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दुनिया मेरे आगेः अपना-अपना दांव

इतने में बिहार विधानसभा चुनाव की तारीख करीब आने लगी। चुनाव की घोषणा को लेकर असमंजस बना रहा। हालांकि असामान्य परिस्थिति में संविधान के माध्यम से कोई न कोई रास्ता निकाला ही जाता, लेकिन चुनाव आयोग ने तमाम सावधानियों के साथ अट्ठाईस अक्तूबर से बिहार में विधानसभा चुनाव कराने का तय किया।

पूरबिया वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए विभिन्न दलों के नेता पूरबिया बहुल कॉलोनियों में बैठकें कर रहे हैं।

मनोज कुमार मिश्र

बिहार के मूल निवासी और एक बड़े राजनेता ने बिहार के मूल निवासी एक पत्रकार से पूछा- ‘वोट देने चलना है?’ पत्रकार ने कहा कि मैं तो अब दिल्ली का मतदाता हूं। अट्ठाईस अक्तूबर से शुरू हो रहे बिहार विधानसभा चुनाव से जुड़े सवाल दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और दुनिया के अनेक बड़े शहरों में पूछा जाना स्वाभाविक है। पलायन तो देश के ज्यादातर इलाकों की पहचान बन चुका है, उसमें बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड (दिल्ली में पूरबिए) से अलग-अलग जगहों पर पलायन आज भी जारी है। पाकिस्तान और उत्तराखंड का विभाजन होने के बाद वहां से लोगों के जगह-जगह पलायन करके जाने और अपनी जगह बनाने के ज्यादातर प्रयास अब पूरे हो गए हैं। देश के बाकी राज्यों से भी पलायन का सिलसिला चलता रहता है, लेकिन पूरबियों का पलायन खबरों में रहा है।

दुनिया के साथ-साथ अपने देश में कोरोना महामारी के प्रकोप ने 1918 के स्पेनिश फ्लू से अधिक भयावह हालात बना दिए हैं। इस साल मार्च में महामारी के प्रसार को रोकने के लिए की गई पूर्णबंदी के दौरान उलटा महानगरों से गांवों की ओर पलायन शुरू हुआ। लोग परिवार समेत जो साधन मिला उससे अपने गांव की ओर चल पड़े। जिन्हें साधन नहीं मिला, उन्होंने पैदल ही सैकड़ों मील रास्ते पार किए। इस गांव वापसी ने जाति, धर्म, प्रदेश के भेद मिटा दिए। सरकारें बेबस दिखने लगीं। महामारी से हट कर सभी का ध्यान पलायन पर गया। इस गांव वापसी पर राजनीति भी खूब हुई।

हालांकि गांव वापसी देश के ज्यादातर राज्यों के मूल निवासियों ने की, लेकिन इस चर्चा में दिल्ली में पूरबिया कहे जाने वाले लोग अधिक रहे। संयोग से मई-जून के महीने में जब लोग महानगरों से अपने गांवों की तरफ लौट रहे थे, तब तक धान की रोपनी का समय आ गया था। मजदूर और छोटे किसान धान रोपने में व्यस्त हो गए, तो पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली आदि जगहों पर मजदूरों के लिए हाहाकार मचने लगी। बंदी खुली तो उद्योगपतियों और बड़े किसानों ने पूरब के विभिन्न शहरों में अपने वाहन, यहां तक कि हवाई टिकट भेज कर मजदूरों को बुलाना शुरू किया। यह प्रयास मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, राजस्थान समेत अनेक राज्यों में हुआ, लेकिन चर्चा में बिहार और पूरब के राज्य रहे। कोरोना महामारी अभी खत्म नहीं हुई है, बल्कि उसका प्रसार शहरों से गांव तक हर जगह होता चला जा रहा है। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने, रोजगार बचाने और लोगों में विश्वास जमाने के लिए सरकार ने चरणबद्ध तरीके से बंदी हटानी शुरू की, तो फिर से सब कुछ खुलना शुरू हो गया।

इतने में बिहार विधानसभा चुनाव की तारीख करीब आने लगी। चुनाव की घोषणा को लेकर असमंजस बना रहा। हालांकि असामान्य परिस्थिति में संविधान के माध्यम से कोई न कोई रास्ता निकाला ही जाता, लेकिन चुनाव आयोग ने तमाम सावधानियों के साथ अट्ठाईस अक्तूबर से बिहार में विधानसभा चुनाव कराने का तय किया। इसे सफल बना कर चुनाव आयोग अगले साल पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु आदि राज्यों में भी चुनाव करवा पाएगा। आयोग को लगता होगा कि महामारी के समाप्त होने की प्रतीक्षा लंबी हो सकती है, इसलिए सरकारी तंत्र की मदद से तमाम एहतियाती उपायों के साथ चुनाव कराए जाएं। बिहार इसके लिए पैमाना बनने वाला है। अभी तो अमेरिका के चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी से उपराष्ट्रपति की उम्मीदवार बनीं भारतीय मूल की कमला हैरिस ने भी भारतीय और खासकर हिंदीभाषी मतदाताओं को मुख्यधारा में ला दिया है। चुनाव में नारे भी हिंदी में लगने लगे हैं, जबकि हैरिस का संबंध दक्षिण भारत से है।

तीन दशक पहले दिल्ली के चुनाव में यह कह कर पूरबिया मतदाताओं को महत्त्व नहीं दिया जाता था कि वे भले दिल्ली में रहते हैं, पर मतदाता तो बिहार के हैं। अब दिल्ली में तीसरी पीढ़ी के जवान होने के बाद यह सवाल नहीं उठाया जाता है, क्योंकि इन्हीं मतदाताओं के बूते कांग्रेस ने लंबे समय तक दिल्ली पर शासन किया और अब उन्हें ही आगे करके आम आदमी पार्टी (आप) दनादन चुनाव जीत रही है। यही हाल अपने देश के दूसरे महानगरों का है। अब यह सवाल अपनी जगह है कि कौन-सा पूरबिया दिल्ली, मुंबई या महानगरों का मतदाता है और कौन-सा बिहार का। आरोप यह भी लगता है कि अब भी कुछ लोग गैर-कानूनी तरीके से दोनों जगहों के मतदाता बने हैं, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या काफी कम होगी। पहले महानगरों में पूरबियों का वोट पाने के लिए बिहारी नेता महानगरों का दौरा करते थे। अब महानगरों में रहने वाले पूरबिया वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए विभिन्न दलों के नेता पूरबिया बहुल कॉलोनियों में बैठकें कर रहे हैं। यह काम बिहार में चुनाव लड़ने वाले सभी प्रमुख दल कर रहे हैं। इससे इन महानगरों में रहने वाले बिहारी नेताओं और बिहारी मतदाताओं का महत्त्व बढ़ गया है।

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