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‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में चंद्रकांता शर्मा का लेख : सांगानेरी का संकट

कैसे एक बेहतरीन कला और उसकी परंपरा सबके देखते-देखते दम तोड़ने लगती है, सांगानेरी दस्तकारी इसका एक बड़ा उदाहरण है!

Author नई दिल्ली | August 22, 2016 5:29 AM
पहले कपड़े की करीब सवा सौ गांठ निर्यात के लिए दिल्ली जाती थी।

हाल में जब मेरी नजर सांगानेरी दस्तकारी कला के नाम पर बेचे जाते स्क्रीन प्रिंट से तैयार कपड़ों पर पड़ी तो इसके धीरे-धीरे लुप्त होने की खबरों को लेकर बहुत अफसोस हुआ। कैसे एक बेहतरीन कला और उसकी परंपरा सबके देखते-देखते दम तोड़ने लगती है, सांगानेरी दस्तकारी इसका एक बड़ा उदाहरण है! गुलाबी शहर जयपुर के पास सांगानेर कस्बे में कपड़ों पर हाथ के छापों से होने वाली छपाई जयपुर शहर के बसने से भी पहले से विख्यात रही है। यहां के छापे लकड़ी के छापों से राजस्थानी जन-जीवन के प्रतीकों-अलंकरणों से आकर्षक छपाई करते रहे हैं। हर साल करोड़ों रुपयों का कपड़ा निर्यात किया जाता है, मगर पिछले वर्षों में सांगानेरी छापों पर संकट के बादल घिर आए हैं। इस काम में लगे दस्तकार अब दूसरे काम अपनाने पर मजबूर होने लगे हैं। यह कभी सोचा भी नहीं जा सकता था कि पांच पीढ़ियों से रंगाई-छपाई का काम करने वाले इन छापों को इतने बुरे दिन भी नसीब होंगे।
दरअसल, मशीन के जरिए स्क्रीन प्रिंट के चलन ने छापों की इस दुर्दशा में बड़ा योग दिया है। कभी बीस हजार से ज्यादा कारीगर इस काम को करते थे, अब उनकी तादाद सिर्फ चार-पांच हजार ही रह गई है। पहले कपड़े की करीब सवा सौ गांठ निर्यात के लिए दिल्ली जाती थी और इतनी ही देश के भीतर खप जाती थी। फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैंड के सौदागर लाखों का सौदा किया करते थे। वहां अब स्क्रीन प्रिंट के चलन से सांगानेर दस्तकारी की मौलिकता को चोट पहुंची है, निर्यात को गहरा धक्का लगा है।

सांगानेर में छीपा जाति के लोगों की संख्या ज्यादा है। यही लोग यह काम बहुतायत से करते रहे हैं। पर आसपास के दूसरे लोगों ने भी इस काम को अपनाना चाहा, लेकिन उनके अधकचरेपन से तैयार सामान का स्तर गिरा और लाभ का प्रतिशत भी गड़बड़ाया। वहां के पानी के बारे में यह मशहूर है कि उससे काले और लाल रंग का जो सम्मिश्रण तैयार होता है, वह पक्का और आकर्षक होता है। यहां के मूल छीपा सभी रंग खुद ही बनाते हैं, लेकिन व्यवसाय की होड़ ने रंग और छापे, दोनों पर चोट की और रासायनिक रंगों का प्रयोग शुरू कर दिया गया। इससे इस दस्तकारी की मूल पहचान को धक्का लगा और विदेशों तक यह बात पहुंची कि सांगानेर के हाथ के छापों की छपाई के बजाय स्क्रीन प्रिंट शुरू हो गई है। इससे इसे पसंद करने वालों का आकर्षण काफी कम हुआ और इसके बाजार पर काफी नकारात्मक असर पड़ा। हालांकि यूरोपीय देशों में बदलते फैशन के कारण भी छापों के इस व्यवसाय के सामने काफी कठिनाइयां पैदा हुई हैं। यूरोप के निवासियों ने सांगानेरी वस्त्रों को बतौर फैशन अपनाया है, लेकिन जब फैशन की हवा बदली तो सांगानेरी कपड़ा उनकी नजरों में महत्त्व खो बैठा।

यह इस दस्तकारी की उत्कृष्टता का ही सबूत है कि नौवें एशियाई खेलों में 1982 में परदे और चादर सांगानेरी और बगरू प्रिंट कला की ही लगाई गई थी। बगरू प्रिंट में हरडे के ऊपर हिरमिच आदि के लाल-काले रंगों के साथ चित्रकारी के प्रिंट भी किए जाते हैं। लेकिन इस समय दोनों ही छापे अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं। स्क्रीन प्रिंट की हालत भी यह है कि पहले एक स्क्रीन से चार सौ रुपए तक की कमाई हो जाती थी, लेकिन अब दो सौ रुपए कमाना भी आसान नहीं रहा। हाथ की कारीगरी में एक हजार मीटर कपड़े में पचास लोग रोजगार पाते थे, मगर स्क्रीन प्रिंट पर काम करने वालों को निर्यात पर बीस प्रतिशत अनुदान मिलने लगा तो कौन करे हाथों से छपाई। अफसोस की बात यह है कि अब तो खादी और भंडारों में भी स्क्रीन प्रिंट के वस्त्र धड़ल्ले से बिक रहे हैं। वहां भी दस्तकारों का काम नहीं रहा। जब सरकारी नीतियों में ही संरक्षण के उपाय नहीं रहे तो इस कला को कौन बचाए! पहले सरकार ने इस दस्तकारी को बढ़ावा देने के लिए ऋण बांटे थे और जब धंधा चौपट होने लगा तो दस्तकारों से ऋणों की उगाही शुरू कर दी गई। हालत यहां तक खराब है कि नए कारखाने खोलने वालों के लिए कर्ज चुकाना कठिन हो चुका है।

आज एक बार फिर यह कला अपना सही दर्जा प्राप्त करने को बेचैन है। बाजार में फिर इसकी साख जमाने के लिए तमाम उपाय किए जाने चाहिए। स्क्रीन प्रिंट से की जाने वाली छपाई के वस्त्रों को सांगानेरी दस्तकारी के नाम से बेचे जाने पर कानूनी रूप से बंदिश लगाई जानी चाहिए और सरकारी अनुदान केवल हाथ से काम करने वाले दस्तकारों को दिया जाना चाहिए। इस धंधे में उन बिचौलियों को दंडित किया जाना चाहिए जो व्यवसाय में घालमेल करने के लिए जिम्मेदार हों। देश में यह मोटा, सस्ता, छपाईदार कपड़ा लोकप्रिय बनाया जाना चाहिए, ताकि पीढ़ियों से यह काम करने वाले छीपों के घर और हुनर आबाद रह सकें। बहुत जरूरी है कि इस कला को अतीत की याद भर रह जाने से बचाया जाए।

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