अपेक्षाओं का बोझ

आजकल मैंने बच्चों को यह कहते सुना है कि माता-पिता को बच्चों की देखभाल करना और समझना नहीं आता।

सांकेतिक फोटो।

बिभा त्रिपाठी

आजकल मैंने बच्चों को यह कहते सुना है कि माता-पिता को बच्चों की देखभाल करना और समझना नहीं आता। बच्चों के भीतर कैसी चाह है, यह तो माता-पिता नहीं समझ पाते, लेकिन एक बार सोचते जरूर हैं कि क्या उनके माता-पिता को ऐसी ‘पैरेंटिंग’ आती थी! उनके वक्त में तो जैसे-जैसे माता-पिता कहते थे, वे उनकी बातों का अनुसरण करते जाते थे। फिर चाहे वह शारीरिक श्रम की बात हो, व्यायाम या फिर घर के काम में हाथ बंटाने की बात हो। लेकिन आज बच्चे उन सब बातों को खारिज करते हैं।

सही है कि आज के समय का शिक्षण-प्रशिक्षण और उसका तौर-तरीका बिल्कुल बदल चुका है और बच्चों को इस प्रकार के समय-सारणी में बांध दिया गया है कि उनके पास सामाजिकता, व्यावहारिकता या जीवन जीने की कला का विकास ही नहीं हो पाता। व्यावहारिकता की बात क्या करें, उनका तो व्यक्तित्व भी संपूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाता, क्योंकि आज के बच्चे महज किताबी कीड़ा बन कर रह गए हैं और यह कीड़ा उनके दिमाग को इस प्रकार से चोटिल कर रहा है कि न उन्हें अपने भले-बुरे की समझ रह गई है, न जीवन की व्यापकता को सोचने की क्षमता ही विकसित हो सकी है। पता नहीं कौन-सी ऐसी उपलब्धि है जो यह प्राप्त करना चाहते हैं!

विडंबना यह है कि वे जैसे-जैसे उपलब्धियों और मंजिल की ओर का रास्ता तय करना प्रारंभ करते हैं, उनकी निराशा और अवसाद का चरण भी एक-एक करके आगे बढ़ता जाता है। बहुत कुछ अनकहा, अनगढा़ और मनमाना इनके क्रियाकलाप को प्रभावित करता है। एक बात जो ध्यान देने योग्य है, वह यह कि बचपन में हम प्रयास करते हैं कि हम अपने बच्चों को वह सब सिखा सकें, जो जरूरी है और जिसे हमारे अभिभावकों ने हमें सिखाया था। मसलन, हमको भी दौड़ भाग करनी चाहिए, शारीरिक श्रम करना चाहिए, रस्सी कूदना चाहिए आदि। लेकिन विवशता कहें या व्यस्तता, उतना समय हम अवश्य नहीं दे पाए और परिणाम यह निकला कि थोड़ी-सी डांट-फटकार, गुस्सा इन बच्चों के ऊपर भारी पड़ गया। मानसिक पीड़ा का भार शारीरिक पीड़ा से बहुत ज्यादा होता है। कई बच्चे आत्महत्या तक की धमकी दे देते हैं।

ऐसे में समाधान ढूंढ़ना बहुत आवश्यक है। प्रश्न यह है कि कौन बताएगा इसका हल? हमें और आपको खुद ही कुछ करना होगा। एक-एक पल का बारीकी से परीक्षण करना होगा कि क्या वास्तव में बच्चे हमेशा गलत होते हैं? क्या वास्तव में अभिभावक हमेशा सही होते हैं? क्या वास्तव में हमारे माता-पिता ने वैसा ही व्यवहार हमारे साथ किया था, जैसा हम अपने बच्चों के साथ कर रहे हैं? क्या वास्तव में हमारे माता-पिता की उम्मीदें वैसी ही थीं, जैसी हम अपने बच्चों से रख रहे हैं? आज यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है कि हर माता-पिता यह चाहते हैं कि उनका बच्चा कोई न कोई प्रतिमान स्थापित करे और सभी लोग उसकी वाहवाही करें।

पिछले कुछ समय से एक बात पर बहुत चर्चा हो रही है कि बच्चों की संख्या दो से ज्यादा कभी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि सरकारी नीतियों का लाभ आपको तभी मिलेगा जब आपके पास सीमित संख्या में बच्चे होंगे। हमारी पीढ़ी के माता-पिता के साथ शायद यह बाध्यता नहीं थी और उससे भी पहले की पीढ़ी के पास तो बिल्कुल नहीं थी। लेकिन जिस पीढ़ी के लोगों को हम आज भी याद करते हैं, उस पीढ़ी के कई मशहूर और महान नेताओं और विचारकों के परिवार में दस-बारह या इससे भी ज्यादा संख्या में भाई-बहन होते थे।

आज प्रश्न यह भी है कि कहां से हम यह कल्पना कर सकते हैं कि जो हमारा पहला बच्चा है, वही हमारे लिए सब कुछ उपलब्ध करके ले आएगा। उस बच्चे की भी कुछ सीमाएं और क्षमताएं हो सकती हैं। वह हर क्षेत्र में अच्छा नहीं कर सकता है, वर्चस्व स्थापित नहीं कर सकता है। हमने बच्चों को केवल यह बता दिया कि यह तुम्हारा लक्ष्य है और यह तुम्हें प्राप्त करना है। उस रास्ते पर चलते हुए उसे कब थकान महसूस हुई, कब प्यास लगी, उसकी क्या जरूरत है आदि सवालों पर हमने कभी ध्यान नहीं दिया। फिर एक दिन इन महत्त्वाकांक्षाओं का बोझ ज्वालामुखी बन कर फूट जाता है और इस विस्फोट से महज एक परिवार नहीं, बल्कि पूरा समाज प्रभावित होता है।

यह समझना पड़ेगा कि हर बच्चा अलग है, विशेष है। हर बच्चे की क्षमता अलग है और हमारी महत्त्वाकांक्षा सभी बच्चों के लिए एक तरीके से नहीं चल सकती हैं। आज जब बच्चा पैदा होता है, आगे बढ़ता है और जीवन के संघर्ष के लिए तैयार हो रहा होता है, वैसे में जैसे ही हमारे यहां कोई अतिथि आता है तो हम उस बच्चे को प्रदर्शन की वस्तु बना देते हैं। जितनी कविताएं हमने उसे याद कराई थीं, सब सुनवाने लगते हैं। लेकिन बच्चा मनोरंजन और प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। वह अपने मन से खेलने-कूदने और बढ़ने के लिए पैदा हुआ है और हम उसे एक नुमाइश की तरह से पेश करेंगे तो किसी दिन वह बच्चा हमारी भी नुमाइश लगा देगा। यह बात जितनी जल्दी हम समझ लेंगे, उतनी जल्दी हम नई पीढ़ी को संभाल सकेंगे।

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