ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः सीखने का जश्न

सफलता के सही अर्थों में जाएं तो यह वह अनुभूति है जो किसी व्यक्ति के लक्ष्यों के परिणाम के तौर पर है और उस व्यक्ति के लिए नए लक्ष्य गढ़ने का आधार बनाती है।

Author August 21, 2018 5:17 AM
अंकों की सफलता का जश्न हमारे जैसे कुछ देशों का एक विशेष पर्व बन गया है और उसकी तस्वीरें अखबारों में प्रमुख जगह पाने लगी हैं।

अनूप बडोला

सफलता के सही अर्थों में जाएं तो यह वह अनुभूति है जो किसी व्यक्ति के लक्ष्यों के परिणाम के तौर पर है और उस व्यक्ति के लिए नए लक्ष्य गढ़ने का आधार बनाती है। किसी की सफलता दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत हो सकती है जो अलग-अलग क्षेत्रों में विशेषकर व्यवसाय के क्षेत्र में पैमानों के रूप में भी लिए जाते हैं। लेकिन शिक्षा जैसे उपक्रम में ऐसा होना संभव नहीं है, क्योंकि सीखना निजी होता है और यह इस पर निर्भर करता है कि क्यों सीखना है। साथ ही कई अर्थों में शिक्षा यानी सीखना (केवल किताबी शिक्षा नहीं) सफलता के मार्ग बनाती है।

यह बात उस संदर्भ में है, जब हमारे समाज में एक या कुछ बच्चों की अंकों की सफलता को दूसरे सभी बच्चों के लिए पैमाना बना दिया जाता है। सायास शिक्षा में भी सफलता का पैमाना क्या हो, यह भी तय होना आवश्यक है। सफलता का भाव जब अपने लिए सकारात्मक है तो उसे स्पर्धा के खांचे में लाकर हम इस भाव को नकारात्मक तो नहीं बना रहे हैं! क्या सीखने के क्रम में वास्तविक स्पर्धा दूसरों से हो सकती है? दरअसल, सीखना की जांच में ‘आप क्या कर पाए हैं’ और ‘आप क्या करने में सक्षम थे’ को जानना है, न कि स्पर्धा। अगर सकारात्मक स्पर्धा हो भी तो स्वयं की स्वयं से स्पर्धा पर बल क्यों नहीं दिया जाता और उसे ही पैमाना क्यों नहीं बनाया जाता। कहीं हम पचास या सौ सफलतम शिक्षार्थियों के शोर में लाखों कम सफल शिक्षार्थियों के सीखने के क्रम में बाधक तो नहीं बन रहे हैं!

अगर जश्न हो तो सीखने का जश्न हो। यह जश्न उन सबका हो सकता है जो भले ही आकांक्षाओं की उस ऊंचाई तक न पहुंचे हों, लेकिन कल तक जितना सीखे थे, आज उससे अधिक और नया तो सीखे! सीखना व्यक्तिपरक होना चाहिए, क्योंकि हर नया सीखने के साथ व्यक्ति अपने लिए नए लक्ष्य गढ़ सकता और शायद यही तय करेगा कि वह क्या बनना चाहता है। एक असंतुष्ट समाज में जहां सफलताओं की धुरी में सिर्फ पैसा हो और उसके पैमाने सिर्फ अंक हों, वह कितना सहिष्णु, समानता और मानवतावादी रह पाएगा, यह एक प्रश्न है। इसका सामना आज पूरी दुनिया कर रही है। कुछ समय पहले दसवीं और बारहवीं की परीक्षा के परिणाम बच्चों के लिए एक सुखद अनुभव हो सकते हैं, क्योंकि सफलता सकारात्मक भाव है। यह अलग बात है कि बच्चों को हर कक्षा की इन परीक्षा सीढ़ियों (परीक्षात्मक पैमाने) को पार करने में अपना पूरा जोर लगाना पड़ता है। जो सबसे ज्यादा अंक के साथ इन सीढ़ियों को पार कर जाता है, उसकी सफलता का जश्न केवल वह बच्चा और उसका परिवार ही नहीं, उसका स्कूल भी मानता है। लक्ष्य या निर्धारित अंक छू लेना ही विशेष उपलब्धि मानी जाती है।

अंकों की सफलता का जश्न हमारे जैसे कुछ देशों का एक विशेष पर्व बन गया है और उसकी तस्वीरें अखबारों में प्रमुख जगह पाने लगी हैं। ज्यादातर कोचिंग केंद्रों के लिए ये तस्वीरें प्रचार का सरल और प्रभावी माध्यम बन रही हैं। सफलता के इस जश्न के बीच असफलता के दुख में बच्चों का आत्महत्या या फिर लाखों बच्चों का अवसाद में चले जाना शायद एक और पहलू है जो इस शोर में कहीं खो जाता है। मेरे पड़ोस में एक रुई धुनने वाले के बच्चे का फांसी पर लटक जाना हमारे पैमानों पर सवाल उठाता है। वे पैमाने जो स्कूलों ने अगली पायदान के लिए गढ़े हैं, समाज ने अपने सम्मान या कुछ अलग दिखने के लिए तय किए हैं और जीवन में अलग बनने के लिए बनाए गए। स्कूल और समाज एक दिशा दे सकते हैं। लेकिन दिशा का निर्णय बच्चे पर छोड़ दिया जाए तो क्या हर्ज है? यह जरूरी तो नहीं कि हर सफलता डॉक्टर, इंजीनियर, टेक्नोक्रेट की ओर ही जाए। जीवन के अन्य रंग भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं।

जीवन में सफलता ठीक उसी तरह है, जैसे पहाड़ की चोटी पर चढ़ते हुए गिरते-फिसलते आखिर आप चोटी पर चढ़ ही जाते हैं और आपका लक्ष्य फिर एक नई चोटी होता है। चोटी पर पहुंचने का आनंद कुछ और ही होता है। हर शिक्षाक्रम में लाखों शिक्षार्थी होते हैं। वे भी किसी न किसी ऊंचाई तक पहुंचते हैं। सभी जश्न के हकदार हैं। सफलता के सापेक्ष असफलता को धिक्कारना सवालों के घेरे में है, क्योंकि सफलता के मायने स्थिति के अनुसार गढ़े जा सकते हैं। लेकिन विद्यार्थी जीवन में यह अपेक्षित लक्ष्य या मिशन वह होना चाहिए जो उसे चिंतनशील, समस्याओं का तर्कपूर्ण समाधान, समाज के विकास में आर्थिक और सामाजिक रूप से योगदान करने वाला बना सके। इस सफलता के साथ जीवन में सफलता का लक्ष्य भी जुड़ा हुआ है, क्योंकि यही जीवन की वह स्थिति है जो जीवन जीने की कला को तय करती है। स्कूल और माता-पिता अगर यह समझ पाएं कि ‘हर बच्चा विशिष्ट है’ तो हम सीखने का जश्न मानना शुरू कर सकते हैं, भले बच्चा किसी भी ऊंचाई पर हो। ऊंचाई से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है सीख और सृजित ज्ञान।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App