अंतर्मन के दीये

दिवाली कुछ उम्मीदें लेकर हर साल आती है और हम भी मन ही मन उम्मीदों के दीये आंखों में लिए उसके आने का इंतजार करते हैं।

दीप।

विलास जोशी

दिवाली कुछ उम्मीदें लेकर हर साल आती है और हम भी मन ही मन उम्मीदों के दीये आंखों में लिए उसके आने का इंतजार करते हैं। जब तक मन में उमंग न हो, तब तक दीये जलाने में उत्साह नहीं आता। अंधियारा केवल बाहर नहीं होता, वह हमारे भीतर भी होता है। अपने अंदर का अंधियारा हमें अपने साहस से सकारात्मक कदम उठा कर, उम्मीदों और सुंदर स्मृतियों की झालर सजा कर दूर करना होता है।
दीपावली पर माटी के दीये जलाने की प्रथा है।

ऐसा करके हम अपनी माटी का मान-सम्मान बढ़ाते हैं। जब हम माटी के दीये अपने घर में लाते हैं तो सहसा हमें उस कुम्हार की याद आ जाती है, जो न जाने कितनी उम्मीदों से इन माटी के दीयों को बनाता है। माटी के दीये बनाते समय वह न जाने कौन-कौन से सपने संजोता है कि इस साल दीपावली पर दीये बेचने के बाद अपने लिए ये करूंगा, अपने बच्चों के लिए वो करूंगा। जब हम माटी के दीये खरीदते हैं, तब हम वास्तव में उस कुम्हार के सपनों को पंख लगाते हैं। दीप हमें यह उम्मीद देते हैं कि देखो मैं ‘आंधी’ के सामने खड़ा रह कर भी अपने अस्तित्व की रक्षा कैसे करता हूं। दीपावली पर माटी के ये दीये हमें संदेश देते हैं कि देखो, हम नन्हे से दीये हैं, लेकिन ‘अमावस’ की अंधियारी रात को हरा कर उसे उजियारे में बदलते हैं।

ये माटी के दीये हमारी संस्कृति के पोषक हैं। आज इंसान लोभ, मोह, मद और अहंकार के घने अंधियारे में भटकने लगा है। वह इस अंधकार में स्वंय को खो रहा है। वह यह भी भूलने लगा है कि मेरे अंदर की ‘आत्मज्योति’ इस अंधियारे में विलुप्त होने का भय है। उसके इंद्रियों के दीपक भी रोशनी खोते जा रहे हैं। नैतिकता कम होती जा रही है और अनैतिकता का अंधियारा बढ़ता जा रहा है। मानव इस भ्रम के अंधियारे में भटकने लगा है। इस भटकाव के कारण वह घुटन महसूस कर रहा है।

आज देश-विदेश में गलाकाट प्रतियोगिता चल रही है। परिणामत: भ्रष्टता बढ़ी है। कुछ लोगों के बंगलों की रोशनी के कारण आंखें चौंधिया रही हैं, तो कुछ झापेड़े अंधकार की शरण स्थली बने हुए हैं। ऐसे में माटी के दीये हमें संदेश देते हैं कि हम उस अंधकार में जीने वाले गरीब बापड़ों के लिए भी कुछ करें। हम एक दीया उनकी ‘देहरी’ पर भी रखें। यह दीया ‘सहयोग’ का होना चाहिए।

जीवन में अवसाद का अंधकार दूर करने के लिए उम्मीद के दीये जलाना आज की आवश्यकता बन गया है। अगर हम किसी के जीवन में उम्मीद का एक भी दीया जलाने में कामयाब होते हैं, तो समझ लीजिए कि हमने ‘दीये जलाने’ का सच जान लिया है। क्योंकि, दीपावली के दीये रात में जलाने के बाद वे आधी रात के बाद न जाने कब बुझ जाते हैं, लेकिन अगर हमने ‘उम्मीदों के दीये’ जलाए हैं, तो यकीनन वे बुझेंगे नहीं। बशर्ते हम उसमें सकारात्मकता का तेल डालते रहें।

दीये जलते हैं, लोग मिलते हैं और इस प्रकार उनके रिश्तों में छाया अंधकार दूर होता रहता है। जिस प्रकार ‘मृत शरीर’ का कुछ मूल्य नहीं है, उसी प्रकार ‘बुझे दीयों’ का कोई मोल नहीं होता। दीये सूर्य के वंशज लगते हैं और उनका काम ही अंधकार को दूर करके उजियारा फैलाना है। दीया तिल-तिल जलता और अगम प्रकाश फैलाता है।

एक सच हमें स्वीकार करना चाहिए कि जब तक दीये की परोपकारिता और सेवाभाव का प्रकाश जगमगाएगा नहीं, तब तक हम इंसानों को उजियारे की महत्ता पूरी तरह समझ में नहीं आएगी। याद कीजिए, जब रात को अचानक बिजली चली जाती है, तब किस प्रकार एक घना अंधकार सब जगह फैल जाता है, तब हमें उस अंधकार के बीच रहने के दौरान महसूस होता है कि कहीं हम अंधे तो नहीं हो गए न? तब हमें ‘उजियारे’ की कीमत समझ में आती है।

दीपावली पर जलने वाले लाखों-लाख दीये जब रात को एक साथ जलते हैं, तब बाहर का अंधियारा मिट जाता है, लेकिन हमारे भीतर छाए अंधकार का क्या? कितना अच्छा हो कि हम दीपावली के दीये के साथ-साथ अपने मन में उम्मीद का भी एक दीया इस अनुभूति के साथ जलाएं कि हमारे भीतर छाया अंधकार ‘उम्मीदों की किरणों’ से उजियारा हो सके।

हर इंसान ‘ज्योतिस्वरूप’ है, उसके मन में एक ‘प्रकाशपुंज’ है। बस आवश्यकता है तो अपने भीतर झांकने की। जब हम स्वंय प्रकाशवान हो जाएंगे, तो यकीनन हमारा उजियारा दूसरे लोगों के तमस को भी दूर करने में सहायक होगा। इसे ही हम कह सकते हैं कि हमने एक दीया दूसरे के घर-आंगन में भी लगाया है। मिट्टी के दीये तो दीपावली पर जलाना ही है, अपने अंर्तमन में उम्मीद का दीया भी सदैव जला कर रखना है।

पढें दुनिया मेरे आगे समाचार (Duniyamereaage News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

अपडेट