बेजुबान और इंसान

आकाश सूरज, चांद का स्थायी निवास है और बादल, कोहरा या बर्फ कभी-कभार आने-जाने वाले मेहमान।

सांकेतिक फोटो।

सरस्वती रमेश

आकाश सूरज, चांद का स्थायी निवास है और बादल, कोहरा या बर्फ कभी-कभार आने-जाने वाले मेहमान। इन मेहमानों का स्वागत करते हैं धरती और आकाश के बीच में उड़ने वाले ढेर सारे परिंदे। लेकिन पिछले महीने पतंगों के उत्सव के दिन लगा कि पतंगों ने आकाश को घेर लिया है और स्वागत के आकांक्षी परिंदों को उनके स्थान से खदेड़ दिया है। आजादी का जश्न मनाने का एक यह तरीका भी लोगों ने ईजाद कर लिया है। ऐसे लोगों को यह पता नहीं कि दूसरे की आजादी छीन कर अपनी आजादी का जश्न नहीं मनाना अपनी आजादी को भी दायरे में कैद करना है। भले ही हम कमजोर बेजुबान पक्षियों की आजादी या उनके जीने के अधिकार को ही क्यों न छीनें!

बात सिर्फ किसी एक साल की नहीं है। हर साल ऐसा ही देखने को मिलता है। जश्न मनाने के दौरान उड़ रही पतंगों के बीच ढेर सारे पक्षी मांझे की चपेट में आकर घायल हो जाते हैं। कितने मर भी जाते होंगे। मांझे वाले धागे से तो इंसानों की मौत की खबरें आती रहती हैं। इस वर्ष भी उस शाम जब मैं अपनी छत पर चढ़ी तो पूरा आसमान पतंगों से अटा पड़ा था। पतंगों की पहुंच से काफी ऊपर ढेर सारी चीलें उड़ रही थीं। मगर एक कौवा इस इमारत से उस इमारत बेचैन होकर उड़ रहा था। उसने मेरी छत पर लगे पाइप पर बैठने की कोशिश की, मगर क्षण भर भी नहीं बैठ सका। दरअसल, उसके पंजे कटे हुए थे। वह किसी तेजधार वाले मांझे की चपेट में आकर अपने पंजे गंवा बैठा था। हर ओर तेज संगीत और जानलेवा मांझे के जाल में कबूतरों का एक झुंड बार-बार इधर से उधर भटक रहा था। निस्संदेह वे किसी सुरक्षित और शांत जगह की तलाश में थे। मेरी मुंडेर पर रोज दाना-पानी के लिए आने वाली मैना का झुंड उस रोज नदारद था। कुछ कबूतर दुबक कर मेरी खिड़की के बारजे पर बैठे हुए थे। पास ही पीपल के पेड़ पर रहने वाली स्लेटी रंग के पंखों वाली चिड़िया भी जाने कहां छिपती फिर रही होगी।

दरअसल, विकास के साथ मनुष्य द्वारा निर्मित आधुनिक दुनिया में प्रकृति और उसके बाशिंदों के लिए कहीं कोई जगह ही नहीं है। मनुष्य जैसे-जैसे अधिक सभ्य होने का दावा करता रहा है, वैसे-वैसे उसका आचरण अधिक बर्बर और असभ्य हुआ है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब आॅस्ट्रेलिया में दस हजार ऊंटों को सिर्फ इसलिए मार डाला गया कि वे ज्यादा पानी पीते थे। हमारे देश में बंदरों को लेकर भी ज्यादती भरी सोच ही है। जबकि मनुष्य द्वारा भोजन पानी की अथाह बर्बादी पर कभी कोई कार्रवाई नहीं होती। आज महानगरों में बन रहे अपार्टमेंट और विला आदि में इंसानों के लिए स्विमिंग पूल, जिम, खेल के मैदान से लेकर उनके मनोरंजन के लिए हर साधन उपलब्ध कराया जा रहा है। लेकिन पशु-पक्षियों के लिए न रहने की जगह बची और न पीने के लिए साफ पानी। कुछ मतलबपरस्त लोग बूढ़ी गायों और बेकार बछड़ों को छुट्टा छोड़ देते हैं। ऐसी गाएं भोजन, पानी की तलाश में जगह-जगह डोलती रहती हैं।

उत्तर प्रदेश के नोएडा में एक जगह रविवार का बाजार लगता है। देर रात बाजार बंद होने के बाद ढेर सारी सड़ी-गली सब्जियां सड़क पर फेंंक दी जाती हैं। आसपास कहीं रहने वाला एक बूढ़ा व्यक्ति अगली सुबह वहां एक बड़ा थैला लेकर पहुंच जाता है। वह बची-खुची सब्जियों को थैले में भर कर उन्हें ले जाता है। पूछने पर उसने बताया, इस मोहल्ले में गायें पॉलिथीन में बांध कर फेंकी गई सब्जियां, छिलके खाने के चक्कर में पॉलिथीन खा लेती हैं, जिससे वे बीमार हो जाती हैं। मैं उन्हीं गायों को सब्जियां खिलाने जाता हूं। उसकी बात सुन कर मेरे हृदय से पहली प्रतिक्रिया यही निकली कि इस दुनिया को ढेर सारे ऐसे संवेदनशील इंसानों की जरूरत है, जो बेजुबान पशु-पक्षियों के लिए अगर कुछ तकल्लुफ न उठा सकें तो कम से कम अपने जश्न, मनोरंजन में कुछ कमी कर दें।

दरअसल, सारी दिक्कत तब पैदा होती है जब किसी चीज की अति होती है। अति से शौक और परंपराएं उन्मादी रूप धारण कर लेती हैं और अपने मूल सौंदर्य को खोकर विकृत हो जाती हैं। फिर ये सुख का कारण न होकर कष्ट पहुंचाने लगती हैं। यही सब हो रहा है हमारे उत्सवों और त्योहारों के बीच मनाए जाने वाले जश्न में। आजादी जैसा पर्व भी सरोकारों से दूर होकर क्षणिक शोर-शराबे में तब्दील हो चुका है। कितने पक्षी जानवरों के साथ ही इंसान भी खतरनाक मांझे की चपेट में आकर घायल हो जाते हैं, मगर हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारे जश्न और मनोरंजन की कोई सीमा निर्धारित नहीं हो सकती। हम अपनी जरूरतों से ज्यादा आज सुविधाओं के आदि हैं। इन सुविधाओं और विलासिता की पूर्ति के लिए हजारों पशु-पक्षी हर वर्ष मारे जाते हैं। मगर कोई चीज हमें किस कीमत पर हासिल हो रही है, इस प्रश्न में उलझ कर हम अपना कीमती वक्त जाया नहीं करना चाहते। लेकिन अगर अब भी हम इन बेजुबानों के बारे में नहीं सोचेंगे तो शायद बाद में बहुत देर हो जाए। हमें यह याद रखना चाहिए कि इस प्रकृति में हर जीव की एक दूसरे पर निर्भरता होती है।

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