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बो रहे हम प्रकाश बीज

पिछले महीने पुणे शहर में लोग दिवाली मना रहे थे और उधर उस अमावस की रात श्मशान में सैकड़ों लोगों के बीच कविताएं पढ़ी जा रही थीं। एक कविता संग्रह का विमोचन हुआ..

Author नई दिल्ली | December 9, 2015 10:28 PM

पिछले महीने पुणे शहर में लोग दिवाली मना रहे थे और उधर उस अमावस की रात श्मशान में सैकड़ों लोगों के बीच कविताएं पढ़ी जा रही थीं। एक कविता संग्रह का विमोचन हुआ, कुछ सांस्कृतिक समूह भी बीच-बीच में अपनी प्रस्तुतियां दे रहे थे। पुणे के उपनगर बोपोडी की श्मशान भूमि का परिसर एक अलग ढंग के कार्यक्रम का गवाह बना था। यह महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति, सिद्धार्थ संघ और सिद्धार्थ महिला संघ का आयोजन था। वहां गाया गया यह गीत काफी चर्चित हुआ- ‘बो रहे हैं हम प्रकाश बीज’। अब जल्द ही सिमेटरी यानी ईसाइयों की श्मशान भूमि में विद्यार्थियों और अध्यापकों के लिए एक जागरूकता बैठक का आयोजन होगा।

भूत-प्रेतों के अस्तित्व या उनके विचरण को लेकर समाज में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को चुनौती देने के लिए अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के बैनर तले आयोजित इस कार्यक्रम ने बरबस ही कुछ समय पहले कर्नाटक के बेलागावी सिटी कॉर्पोरेशन के अंतर्गत आने वाले वैकुंठ धाम श्मशान में हुए एक अन्य आयोजन की याद ताजा कर दी। कर्नाटक के आबकारी मंत्री सतीश जरकीहोली ने सैकड़ों लोगों के साथ श्मशान में रात बिताई थी और वहां भोजन भी किया था। याद रहे कि महाराष्ट्र की तर्ज पर कर्नाटक विधानसभा में अंधश्रद्धा विरोधी बिल लाने में अत्यधिक सक्रिय रहे सतीश जरकीहोली दरअसल लोगों के मन में बैठे इस मिथक को दूर करना चाहते थे कि ऐसे स्थानों पर भूत निवास करते हैं।

‘काला जादू कानून’ नाम से अधिक चर्चित कानून के निर्देशों के मद्देनजर डेढ़ सौ से ज्यादा पाखंडी बाबाओं को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है, जो चमत्कार दिखा कर लोगों को गुमराह करा रहे थे। एक तरफ आस्था का दोहन करते तमाम बाबाओं, साध्वियों की तादाद में बढ़ोतरी होती दिख रही है, वहीं यह जानना दिलचस्प है कि ऐसी समांतर प्रक्रियाएं भी देश में चल रही हैं जो भारत के संविधान की धारा 51 ए के दायरे में सम्मिलित कामों को ही अपने स्तर पर आगे बढ़ाती दिखती हैं। यह धारा मानवीयता और वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा देने में सरकार के प्रतिबद्ध रहने की बात करती है।

कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश से एक खबर आई थी कि वहां समूचे गांव ने अंधश्रद्धा आदि से मुक्त होकर तार्किकता और नास्तिकता का रास्ता अपनाया है। कानपुर देहात के पास मोहम्मदपुर गांव के बारे में बताया गया था कि वहां के निवासी तमाम धर्मों को झूठ समझते हैं और दिवाली मनाने के बजाय गणतंत्र दिवस मनाना पसंद करते हैं। लोग इस बात पर फख्र महसूस करते हैं कि वे देश के ऐसे इलाके में हैं, जहां अंधविश्वास सबसे कम पाया जाता है। यह संभव हो पाया ‘अर्जक संघ’ के जरिए। कानपुर, बस्ती, फैजाबाद, प्रतापगढ़, वाराणसी के अलावा बिहार और झारखंड जैसे पड़ोसी राज्यों में फैले इस संगठन के सदस्य बत्तीस पेज की एक पुस्तिका पर यकीन करते हैं जो ‘अर्जक संघ’ के संस्थापक रामस्वरूप वर्मा ने लिखी थी। वे 1967 में चरण सिंह के मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री थे।

चाहे महाराष्ट्र, कर्नाटक या गोवा में अपनी तीन सौ शाखाओं के जरिए सक्रिय महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की गतिविधियां हों या पंजाब का नई बुलंदियों को छूता तर्कशील आंदोलन या फिर अर्जक संघ। ऐसे संगठित प्रयासों के बरक्स ऐसे उदाहरण भी सामने आ रहे हैं, जहां तरह-तरह के अनाचारों में लिप्त बाबाओं के विरोध में लोग स्वत:स्फूर्त ढंग से सड़कों पर उतर रहे हैं। सुदूर ओड़िशा पिछले दिनों ऐसे कई बाबाओं के खिलाफ एक नई तरह की सरगर्मी का गवाह बना। जनता के सड़क पर उतरने के बाद इन बाबाओं को जेल भी भेजा गया। जनता के आक्रोश को देखते हुए ओड़िशा में लंबे समय से पैर जमाए कई बाबाओं ने वहां से भागना ही मुनासिब समझा है। लेकिन ऐसे तात्कालिक आंदोलनों से अंधश्रद्धा के खिलाफ लड़ाई बहुत दूर तक नहीं चलने वाली है। इन्हें संगठित शक्ल देने और ऐसे कानूनों का निर्माण करने की जरूरत है, जिनके चलते जनता की आस्था का दोहन करने वाले बाबाओं की नकेल कसी जा सके। इसका आगाज नरेंद्र दाभोलकर ने किया था, जिन्हें इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

पचास के दशक के उत्तरार्द्ध में जवाहरलाल नेहरू ने धारा 51 ए को लेकर अपना मसविदा संसद के सामने पेश किया था, जिस पर मुल्क की संसद ने अपनी मुहर लगाई थी। उन दिनों की संसद की बहसें बताती हैं कि सांसदों के विशाल बहुमत ने अंधश्रद्धा से मुक्त होकर स्वाधीन भारत की प्रगति की दिशा में आगे बढ़ने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का इजहार किया था। बहरहाल, श्मशान में आयोजित कवि सम्मेलन से लेकर बाबाओं के विरोध में खुद लोगों का सड़क पर उतरना इस बात का गवाह है कि स्वाधीन भारत की यह पीढ़ी तर्क आधारित बहसों और भावनाओं को आगे बढ़ा रही है।

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