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दुनिया मेरे आगेः पंछियों का आकाश

हमारी पीढ़ी जो अब सत्तर-पचहत्तर के पार है, बचपन से ही आकाश में पंछियों को देखने की आदी रही है।

Author Published on: November 10, 2017 2:55 AM
बस कबूतर, कौव्वे ही दिखते हैं।

प्रयाग शुक्ल 

हमारी पीढ़ी जो अब सत्तर-पचहत्तर के पार है, बचपन से ही आकाश में पंछियों को देखने की आदी रही है। तोते, बुलबुलें, गौरेया आदि ढेरों पक्षी हमने आकाश में, अपने आसपास उड़ते हुए देखे हैं। कुछ के नाम हम जानते थे, कुछ के नहीं। पर वे थे। बहुत सारे। कोलकाता में भी, जहां मैं बड़ा हुआ, वहां तो थे ही, और जहां हम घूमने जाते थे, नदी-झील के किनारे, पिकनिक के लिए, किसी बाग में, या किसी रिश्तेदार के यहां, किसी गांव-कस्बे में- सब जगह वे थे। यह अवश्य है कि हम उन्हें ‘पंछी’ या ‘पक्षी’ कह कर भी जानते थे, पर वे सब थेहमारे लिए ‘चिड़िया’। यही शब्द ध्यान में, जुबान पर, उनके लिए आता था। और वही ज्यादा प्रचलित भी है।

पर नहीं, चिड़िया तो वह होती थी जो छोटी होती है। हम कौव्वों-कबूतरों-मोरों आदि को चिड़िया नहीं कहते थे। आज भी नहीं कहते। वे हमारे लिए हमेशा से कबूतर-कौव्वे और मोर रहे हैं। वे न ‘चिड़िया’ हैं, न पंछी। तो, ‘पंछी’ शब्द रहा है उन पंखदार उड़ने वालों के लिए, आकाश में दूर-दूर तक चक्कर लगाने वालों के लिए, और उन सबको, अपने वृत्त में ले लेता रहा है जो न बहुत छोटे हों न बड़े, मझोले से हों, तोतों के आकार वाले। भांति-भांति के उन पंछियों की कतारें हम आकाश में उड़ते हुए देखते थे। शिवमंगल ‘सुमन’ की कविता है न, ‘हम पंछी उन्मुक्त गगन’ के। इसकी शुरुआती पंक्तियां हैं, ‘हम पंछी उन्मुक्तगगन के, पिंजरबद्ध न गा पाएंगे/ कनक तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाएंगे।’ और आखिरी पंक्तियां हैं, ‘नीड़ न दो चाहे टहनी का आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो/ लेकिन पंख दिए हैं, तो आकुल उड़ान में विघ्न न डालो।’

हाल ही की बात है। एक शाम नई दिल्ली से नोएडा आ रहा था-डीएनडी फ्लाइ वे पर पहुंच कर इधर-उधर नजरें दौड़ार्इं तो जमुना का पानी दिखा, बहाव नहीं, जो था वह मैला-सा। आकाश पर नजरें गर्इं तो वह सूना था। वहां एक पक्षी नहीं। आप जानते हैं, अगर एक पक्षी भी दिख जाता है आकाश में तो मन उत्फुल्ल हो उठता है। सोचा जब भी हम आकाश की ओर देखते हैं, तो मानो उसे पंछी सहित ही देखना चाहते हैं। मन में बचपन से आकाश का यही दृश्य बैठा हुआ है, पर नहीं, अब स्थितियां बदल गई हैं। डीएनडी फ्लाइ वे से ‘पक्षी वन विहार’ दूर नहीं है। वहीं एक दिन ठानी है जाने की मन में। यह हाल सिर्फ दिल्ली का नहीं है। कोलकाता, मुंबई, चेन्नई सब मेट्रो शहरों का है;बस कबूतर, कौव्वे ही दिखते हैं। याद है, साठ के दशक में, आज से कोई चालीस-पचास साल पहले, हमारे ग्रेटर कैलाश (दिल्ली वाले निवास में) मोरों की बोली अकसर सुनाई पड़ती थी। और कभी-कभी किसी छत पर भी हम उन्हें टहलता हुआ देखते थे। खिड़की के पास एक सेमल वृक्ष था। उस पर तो न जाने कितने पंछी, भौंरे, मधुमक्खियां सभी आते थे। सुबह अब हमारी नींद पंछियों की चहचहाट से नहीं, कबूतरों के उड़ने, किसी कांच-दीवार से टकराने, पंख पड़फड़ाने आदि से टूटती है। गनीमत है कि वे हैं, और हमने बालकनी में जो गोल माटी-बर्तन उनके पानी पीने के लिए रखा है, वहां वे प्राय: दिखते हैं। कभी-कभी उसी में घुस कर नहाते हैं। उनकी हर गतिविधि हमें भाती है।

चिड़ियां चली गई हैं दूर। कोई कहता-बताता है कि मोबाइल टॉवरों के कारण वे दूर चली गई हैं, कोई कहता है, इतनी ऊंची मंजिलों वाली इमारतों, फ्लैट परिसरों में अब कहां है उनके लिए उन्मुक्त गगन! और मोरों की जो बोली हमने नोएडा आने पर दस बरस पहले सुनी थी वह बिला गई है दूर-दूर तक, आगे और आगे जो खाली-खुली जमीन थी, खेत थे, वे ‘खदेड़’ दिए गए हैं दूर। उन्हीं के साथ ‘खदेड़’ दिए गए हैं पंछी भी। पहले चिड़ियां घरों में भी घोंसले बना लिया करती थीं, अब कहां दिखते हैं घरों में घोंसले। उनके लिए हमने कोई आश्रय छोड़ा ही कहां है।फिर शहरों का बढ़ता हुआ प्रदूषण, मैली हवाएं, कूड़ा-कचरा भी ऐसी समस्याएं रही हैं, और हैं, जिनमें नन्हें जीवों की सांस पर भी तो प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सो हमारे शहरी आकाश सूने होते गए हैं, दमकते तारों से, धवल चांदनी रातों से, पंछियों से।

अनुपम मिश्र जैसे अनुपम व्यक्तिकी याद आती है। जीवन भर जल के लिए काम करते रहे, लिखते-बोलते भी रहे। यात्राएं करते रहे। बहुतों को प्रेरित किया, बहुत कुछ करने को। पर रुकता नहीं है गैरकानूनी ढंग से किया जा रहा रेत ‘उत्खनन’, रुकती नहीं हैं नदियों को मैली करने की आदतें।
पंछियों से भरे आकाश का स्वप्न देखना लेकिन छोड़ नहीं देना है। दुनिया के बड़े-बड़े शहरों में आकाश पंछियों से भरा रहता हो, ऐसा तो नहीं है, पर पश्चिम में, यूरोप के देशों में तितलियों, पंछियों आदि को बचाने की चेष्टा सतत रूप से जारी है। नार्वे जैसे देश में, बहुत ठंडे देश में, आपको शहरों में प्राय: हर घर में ‘बर्ड हाउस’ टंगे हुए मिलेंगे, विभिन्न शक्लों में, सुंदर डिजायनों में। मिलेगा वहां पंछियों के लिए दाना-पानीऔर खुला दरवाजा पंछियों के घर का। वे आएं, बैठें, खाएं-पिएं, उड़ जाएं। बर्फ के दिनों में की जाती है पंछियों के लिए गरमाहट की व्यवस्था। वे हमारे बहुत बड़े मित्र हैं, इतना ही तो मानना है। और इस ‘मानने’ के अनुसार कुछ करना भी है।

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