रस्मों में सिमटता दिन

कह सकते हैं कि आम चलन के समांतर मैं भी कुछ खास दिनों का खयाल इसलिए रख लेती हूं, ताकि उसके जरिए ही सही, तेजरफ्तार जिंदगी में कुछ वक्त निकाल कर उस विषय पर सोच सकूं।

सांकेतिक फोटो।

भावना मासीवाल

कह सकते हैं कि आम चलन के समांतर मैं भी कुछ खास दिनों का खयाल इसलिए रख लेती हूं, ताकि उसके जरिए ही सही, तेजरफ्तार जिंदगी में कुछ वक्त निकाल कर उस विषय पर सोच सकूं। इस लिहाज से देखें तो किसी खास उद्देश्य से याद किए या मनाए जाने वाले दिवस जिस तरह आते हैं और गुजर जाते हैं, फिर उनका वजूद महज एक दिन तक के शोर-शराबे और कोलाहल का हिस्सा बन कर रह जाता है, हमारे देश में हिंदी और हिंदी दिवस की यही स्थिति है। कहां तो हिंदी दिवस मनाने का उद्देश्य हमारी राजभाषा हिंदी को प्रोन्नत और व्यावहारिक बनाने का था, पंद्रह वर्षों के बंधन को समाप्त कर हिंदी को पूरी तरह राजकाज की भाषा बनाना था!

लेकिन हमारी हिंदी भाषा के प्रति ढुलमुल नीतियों ने अंग्रेजी को अधिक प्रभावी और व्यवस्था की भाषा बना दिया और हिंदी को दीन-हीनों की भाषा कह कर लाचार हालत में बनाए रखा गया। जबकि आजादी के आंदोलन में हिंदी ही वह भाषा थी, कड़ी थी, जिसने व्यापक स्तर पर जन आंदोलन को आवाज दी। पूरे देश को संपर्क और व्यवहार की भाषा दी। लेकिन यह व्यापकता भी एक समय बाद गांधीजी की टोपी की तरह हो गई, जिसे पहनना तो सब चाहते हैं, लेकिन उस टोपी के पीछे के विचार को अपनाना नहीं चाहते हैं। यह टोपी राजनीति के लिए एक हथियार थी, इसीलिए तभी तक धारण की गई, जब तक इसकी आवश्यकता हुई। यही स्थिति देश के भीतर हिंदी भाषा की टोपी की थी जो यथावत आज भी बनी हुई है।

अंग्रेजी के प्रति लोक में प्रचलित कहावत ‘अंग्रेज चले गए मगर अंग्रेजी छोड़ गए’ दरअसल आजादी के बाद भी देश के भीतर अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व का परिणाम थी। गांव, देहात, कस्बों का आम आदमी जो अपनी मातृभाषा में लोक व्यवहार करता था, वह भी अंग्रेजी के आतंक से भयभीत अपनी आने वाली पीढ़ी को अंग्रेजी भाषा का ज्ञान दे रहा है, ताकि उसकी पीढ़ी को पिछड़ा हुआ न कहा जाए। इसमें उस आम आदमी का क्या कसूर है? वर्तमान में भले ही हम कहें कि हिंदी विश्व की भाषा बन रही है और कुछ उदाहरणों के माध्यम से उसे पुष्ट भी करने का प्रयास करें, लेकिन जमीनी स्तर पर हिंदी की वास्तविक स्थिति को अपने देश के भीतर ही देखा जा सकता है। शहरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक में सरकारी विद्यालयों से लेकर महाविद्यालय और विश्वविद्यालय तक में ज्ञान, विज्ञान, तकनीकी के संचालित पाठ्यक्रम का माध्यम आज भी अंग्रेजी है। इतना ही नहीं, खुद को बौद्धिक और जनता का संरक्षक कहने वाले वर्ग की बौद्धिक बहस की भाषा भी अंग्रेजी ही है।

हमारे देश की अधिकांश जनता आज भी ग्रामीण क्षेत्रों, कस्बों और शहरों तक में बहुतायत से संप्रेषण के लिए मातृभाषा और हिंदी भाषा का प्रयोग करती है। इसके बावजूद आज भी हमारी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी ही है। शहरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक में सरकारी विद्यालयों से अधिक निजी विद्यालयों की धूम है, क्योंकि आम जनमानस की चेतना में अंग्रेजी का वर्चस्व और डर कायम है। जिस बाजार के प्रति हम मंचों से आभार व्यक्त करते हुए नहीं थकते हैं, वह भी हिंदी से अधिक अंग्रेजी से संचालित हैं। फिर वह देवनागरी लिपि के स्थान पर रोमन लिपि का बढ़ता प्रभाव और रोमन लिपि का समर्थन हो या अंग्रेजी के संवादों का बढ़ता चलन हो या भाषा की सरलता और व्यावहारिकता के नाम पर शब्दों का तोड़ना-मोड़ना हो।

आज बाजार और फिल्मों को हिंदी के प्रसार-प्रचार का मुख्य आधार माना जाता है, लेकिन इसी बाजार और फिल्मों में जिस हिंदी भाषा का प्रयोग होता है, उसके संवाद लेखन की लिपि देवनागरी न होकर रोमन लिपि है। इसके अलावा, नाटक, नेताओं के भाषण, बड़े पदाधिकारियों के भाषण तक रोमन लिपि में लिखे जाते हैं। एक तरफ हम सभी हिंदी भाषा के विकास, उसके व्यावहारिक और संवैधानिक पक्ष को मजबूत बनाना चाहते हैं, दूसरी ओर उसी की लिपि को देवनागरी से रोमन में लिखने का बढ़ता प्रचलन और उसे हिंदी की लिपि के रूप में स्वीकार करने की मानसिकता भाषा के विकास को कमजोर बनाती है।

भाषा का प्रवाह कठिन से सरल की ओर होना चाहिए, लेकिन इस सरलता में भाषा के आधार को तोड़ना कहां तक सही है? भाषा की कठिनाई का यह प्रश्न अंग्रेजी को तो सरल बनाने की बात नहीं करता, वरना जितनी अच्छी और शुद्ध अंग्रेजी भारतीय बोलते और लिखते हैं, शायद ही विश्व में कोई बोलता हो। ऐसे में एक भाषा पर कठिन होने का आरोप और दूसरे की कठिनता को सहज ही स्वीकार कर आगे बढ़ने की मानसिकता भाषा के प्रति हमारे विभेद की दृष्टि को दर्शाती है। जब देश के भीतर ही अपनी मातृ और राजभाषा के प्रति संकीर्ण मानसिकता मौजूद हो तो ऐसे में एक दिवस मनाने भर से हिंदी विकास नहीं करेगी। विश्व के जिन देशों से हम तुलना भी करते हैं, हम उनके भाषाई व्यवहार और भाषा के प्रति प्रेम को अनदेखा कर देते हैं। हमारा देश बहुभाषी है। इसके बावजूद हमारे देश में हिंदी के बाद सर्वाधिक व्यवहार अंग्रेजी भाषा में होता है।

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