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किताब की जगह

किसी भी क्षेत्र के विकास को सिर्फ भौतिक विकास तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि वहां के लोगों के बौद्धिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक विकास की चिंता भी करनी चाहिए।

Jansatta ravivari, poems, puja khillan, poetry, poems of puja khillanप्रतीकात्मक तस्वीर।

हिंदी प्रकाशन जगत से मैं पिछले तीन दशक से भी अधिक समय से जुड़ा हूं। एक प्रकाशक के रूप में मुझे लेखकों और पाठकों से निरंतर मिलने का अवसर मिलता रहता है। लेखक मित्रों और पुस्तक प्रेमियों से अक्सर अलग-अलग शहरों में आयोजित होने वाले पुस्तक मेलों और साहित्यिक परिचर्चाओं में उनके महत्त्वपूर्ण सुझावों और शिकायतों को जानने-समझने का मौका भी मिलता रहता है।

अर्थशास्त्र की एक प्रसिद्ध स्थापना है कि बहुतायत में खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है। आजकल इस तरह की शिकायतें बढ़ रही हैं कि मौजूदा समय में पाठकों को अच्छा साहित्य पढ़ने को नहीं मिल पा रहा है और यही वजह है कि पाठक साहित्य से दूर होता जा रहा है। जरूरत है कि लेखक मित्र पुराने परंपरागत विषयों से बाहर निकल कर स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, स्वास्थ्य, कॅरियर, पत्रकारिता और समसामयिक घटनाओं जैसे महत्त्वपूर्ण सामयिक विषयों पर पुस्तकों की रचना करें। मेरा मानना है कि लेखक बनने के लिए केवल लिखना मात्र नहीं होता। लेखक की समाज के प्रति एक महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी बनती है।

इसलिए उन्हें सोचना होगा कि वे जो लिख रहे हैं, उसकी समाज में क्या उपयोगिता है। हमारी कोशिश हो कि हर किताब से समाज और पाठक को कुछ नया दें। हमें पाठकों की वृद्धि के लिए देशभर में विश्वविद्यालय स्तर पर साहित्य क्लब की स्थापना करने का प्रयास करना चाहिए। देश भर में फैले तमाम हिंदी अधिकारियों, अध्यापकों और साहित्यकारों को मिल कर इस तरह की कोई ठोस पहल करनी चाहिए कि हम प्रतिवर्ष कम से कम हिंदी की पांच पुस्तकें खरीद कर अवश्य पढ़ेंगे। अगर ऐसा संभव होता है तो न केवल हिंदी साहित्य का बाजार बढ़ेगा, बल्कि नई पुस्तक संस्कृति का निर्माण भी होगा।

किसी भी क्षेत्र के विकास को सिर्फ भौतिक विकास तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि वहां के लोगों के बौद्धिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक विकास की चिंता भी करनी चाहिए। इसके लिए मेरा विनम्र सुझाव है कि देश के सभी सांसद और विधायक को अपने-अपने क्षेत्र में कम से कम एक-एक पुस्तकालय का गठन अवश्य करना चाहिए। इसके नियमित संचालन के लिए हर साल उन्हें मिलने वाली विकास राशि का न्यूनतम पांच प्रतिशत पुस्तकालय संस्कृति पर खर्च करना चाहिए। अगर यह सपना साकार हो पाता है तो पाठकों और पुस्तक प्रेमियों के बौद्धिक विकास के लिए और भी बेहतर माहौल तैयार हो सकेगा।

हाल ही में दिल्ली सरकार ने मोहल्ला पुस्तकालय योजना के अंतर्गत दिल्ली के सभी सत्तर विधानसभा क्षेत्रों में पुस्तकालय खोलने की योजना बनाई है। यह एक सराहनीय कदम है। जरूरत है, इसी तरह देश के सभी राज्यों में पुस्तकालय अधिनियम के अंतर्गत प्रत्येक शहर, कस्बे और गांव स्तर पर पुस्तकालयों का गठन करके जनता को किताबों से सीधे जोड़ा जाए। मेरा मानना है कि जैसे ‘पल्स पोलियो’ का अभियान चला कर भारत के बच्चों के स्वास्थ्य का ध्यान रखा गया, उसी तरह प्रखंड स्तर तक पुस्तकालयों का गठन करके हम संपूर्ण भारत की जनता को एक स्वस्थ मानसिक खुराक दे सकते हैं।

समाज की प्राथमिकता में अभी भी साहित्य संस्कृति जीवन की अन्य प्राथमिकताओं से कोसों दूर है। दरअसल, समाज में जो विषय या मुद्दे प्राथमिकता में होते हैं, उन्हें समाज हाथोंहाथ लेता है। पुस्तकों को खरीद कर पढ़ने वालों की संख्या बहुत ही कम है। हम सबको चाहिए कि विभिन्न सामाजिक आयोजनों जैसे विवाह समारोह, जन्मदिन, दिवाली, ईद, पोंगल आदि के मौके पर भेंट किए जाने वाले उपहारों में किताबों को भी अनिवार्य रूप से शामिल करें। इस दृष्टि से भारत के दो राज्य- बंगाल और केरल अन्य राज्यों से काफी आगे हैं। इन राज्यों में ज्यादातर घरों में पुस्तक और पुस्तकालयों का होना जीवन की अन्य आवश्यकताओं की तरह ही माना जाता है।

वर्तमान युग मार्केटिंग का है, तो साहित्य भी उससे अछूता कैसे रहेगा। अगर रहेगा तो बाजार से बाहर हो जाएगा। मेरी नजर में पाठकों से जुड़ने और साहित्य की मार्केटिंग के लिए अलग-अलग शहरों में पुस्तक के पाठ, मेले, लोकार्पण समारोह और ऐसे साहित्यिक उत्सव आयोजित किए जाने चाहिए, जिनसे पाठकों और पुस्तक प्रेमियों से सीधे जुड़ने का मौका मिले। पुस्तक के प्रचार की रणनीति के तहत लेखक और प्रकाशक दोनों को मिल कर काम करना चाहिए। आजकल देखने में आ रहा है कि कैसे नई फिल्म रिलीज होने से पहले उसके नायक-नायिका, निर्माता-निर्देशक मिल कर शहर-दर-शहर उसके पक्ष में माहौल बनाते हैं। मेरा मानना है कि नई पुस्तकों के लोकार्पण उन पर विचार गोष्ठी, लेखक-पाठक संवाद, देश के सभी छोटे-बड़े शहरों में आयोजित किए जाने चाहिए। इससे पुस्तक और लेखक के पक्ष में भी एक शानदार माहौल बनेगा और पाठक से सीधे जुड़ने का मौका मिलेगा।

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