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बदलाव की प्रक्रिया

जीवन में अवसर सभी को मिलता है, बस अवसर पर समय रहते ध्यान देने की जरूरत होती है।

सांकेतिक फोटो।

स्वरांगी साने

जीवन में अवसर सभी को मिलता है, बस अवसर पर समय रहते ध्यान देने की जरूरत होती है। ध्यान हम किस तरह दे पाएंगे? जब ध्यान देना हमारी आदत में शामिल होगा। हमें जिस चीज की आदत होती है, वह काम हम बखूबी करते हैं, उसके लिए अलग से सोचना नहीं पड़ता। जिस रास्ते से हम रोज अपनी गाड़ी से जाते हैं, वहां से गुजरते हुए अधिक सोचना नहीं पड़ता। जैसे गाड़ी अपने आप उस दिशा में चलती चली जाती है। कुछ ऐसा ही ध्यान देने की आदत का है। अगर हम हर छोटी-बड़ी चीज को ध्यान से करते हैं, कोई कुछ कह रहा हो तो उसे ध्यान लगाकर सुनते हैं, ध्यान से पढ़ते हैं तो ध्यान देना हमारी आदत का हिस्सा बन जाता है। तब हम इस ओर भी ध्यान देने लगते हैं कि आपका ध्यान कहां लग रहा है और अनावश्यक बातों से अपना ध्यान कैसे हटा लेना है।

जो हमारे जीवन के सर्वोत्तम और उच्च लक्ष्य को पाने में बाधक हो, उसे छोड़ देने में समझदारी होती है। ध्यान ज्ञान देता है कि हम विवेक को कैसे पा सकते हैं। तब पहला विवेकपूर्ण विचार हमारे मन में यही उपजेगा कि हम खुश होने के लिए जन्मे हैं, दुखी रहने के लिए नहीं। दूसरा प्रकृति या सर्वोच्च सत्ता, हम उसे जो भी नाम दें, ने अगर हमारी रचना की है और वह जननी है तो वह हमारी देखभाल का उत्तरदायित्व भी निभाएगी। हमारी योग्यताओं के अनुरूप प्रतिदान देगी। हमें अपनी योग्यताओं को निरंतर बढ़ाते रहना होगा। एक समय पर हम कई भूमिकाओं को निभा रहे हैं तो हम उस योग्य हैं, इसलिए ऐसा कर पा रहे हैं।

बाहरी दुनिया में जो भी हो रहा है उसका प्रभाव सीधे हम पर पड़ रहा है तो समझ लेना चाहिए कि हम पूरी तरह से सक्षम नहीं हुए हैं। उदाहरण के तौर पर किसी दिन सुबह-सवेरे या देर रात बिजली चली जाती है तो हम अंधेरे में भी टटोलते हुए मोमबत्ती और माचिस की तीली खोज ही लेते हैं। ऐसा कैसे होता है? दरअसल, हम अपने घर की दरो-दीवारों के अभ्यस्त होते हैं। हमको ठीक-ठीक पता होता है कि किस जगह पर, कहां-क्या रखा है। तो बिजली जाने पर रोने नहीं बैठते, बल्कि तुरंत रोशनी का समाधान खोजने निकल पड़ते हैं। फिर हम बाहरी दुनिया का दुखड़ा क्यों रोते हैं? बाहरी दुनिया से अभ्यस्त हो जाएं। अंधेरे से निकलने का रास्ता खोजें। हम मोमबत्ती तक पहुंचे थे, इस तरह अपने हम कई बार सिद्ध कर चुके हैं, तो फिर अब क्यों डरते हैं? क्यों अपने कदमों को आगे बढ़ने से रोकते हैं?

हमारे जीवन में जो भी चल रहा है, क्या हम उससे खुश हैं? अगर नहीं तो सायास उसे बदलने की प्रक्रिया में खुद को झोंक देना चाहिए। प्यार से, सम्मान से और खुले दिल से अपने आसपास सकारात्मक वातावरण तैयार करना चाहिए। क्या कुछ ऐसा है जो हमें समझौता करने के लिए बाध्य करता है तो वहां अपनी सारी ऊर्जा खर्च नहीं करें, बल्कि समझौता उन आदतों से कर लेना चाहिए जो हमें आगे बढ़ने से रोक रही हैं। हो सकता है हम अपने ऊपर ध्यान ही नहीं देते हों तो अपने दिन में या शुरुआत में साप्ताहिक गतिविधि के रूप में खुद पर ध्यान देना शुरू कर देना चाहिए। सैलून में जाकर बाल बनवाने से लेकर अकेले ही किसी काफी हाउस में जाकर मजे से अपनी काफी पीना चाहिए या खुद को किसी रेस्त्रां में दावत देना चाहिे। ये छोटे-छोटे तरीके हैं, जो जीवन में जादू की तरह काम कर सकते हैं।

इस तरह की आर्थिक और शारीरिक शानो-शौकत के लिए हमको और अधिक कार्य करना होगा। दूसरों के प्रति सदाशयता दिखाएं, उदार हो जाएं। अपनी खुशियों के साथ जिंदगी के जो पाठ हमने सीखे हैं, उन्हें भी दूसरों के साथ बांटें। अगर हम भविष्य को लेकर निवेश करना चाहते हैं तो हमारे सामने जो विकल्प हैं, उन पर पूरी तरह से विचार करें। अपने आप पर भरोसा रखें। जीवन में खुशहाली और सुरक्षा का भाव कोई और नहीं जगा सकता, यह काम खुद ही अपने लिए करना होगा।

मानवता की सेवा हमें बड़ा शब्द क्यों लगता है? दरअसल, हम उसके पीछे की जिम्मेदारी से डर जाते हैं। हम जानते हैं दूसरों की सेवा करना ही मानवता की सेवा करना है। हम दूसरों के दुख-दर्द पोंछने से कतरा जाते हैं। महानायक वे नहीं होते, जिनके पास संपत्ति होती है, बल्कि वे होते हैं जो प्यार से दूसरों को देना जानते हैं। हम देना सीखें, तो हमको अपने आप मिलने भी लगेगा। कई बार हमारा दिमाग आसपास की दुनिया से जुड़ नहीं पाता। वजह वही होती है कि हम एकाग्र नहीं हो पाते। सरल सूत्र है कि अपने दिमाग के साथ मन का और मन के साथ बुद्धि का तारतम्य बैठा लें। यही सबसे आसान और तेजी से काम करने वाला तरीका है कि हम जो भी कर रहे हैं उसे एक ही बार में पूरे ध्यान, मनोयोग से करें, ताकि उसे दुबारा करने की जरूरत नहीं पड़े।

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