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दुनिया मेरे आगे: बाजार का मायाजाल

आर्थिक सबलता आज एक जादुई ताकत बन गई है। यह जीवन को उसके सभी सिद्धांतों से परे ले जाती है। वे सिद्धांत जिनको जीवन अपने ही मन के भावों मे बेपरवाह भिगोना चाहता है और उनमें अपने मन जैसे ही किसी साथी को भागीदार बनाना चाहता है।

Author Updated: January 27, 2021 5:15 AM
Inflation

पूनम पांडे

लेकिन कुटिल बाजार ऐसा धूर्त है जो चालाकी से हमारी सांसों को हमेशा सरल से जटिल की ओर ले जाता है। उसने केले के किसी छिलके की तरह जीवनचर्या नामक विचारधारा को नकल नामक छिछोरी-सी फिसलपट्टी पर औंधे मुंह गिराया है और गिर कर कभी उठने नहीं दिया घर, हमारे सिर पर एक आशीष होता है।

थके तन-मन को एक कोमल-सी थपकी कब पसंद नहीं! हमको बहुत सुकून देने वाले इस घर के साथ हमारी चुस्ती, खुमारी, गपशप, उपलब्धि, चहल-पहल, बेचैनी, नींद, करवट, सपने आदि के खट्टे-मीठे सारे ही अनुभव गूंजा करते हैं। हमारे मुंदे हुए दो नैना और उनके सपनों का अथाह संसार हमेशा गहरी नींद मे कहे गए कुछ साफ और धुंधले शब्द… सब एक घर की स्मृतियों मे हमेशा सहेजे हुए रहते हैं।

मगर जीवन में बढ़ती गतिशीलता और खूब आडंबर से रहने की लालसा ने उस भावना को विलुप्त-सा कर दिया है कि एक छोटा-सा आशियाना बस सुकून देने वाला हो, चकाचौंध नहीं। वहां प्रवेश करते ही मन आनंद से भर उठे। लेकिन बाजार ने इस सादगी को नेस्तनाबूदकर दिया। गोया अपने घर में किसी और के मार्गदर्शन से हम उसमें बेघर होकर रहते हैं, जिस घर को हमारी सोच और हमारे हिसाब का होना चाहिए था।

विशिष्ट जीवनशैली वाला घरौंदा बना कर देने वाले विज्ञापनों से पटे बाजार ने चौतरफा हमला किया है। उसने एक तो हमारे घर में अतिक्रमण कर लिया है, दूसरा दैनिक क्रियाकलाप को भी अजूबा-सा बना दिया है। सच तो यह है कि हम वैसे ही कमरों में निवास करने को मजबूर हैं जो हमारा अंतर्मन नहीं, बल्कि बाजार हमको बताता है। इसका मतलब यह हुआ कि तमाम कोशिश करके कर्ज जुटा कर और अपने गाढ़े पसीने की कमाई से हासिल घरौंदा हमारी वास्तविकता नहीं है।

वह एक भ्रम है… एक नकली निवास। हम जहां रह रहे हैं, वह हमारी इच्छा से नहीं, किसी न किसी चर्चित हीरो के घर के नमूने से चोरी किया गया है। इस तरह हम अपनी मौलिकता को तिल-तिल कर खत्म कर देते हैं, लेकिन घर की एक-एक सजावट बाजार द्वारा बताए गए तौर-तरीके पर ही करते हैं। हम एक बनावटी घर में रहते हैं और उसको ‘मेरा आशियाना’, ‘मेरे सपनों का घर’ कहते हुए जरा-सा भी नहीं हिचकते, अटकते।

सच कहा जाए तो यह जीवन कुछ सीमित सांसों का एक खेल ही है जो कभी भी खत्म हो सकता है। इस खेल को अपने दिल की तरंगों उमंगों के अनुसार खेलना तो शानदार बात है और यही सही भी है, पर यह कैसी नौटंकी है कि आज बाजार हमको बताता है कि आपको सुबह से शाम तक ऐसे रहना चाहिए, बस ऐसे ही कपड़े पहनने चाहिए, ऐसे और इसी तरह का खाना खाना चाहिए, यहां जाना चाहिए और वहां बिल्कुल नहीं जाना चाहिए। इन लोगों के साथ रहना चाहिए, उनसे हर हाल में कटना, बचना चाहिए। एक भोला-भाला दिल, जिसको बगैर तनाव के धड़कना चाहिए, वह रात-दिन हमारे फिजूल के तनाव को झेलता है जब हम बाजार की बारहखड़ी को रट कर उसमें बंधने को तत्पर अपने मौलिक रूप को मिटा रहे होते हैं।

बाजार एक प्रतिस्पर्धा है। वहां हम एक उत्पाद हैं। हम बाजार के लिए मनुष्य नहीं हैं, बस एक ‘प्रोजेक्ट’ हैं। बाजार के लिए मानव संस्कृति बस एक ‘टारगेट’ है, इससे अधिक कुछ नहीं। इसके लिए हमें एक भेड़ मानसिकता के सांचे में ढाला जाता है। अपनी नारियल जटा से बांध कर बाजार हमको हमारा ही पहला और अंतिम दुश्मन बनाता है और हम बनते जाते हैं, अपनी तमाम सच्चाई को संकटग्रस्त करते हैं।

किसी फिल्मी सितारे जैसा वार्डरोब नहीं होगा तो बाजार यह कहेगा कि आपको तो पहनने-ओढ़ने तक का सलीका नहीं मालूम! अच्छी बातों का अनुकरण करना और अच्छाई को अपनाने की बात मन में उठना स्वाभाविक है, लेकिन बाजार हमारे मन में इसको विकृत ढंग से ऐसे जमाता जाता है कि यह एक लाइलाज रोग बन जाता है। हमारे घर, बरामदे, शयन कक्ष, परिधान, हमारे खाने के टेबल, क्रॉकरी, कार, मोबाइल… सब किसी का अंधानुकरण। यह तो कुंठा का प्रतीक है। धीरे-धीरे ये बाजारूपन कहीं अंदर तक घर कर जाता है।

यही खतरनाक है। बाजार आज हमको जहां धकेल रहा है, हम कारपोरेट के हाथों से दिखावे के धक्के खाकर वहां जा रहे हैं। फिर भी खुश नहीं हैं, हमको सुकून नहीं मिलता! दुनिया भर के सैकड़ों चकाचौंध वाले शहर इसी बाजारवाद के कारण अमीर-गरीब की खाई को और ज्यादा बड़ा कर रहे हैं। कई बार रिहायशी इलाके बनाते समय प्रकृति भी बहुत बुरी तरह तबाह होकर आहत होती है।

भौगोलिक संरचना की ऐसी-तैसी होने लगती है। पर बाजार अपने ही तौर-तरीके से सुविधाओं से भरा-पूरा घर बना कर देता है। भले ही उसमें मनुष्य का दम घुटने लगे। हर इंसान की संरचना अलग है। दिमागी रसायन भी एक दूसरे से बिल्कुल जुदा। ऐसे में लोकप्रिय अभिनेता का बाथरूम और बाथटब किसी अन्य के लिए कैसे मुफीद हो सकता है?

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