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दुनिया मेरे आगे: लौटना कलरव का

दरअसल, मानव स्वभाव में ही मूलत: करुणा और दया का भाव निहित होता है। नतीजतन, वह अपने इर्द-गिर्द रह रहे अन्य मूक जीवों का भी ध्यान रखता है।

Author Published on: May 26, 2020 2:38 AM
घोंसले में कलरव करते पक्षी।

हेमंत कुमार पारीक
आजकल जब सभी ओर सब कुछ शांत दिखता है, कहीं कोई कोलाहल नहीं है तो ऐसे समय में अचानक बहुत से पक्षी दिखने लगे हैं। मसलन बुलबुल, कोयल, कबूतर, तीतर, बटेर और कौवे आदि। इन पक्षियों में गौरैया का दिखना पत्नी को आनंद दे गया। वही चिड़िया जो गर्मी के मौसम में पंखे पर या दीवार में बने सूराख में घोंसला बनाती है। सादगी की मिसाल गौरैया के घौंसले की संरचना भी सरल होती है। जहां पांव पसारने की थोड़ी जगह मिली नहीं कि घोंसला तैयार! वरना तो बया जैसे दूसरे पक्षी अपने घोंसले की जटिल संरचना बनाते हैं। मगर नन्हीं-सी इस चिड़िया का दिमाग भी शायद जरा-सा ही होता है। किसी जीव के दिमाग को पूरा नहीं समझा गया हो तो ऐसी राय अतिरेकी है, लेकिन मेरा आशय उसके भोलेपन से है। दरअसल, उसकी यही सादगी उसकी खूबसूरती है। शायद यही वजह है कि ढेर सारे पक्षियों में ज्यादातर लोग गौरैया को ज्यादा पसंद करते हैं।

पहले हम कभी जब गांव में थे तो चारों ओर गौरैयों की भरमार थी। अपनी सुरक्षा को दृष्टिगत रखते हुए वह पंखे की ऊपरी कटोरी में घौंसला बनाती थी, इस खतरे के बावजूद कि पंखा जब चलेगा तो उसकी जान का खतरा हमेशा ही उस पर बना रहेगा। जब पंखा चलता था, तब कभी-कभार उसके अंडे फर्श पर गिर जाते थे। आशंका के मुताबिक कभी-कभी चिड़िया भी पंखे के ब्लेड का शिकार हो जाती थी। तब हम सबको बहुत अफसोस होता था। इसी बात को ध्यान में रख कर गर्मी के दौरान जरूरत होने पर भी हम पंखा धीमी गति से चलाया करते थे। लेकिन शायद यह खयाल रखना दोतरफा था। हम उसका खयाल रखते थे और गौरैया हमारा खयाल रखती थी।

वही गौरैया पिछले कुछ समय से देखने को नहीं मिलती थीं। अब जैसे महामारी से लड़ाई के लिए घोषित बंदी ने प्रकृति को नया जीवन दिया है, जानवरों के लिए वरदान साबित हुआ है, उसी तरह बहुत से पशु-पक्षी भी जहां-तहां देखने को मिल रहे हैं। दुनिया के दूसरे देशों में कभी भीड़भाड़ वाली सड़कें अब सुनसान हैं और उन पर कहीं नीलगाय, कहीं चीतल और कहीं-कहीं तो बाघ भी आजादी से घूमते नजर आए हैं। खैर, चीं-चीं करती, उड़ती-फिरती गौरैया के लिए गर्मी में पानी की कमी पूरा करने के लिए बर्तन की जरूरत पड़ी तो प्लास्टिक के पुराने कैसरोल में छेद कर पानी भर कर लटका दिया गया है।

जब गौरैया आजादी से और बेरोकटोक फुदकने लगी तो आसपास से मैना, तोते, कौवे और कोयल भी आने लगे और अपनी मर्जी से इधर-उधर खाना खोजने और फुदकने लगे। हमें उन्हें दूर से खिलाते हुए पहले से ज्यादा अच्छा महसूस हो रहा था। शायद यह लंबे समय तक पक्षियों का आंखों से दूर रहने के कारण था।

दरअसल, मानव स्वभाव में ही मूलत: करुणा और दया का भाव निहित होता है। नतीजतन, वह अपने इर्द-गिर्द रह रहे अन्य मूक जीवों का भी ध्यान रखता है। आजकल पत्नी सुबह होते ही बाग में कुर्सी लगा कर बैठ जाती हैं और अपने आसपास मंडराते पक्षियों के कलरव को आत्मविभोर होकर सुनती देखती रहती हैं। कहीं दाना चुगती, फुदकती चिड़िया पानी के लिए उसके लटकाए हुए बर्तन में पानी पीती दिखती है तो मंत्रमुग्ध होकर वे उस दृश्य को निहारती रहती हैं। ऐसे नयनाभिराम दृश्य देख कर गांव याद आता है। जहां कभी कलकल करती बहती नदी हुआ करती थी।

आसपास फैले खेत-खलिहान थे। झोपड़ेनुमा छोटे-छोटे घरों के आगे छोटी-छोटी बगिया होती थीं। उनमें उड़ती रंग-बिरंगी तितलियां और काले-काले भंवरे होते थे। वैसे तो बहुरंगी तितलियां भी थीं, पर एकरंगी पीली तितली की बात और थी। गौरैया और वह पीली तितली सादगी की मिसाल थीं।

एक मित्र हैं। सामान्य खेतिहर। उनके खेत-खलिहान हैं, पर वे शहर आ गए हैं। शहर में रहते हुए अभी भी उनके मानस में गांव बसा है। पशु-पक्षियों का समावेश है उनकी दिनचर्या में। ऐसे दृश्य बहुत कम देखने को मिलते हैं, जैसे उनके छोटे-से घर में दिखते हैं। घर में एक छोटा-सा एक्वेरियम है। उसमें विभिन्न प्रकार की मछलियां हैं। बाहर आंगन में तोते हैं और वहीं दो-दो देशी कुत्ते हैं। एक अपनी मां से बिछड़ गया तो उठा लाए और एक घायल सड़क पर पड़ा था। उन सबमें आपसी सामंजस्य है।

दरअसल, हमारे आसपास रहने वाले ये जीव मूक हैं। हम अपना खयाल तो रखते हैं, पर इन मूक प्राणियों के लिए कुछ नहीं सोचते। इन्हें अनदेखा करते हैं।

बता नहीं सकता कि आजकल इस कठिन दौर में भी हम कितने खुश हैं। इन दिनों मोबाइल पर इन पक्षियों के फोटो लेने में हमें आनंद मिल रहा है। इस बोरियत भरे वक्त में भी खुशमिजाजी बनी हुई है तो इसकी वजह पक्षियों का कलरव है। यों भी, बाहर ही सब कुछ नहीं है, आदमी के अंदर भी बहुत कुछ है। एक बार झांक कर तो देखा जाए!

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