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दुनिया मेरे आगे: तारीखों की छवियां

अब तो हम नए साल में सफर शुरू कर चुके हैं। एक समय था जब साल के आखिरी महीने के तौर पर दिसंबर के सिमटना शुरू होते ही नए कैलेंडर और डायरियों के जुगाड़ वास्ते मन भटकता था।

Author Updated: January 12, 2021 4:18 AM
Traditionसांकेतिक फोटो।

अशोक सण्ड

कहां से लाएं… किधर से झटकें। चिकने आयातित कागज से लेकर सामान्य कार्ड-शीट पर छपा करते थे कैलेंडर। डायरियां भी सामान्य लोगों के लिए सामान्य होती थीं, लेकिन रसूखदार लोगों की चमड़े या फिर रेक्जीन की होती और उन पर कई बार सुनहरे अक्षरों में उनके नाम अंकित होते। तकनीक ने इन सबको अब हाशिये पर धकेल दिया है।

नई पीढ़ी को पुराने पीढ़े पर बैठना गवारा नहीं। उन्हें एकल से लेकर छह पेज वाले कैलेंडर की अहमियत और डायरी के हर पेज पर अंकित सुभाषितों की अहमियत बताई भी जाए तो सुनना पड़ सकता है कि ‘नोटबुक’ और ‘वर्ड’ के युग में आप अब भी वहीं जकड़े हैं। पर्व-त्योहारों की जानकारी के लिए उनके अपने रोबोटिक ‘अलेक्जा’ और ‘बिक्सी’ हैं। इसके साथ-साथ मनोभावनाओं को व्यक्त करने के लिए ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के मंच। हम जैसों के साथी कभी कागज-कलम हुआ करते थे। लिखावट में अमावट का स्वाद और यादों की खुशबू।

क्या समय था तारीख दर्शाते उन कैलेंडरों का, जिनमें सिर्फ चौकोर खाने में अंक चमकते थे। इतवार का अपना अलग रुआब। चटक लाल रंग में अलग इयत्ता। प्रत्येक महीने में एकाध और अंक अपनी लालिमा से छुट्टी का बोध कराते। स्मृति को सजीव रखने में सहायक होते वे चौकोर खाने। माह विशेष में पड़ने वाले जन्मदिन, शादी की सालगिरह और इसके अलावा गैस कब लगाई, दूध कब घटाया या बढ़ाया जैसी घरेलू यादाश्त उसके हवाले कर दिया जाता।

यानी कि विविध तरीके से बेहद उपयोगी था कैलेंडर। सरकारी कैलेंडर एक तरफ सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को प्रचारित करते तो औद्योगिक संस्थान के चिकने पन्नों पर छितरे उत्पाद चाहत के सपनों को पंख देते। किसे नहीं याद होगा रेडियो बनाने वाली एक कंपनी के ‘मर्फी बबुआ’ का चेहरा।

एक महानुभाव जिन्होंने देश छोड़ कर परदेस में शरण लिया हुआ है, उनकी मद्य निर्माण कंपनी वाले बारह पेज में नारियां शृंगार भाव सिक्त लोगों द्वारा हासिल कर निजी कमरे में स्थापित करने की लालसा रहती। सामान्य लोगों की साधारण दीवारों पर कैलेंडर भी साधारण होते, लेकिन एयर इंडिया, पांच सितारा होटलों आदि के भव्य कलात्मक कैलेंडर उन विशेष घरों की ही शोभा बढ़ाते।

घर तो घर, बाहर पान की दुकानों और चाय के ठीहों पर भी कैलेंडर सजे दिख जाते। यह बात दीगर है कि उनकी गुणवत्ता दोयम दर्जे की रहती। भक्ति-भाव वाले आम लोग राम दरबार,भगवान शंकर, हनुमान जी के चित्र वाले कैलेंडरों को वरीयता देते तो वहीं कमल पर खड़ी अशर्फियां लुटाती लक्ष्मी मैया वाले कैलेंडर हर व्यापारी और आढ़तिये के न्यास पीठ की अनिवार्यता थे।

अब साल शुरू हुए कई दिन बीत गए। ‘सकल पदारथ’ सूचीबद्ध नए साल का कैलेंडर का पावत योग अभी तक नहीं बना। अखबार से पता चल रही तारीख और सप्ताह के दिन। एक समय था जब नए साल की सुगबुगाहट पर अखबार भी अपने प्रचार के लिए कैलेंडर छापते थे। लिखित मुनादी होती थी कि फलां अंक में नए वर्ष का कैलेंडर मिलेगा, सुधी पाठक अपनी प्रति सुरक्षित कर लें।

निशुल्क प्राप्त इस विलासिता से भी अब वंचित हैं कैलेंडर की ख्वाहिश वाले लोग। कैलेंडर मांगना और हासिल करना भी एक कला थी। कम छपाए हैं, जल्दी खत्म हो गए… जैसे टालू वाक्यों का प्रतिरोध जिसने सिद्ध कर लिया, उसके घर की कोई भी खूंटी खाली न रह पाती। ऐसे साधक जनवरी के महीने में गोल लपेटी हुई सामग्री लेकर ही गृह-प्रवेश करते और तत्क्षण खूंटी के हवाले कर एक तोष और अहं की मुद्रा धारण कर लेते थे… कैलेंडर नरेश जैसा एहसास। हालांकि यह सारा लाड़-दुलार जनवरी-फरवरी तक सीमित था। उसके बाद हवा के झोंकों से फड़फड़ाना और दीवार पर अपने दायरे में अर्ध-चंद्राकार आकृति बनाना ही उसकी नियति रहती।

कैलेंडर का स्वर्णिम युग वही था। बचपन देवी-देवताओं वाले कैलेंडर देखते बीतता। वय:संधि काल में पिता या चाचा रवींद्र नाथ ठाकुर, विवेकानंद या गांधी सरीखे आदर्श महापुरुषों के बड़े चेहरे वाले कैलेंडर दीवार पर टांग देते थे। उस काल-खंड में एक द्राक्षासव कंपनियों के कैलेंडर भी मनमोहक होते थे।

वर्जना के बावजूद भी दुष्ट कल्पनाओं का संसार भले ही रहता था, लेकिन विचारों को श्लील बनाने में ‘श्रीराम दूतं शरणम प्रपद्ये’ की अहम भूमिका रहती। अभिनेत्रियों जैसी मुलायम त्वचा वाले साबुन और बाल घना करने वाले तेल की अनुशंसा करते कैलेंडर तो थे ही, प्रसवोन्मुख नारी के निहारने निमित्त ठुड्डी पर हाथ रखे मर्फी रेडियो वाले बबुआ भी दीवार को शोभित करते।

घरेलू सोच वाले लोग मां-दादी के लिए तीज-त्यौहार की जानकारी, रोज का राशिफल सरीखी सूचनाओं वाले कैलेंडर भी छपवाते थे। सस्ती का समय था तो आसानी से मिल जाते कैलेंडर। बंदा आज भी चारखाने में सजी तारीख वाला कैलेंडर तलाश रहा। जीवन की सांध्य बेला में सोने से पहले तारीख को ‘क्रॉस’ करने पर अनुभूति होती है… चलो एक और दिन राजी-खुशी ‘कट’ गया।

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