भले ही कर लें, शोधों से प्रमाणित सच्चाई कहती है कि वे पुरुषों से बेहतर, अधिक ईमानदार, जिम्मेदार, अनुशासित चालक होती हैं। कई शहरों में लड़कियां मोटरसाइकिल भी खूब चला रही हैं। पुणे शहर में लड़कियों का बुलेट चलाना भी कौतूहल का विषय नहीं बनता। यों मोटरसाइकिल की पहचान मर्दाना गाड़ी के रूप में है।

जूते-जींस से लैस युवतियां मोटरसाइकिल-सवार के रूप में ताकत की पहचान दिखाई देती हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। यह बनी-बनाई स्त्री-छवि का विखंडन है। मोटरसाइकिल या बुलेट सिर्फ एक वाहन नहीं है। वह खुली हवा, हौसला और स्वतंत्र सोच का प्रतीक है। मोटरसाइकिल चलाना महानता का प्रतीक नहीं, पर इस कदम में सकारात्मक बदलाव की धमक जरूर है। स्त्री हेलमेट लगाए, अपनी मर्जी के वस्त्र पहने, कंधे पर दफ्तर का बैग और पीछे स्कूल-परिधान में बच्चे को बैठाए स्कूटर चलाती गुजर रही है। हमारी सड़क पर समय के ये सुुंदर दृश्य है।

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