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दुनिया मेरे आगे: स्थानीयता का आग्रह

पिछले समूचे साल ‘लोकल टू वोकल’ यानी स्थानीय को लेकर जागरूक होने का ऐसा शोर हुआ कि हम भी स्थानीय या इसके भी विस्तार स्वदेशी के प्रति भावनाएं बुलंद होने लगे।

Author Updated: January 11, 2021 4:13 AM
local forसांकेतिक फोटो।

संगीता कुमारी

यों कई लोग स्थानीयता के प्रति आग्रहों को लेकर अपनी आवाज पहले से ही बुलंद कर रहे थे। मगर सरकार के आह्वान के बाद कुछ खास चीजों के लिए भी इस आग्रह को बढ़ावा देने के बारे में सोचा! शहरों में स्थानीय वस्तुओं को प्राथमकिता देना ज्यादातर लोगों को पसंद है, क्योंकि वहां मनपसंद चीजें आसानी से उपलब्ध होती हैं।

मगर शहरी लोगों के लिए किसी गांव या कस्बे में स्थानीय वस्तुओं की खरीदारी करना किसी चुनौती से कम नहीं। महामारी के कारण महीनों तक घरों में बंद रहने के कारण कुछ भी खरीदारी नहीं की थी। वरना करवाचौथ जैसे कुछ खास पर्व का दिन आने से एक हफ्ते पहले से ही खरीदारी शुरू हो जाती है। मगर पिछले कुछ महीनों के दौरान लगातार कुछ खास चीजों की खरीदारी में ‘लोकल’ मजबूरी बन गई थी। इसलिए तय किया कि स्थानीय स्तर पर ही बनाई गई सोने की कोई चीज खरीद कर भेंट की जाए!

कुछ दिन पहले मुंह पर मास्क बांध कर गांव की ही एक दुकान पर गए तो दुकानदार ने अचंभित नजरों से ऐसे देखा जैसे वहां जाकर हमसे कोई भूल हो गई हो। फिर उसने संभलते हुए मुंह में मिसरी घुले अंदाज में पूछा कि क्या सेवा की जाए! गांव के स्थानीय दुकानदारों के पास बहुत कम रेडिमेड या पहले से तैयार चीजें होती हैं।

दुकान वाले अधिकांश सामान ग्राहकों से आॅर्डर लेकर बनाते हैं। वे अपने ग्राहक को डिजाइन की मॉडल वाली किताब पकड़ा देते हैं, जिनमें से पसंद करके ग्राहक बता देता है। चांदी के सामान आमतौर पर बहुधा रखते हैं। गांव-कस्बे में सोने की त्वरित खरीदारी करना मुश्किल है। मगर चांदी के आभूषणों के लिए वे किताब नहीं पकड़ाते, बल्कि चांदी के बहुत-से आभूषण दिखा देते हैं। तो त्योहार में खरीदारी महामारी नहीं रोक सका। मैंने त्वरित चांदी की खरीदारी की। किताब में से सोने धातु का आॅर्डर अग्रिम के साथ देकर लौट आए। करवा-चौथ निकल गया, मगर वह बन कर नहीं आया।

इसी क्रम में प्रतीक्षा बढ़ती गई, आखिर दीपावली से एक दिन पहले चीज बन कर आयी। दुकानदार ने सामान का वजन बढ़ा कर बना दिया, जिससे मन खराब हो गया, क्योंकि बेवजह बजट भी बढ़ गया। राहत इस बात की हुई कि ‘लोकल’ में ही मनपसंद डिजाइन बन कर तैयार मिला। मगर सब कुछ इतनी ही सरलता से हो जाए तो देश का भला हो जाए!

आजकल कुछ नामी-गिरामी कंपनियों और इसके साथ-साथ शुद्धता की पहचान का निशान का इतना प्रचार-प्रसार है कि कोई भी व्यक्ति बिना हॉलमार्क देखेसोने की खरीदारी नहीं करता है। सामान लेकर भुगतान होना ही था कि शुद्धता की पहचान वाले निशान पर बात अटक गई।

गांव का स्थानीय आभूषण विक्रेता सकुचाते हुए अपनी बात साफ करके समझाने का प्रयास करने लगा- ‘हॉलमार्क वाले गहने तो पक्के बिल के साथ केवल बड़े शहरों में ही बिकते हैं। अगर हम ऐसे गहने बेचने की बात करेंगे तो कोई स्थानीय ग्राहक नहीं आएगा। आप जैसे शहरी लोगों के लिए हम अपनी लोकल दुकानदारी बदल नहीं सकते!

गांव-कस्बे के लोग व्यवसाय की तकनीकी भाषा नहीं समझते। उन्हें कम दाम में ज्यादा चीजें चाहिए। कई कम आय वाले या अपेक्षया कमजोर आर्थिक हैसियत वाले लोग सामान हमसे एक साथ खरीद लेते हैं, मगर उसकी राशि अनेक किस्तों में धीरे धीरे चुकाते हैं। स्थानीय पर खड़ी होने वाली और भी कई तरह की परेशानियां हैं। बहरहाल, यह सब सुनने-जानने के बादहम अग्रिम में दी गई राशि से चांदी की खरीदारी करके आइना देख आए।

कहते हैं कि सच खरा सोना चौबीस कैरेट का होता है। शुद्ध सोने में हल्का-सा तांबा मिला हो, तब वह बीस या बाइस कैरेट का गहना होता है। इस अनुभव से यह पता चला कि सरकार अपना काम करती है, जनता अपनी राह खुद चलती है। जनता अपना फायदा समझती है और दुकानदार अपना फायदा निकालते हैं।

यह अलग बात है कि ग्राहक अपने लिए किस बात में फायदा देखता है और दुकानदार किस बात में! यह किसी से छिपा नहीं है कि कुछ रुपए बचाने के चक्कर में ठगी खुलेआम होती है। टैक्स आज भी देश में बहुत बड़ा मुद्दा है। सरकार की ओर से टैक्स लेना अच्छी बात है, क्योंकि देश के विकास के लिए सरकार धन कहां से लाएगी!

सरकार को यह भी ध्यान देना चाहिए कि दुकानदार अगर किसी सामान पर टैक्स और अलग-अलग मदों में राशि वसूल रहा है तो उसका क्या आधार है! यह बात सही है कि पढ़े-लिखे लोगों द्वारा गांव-कस्बे में खरीदारी करने से ही देश का असली स्वरूप सामने आएगा। इसका फायदा यह होगा कि उत्पादक और उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता बढ़ेगी और दोनों पक्षों के बीच स्थानीयता के आग्रह से देश मजबूत होगा।

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