गमले में गोभी

यह एक शुभ संकेत है कि शुष्क और बंजर से लगने वाले फ्लैटों में लोग अब फूल-पौधों के साथ ही, साग-सब्जियों की खेती भी कर रहे हैं।

प्रयाग शुक्ल

जब से आंगन, क्यारियों, पेड़ों वाले घरों का चलन बंद हुआ है और उनकी जगह महानगरों और अन्य नगरों में भी बहुमंजिली इमारतों का उदय हुआ है, तबसे बहुतेरी स्थितियां बदल गई हैं। अब किसी ‘हाउसिंग सोसायटी’ या ‘हाउसिंग काम्प्लेक्स’ में दो-चार पेड़ तो होते हैं, लान और पौधे भी होते हैं, पर वे सब समय ‘पास’ में नहीं रहते। एक बार अपने फ्लैट में पहुंच जाने पर आप उनसे दूर हो जाते हैं। और फ्लैट की छोटी-बड़ी बालकनियों के फूल-पौधों वाले प्रकृति उपादानों के माध्यम से ही आप ‘प्रकृति’ के साथ होते हैं; यह नहीं होता कि आप हाथ जरा-सा ऊंचा करके अमरूद, आम, आंवला तोड़ लें।

वे घर अब दिखते ही न हों, और हमें उन पुराने दिनों की याद न दिलाते हों, सो बात नहीं। इतने बड़े देश में हैं, अब भी हैं बहुतेरे घर, जहां जाकर या छुट्टियां बिता कर बड़ा सुकून मिलता है, पर बड़े शहरों में तो अब वैसी जमीन ही नहीं रही कि वैसा कोई घर बन सके। सब जगह खड़ी हुई मिलती हैं, बीस-पच्चीस मंजिलों वाली इमारतें, और अब उनके फ्लैट ही, एक बड़ी आबादी का ‘घर’ हैं।

जो भी हो, पर अपने आसपास फूल-पौधों को उगा लेने के अलावा, साग-सब्जियां भी उगा लेने की इच्छा बुझी नहीं है, यह देख कर कुछ संतोष तो होता ही है। सो, एक दिन अपनी सोसायटी के परिसर में सैर करते वक्त मैं भूतल के एक फ्लैट के सामने के गमलों में छोटे-से गोभी के फूल को देख कर ‘ठिठक’ गया। वह पत्तों की गोद में, बहुत प्यारा, बहुत भला, लग रहा था। मैंने पाया कि सैर करते-करते एक सज्जन भी उसकी ओर निहारते हुए रुक गए हैं। और अब हम दो हो गए हैं, उस फूल को सराहने वाले। वह ‘फूल’, ‘गोभी के फूल’ का एक प्रमाण सरीखा था।

वह मानो कह रहा था, ‘गोभी के फूल’ को लेकर, कोई अविश्वास मन में न रखना। होता है, गोभी का फूल। मुझे देख लो, खाली ‘फूल वाली गोभी’ नहीं होती, और फूल गोभी की वह सुंदरता भी देख लो, जो ‘पत्ता गोभी’ में नहीं होती। ठीक है, पत्ते-पत्तियों की भी अपनी सुंदरता होती है, और वह भी सराही जाने वाली होती है, पर, फूल तो फूल हैं- कोई भी फूल हो, कैसा भी फूल हो, वह सुंदर या बहुत सुंदर लगता है।

ध्यान इस पर भी गया कि सुंदर तो वह है, पर वह भोजन-सामग्री है। और उसे देखना मानो व्यंजन संसार से भी जुड़ा जा रहा है। यह सोच भी आश्वस्तिजनक था, जो तत्काल उदित हुआ कि गोभी ही नहीं, अब टमाटर, पालक, नींबू, मेथी आदि भी लोग उगा रहे हैं, अपने फ्लैटों में। मैंने भी देर नहीं की। अगली बार माली के आने पर, एक बड़े चौकोर-से गमले में पालक लगवाई। टमाटर भी लगवाए। और उसने ‘स्ट्राबेरी’ के पौधे की सलाह दी, तो वह भी ले लिया। चौथी मंजिल के मेरे फ्लैट की बालकनी में फूल-पौधों के गमलों के बीच, एक गमले में ‘हरी मिर्च’ पहले ही विराज रही थी।

यह एक शुभ संकेत है कि शुष्क और बंजर से लगने वाले फ्लैटों में लोग अब फूल-पौधों के साथ ही, साग-सब्जियों की खेती भी कर रहे हैं। जिनके पास फ्लैट के साथ ‘छत’ है, वे तो यह शौक भरपूर ढंग से पूरा कर रहे हैं, और कुछ तो अपनी जरूरत भर की सब्जी का पच्चीस-पचास प्रतिशत तक पूरा कर ले रहे हैं। यह देखना सुखद है कि अब शायद ही कोई ऐसा फ्लैट आपको दिखाई पड़े, जिसमें दो-चार फूलों वाले गमले न दिखें और ‘इनडोर’ पौधों का चलन भी तो खूब बढ़ा है।

इस अनुभव पर तो सभी मुस्करा कर ताली-सी बजाएंगे कि अगर किसी गमले में एक कोंपल भी आ जाती है, एक कली भी, तो अगले दिन हम उसके सम्मोहन में खिंचे चले जाते हैं, उसकी ओर। नींद खुलते ही। उत्सुक होकर देखते हैं कि उसका कितना विकास हुआ है। क्या वह कली, फूल बन गई है, और अगर बन जाती है, तो उसका साझा वह घर-परिवार के किसी सदस्य से करने को तैयार हो जाते हैं। यही जादू है ‘रचना’ का।

वसंत के दिनों की बहार का तो कहना ही क्या! और पीले गेंदों वाले फूल हों या पीले कनेर, वे भला कब मन को खिला नहीं देते रहे। वसंत हो चाहे कोई अन्य ऋतु, देखता रहता हूं, भरसक हर फूल-पौधे की ओर। एक तृप्ति-सी मिलती है। याद करता हूं उन छप्पर-छानी वाले घरों की, जहां बहुत देखे हैं- सीताफल, लौकी, सेम, करेले आदि। और जिनका वर्णन मैथिलीशरण गुप्त जी ‘अहा! ग्राम्य-जीवन भी क्या है…’ कविता में कर चुके हैं। बदल रहा है ग्राम्य जीवन भी, शहरी जीवन भी। पर प्रकृति तो नहीं बदलती। वह आपके जीवन में किसी-न-किसी रूप में प्रवेश करती ही है। तो स्वागत है, ‘गमले में गोभी के फूल’ का।

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