scorecardresearch

सबसे बड़ा धर्म

पर्यावरण से जुड़े बड़े-बड़े सेमिनारों और कार्यक्रमों में मैंने देखा है कि एकल उपयोग प्लास्टिक से बनी पानी की बोतलों को सामने टेबल पर रख धरती को प्लास्टिक मुक्त बनाने की योजनाओं पर विचार-विमर्श किया जाता है।

सबसे बड़ा धर्म

सरस्वती रमेश

इंसान आदतों का गुलाम होता है। हम बहुत सारी आदतें बिना सोचे-समझे बना लेते हैं और अक्सर अपनी आदतों में वह बदलाव नहीं ला पाते हैं, जिनके बारे में हमें पता होता है कि ये हमारे ही फायदे की चीज होगी। उदाहरण के लिए एक छोटी-सी घटना का जिक्र कर रही। हमारे घर की इमारत में गुरुजी का सत्संग हुआ। हर किसी को प्लास्टिक की प्लेट में समोसे परोसे गए।

डिस्पोजल यानी एक बार उपयोग के बाद फेंकने वाली कप में चाय पिलाई गई। खाना खिलाने के लिए भी डिस्पोजल प्लेट का इस्तेमाल हुआ और पैकेटबंद गिलास में पानी दिया गया। गुरु के सत्संग में उनका प्रसाद किसी को फेंकने की इजाजत नहीं है। हर किसी की प्लेट में जितना खाना मिलता है, सब खाना होगा। इसलिए सबको जरूरत मुताबिक ही परोसा जाता है। इस तरह अन्न की बबार्दी तो नहीं हुई, लेकिन एक छोटे से आयोजन में कम से कम चार बोरी कचरा निकल गया।

आयोजन करने वालों ने कचरे का ढेर अपनी आदतवश खड़ा कर दिया। हम एक बार इस्तेमाल में आने वाले प्लास्टिक के आदी हो चुके हैं। लेकिन लोगों को इस बात का भान भी नहीं कि एक धार्मिक आयोजन में अधार्मिक कार्य हुआ। सामान्य जन भी चौकेंगे कि इसमे अधार्मिक क्या हुआ। इसके जवाब के लिए हमें जानना होगा कि आज प्लास्टिक के बढ़ते प्रयोग के कारण हमारी धरती का पूरा पर्यावरण ही अंतिम अवस्था में या वेंटिलेटर पर है। ग्लोबल र्वामिंग या बढ़ते तापमान और तमाम प्रजातियों के विलुप्त होते जाना इसका प्रमाण है। ऐसी हालत में धरती पर और बोझ डालना अधार्मिक नहीं तो आखिर और क्या है!

साधारण शब्दों में धर्म का कार्य है इंसान के जीवन को बेहतर बनाना। हिंदू धर्म के अनुसार लोक-परलोक के सुखों की सिद्धि के लिए पवित्र गुणों और कर्मों को धारण और सेवा करना ही धर्म है। ऐसा माना जाता है कि धर्म मानव को मानव बनाता है। मानव को अपने ही विनाश का रास्ता नहीं दिखाता। ऐसे में धार्मिक आयोजनों में घातक कचरों का ढेर खड़ा करना न तो धार्मिक कृत्य है और न ही मानवीय।

यह सोचकर मैंने आयोजनकर्ता को सिंगल यूज पलास्टिक का इस्तेमाल करने से रोका भी। मगर वे बड़ी सहजता से टाल गए और कहा। मतलब धरती को बचाना हमारी प्राथमिकताओं में कहीं भी शामिल नहीं है। हम अनजाने ही अपनी सुख-सुविधा के लिए धरती को पीड़ा पहुंचा रहे। पक्षी, जानवर, पेड़ और धरती बोल नहीं सकते। क्या जो बोलते नहीं, उन्हें पीड़ा नहीं होती? क्या उनके बारे में सोचने की जिम्मेदारी हमारी नहीं? क्या धरती को बचाने से बड़ा कोई धर्म हो सकता है? हमारी प्रकृति हमारे धर्म से अलग कैसे है?

सब अपने आयोजन को सफल बना कर वाहवाही लूटने के बारे सोचते हैं, लेकिन आने वाली पीढ़ियों को वे कैसी दुनिया देकर जाएंगे, यह कोई नहीं सोचता। आए दिन बड़े से बड़े आयोजन होते रहते हैं और आयोजन स्थल पर घातक प्लास्टिक के जानलेवा कचरों का ढेर जमा हो जाता है। ये धार्मिक आयोजन लोगों की भलाई किए गए बताए जाते हैं। लेकिन यह कचरा असल में लोगों के लिए मौत का बुलावा है।

नीदरलैंड के वृज यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने हाल के एक अध्ययन में पाया है कि करीब 80 फीसद इंसानों के रक्त में प्लास्टिक के छोटे कण पाए गए हैं। सिर्फ रक्त ही नहीं, फेफड़ों तक पहुंच चुके हैं प्लास्टिक कण। इसके अलावा, माइक्रोप्लास्टिक एवरेस्ट के शिखर से लेकर गहरे महासागरों तक सब कुछ प्रदूषित कर रहा है। अनुमान लगाया जा सकता है कि एकल इस्तेमाल प्लास्टिक का कचरा मानव के लिए कितना घातक है।

यों बड़ी आसानी से तर्क दे दिया जाता है कि हर जगह एकल इस्तेमाल प्लास्टिक का उत्पादन और इस्तेमाल हो रहा। दुकानों में धड़ल्ले से बिक रहा। ये सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे लोगों से एक प्रश्न पूछने का मन करता है कि क्या आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं! हम सरकार से बहुत कुछ चाहते हैं, मगर सुधार की दिशा में खुद कोई पहल करने से घबराते हैं।

पर्यावरण से जुड़े बड़े-बड़े सेमिनारों और कार्यक्रमों में मैंने देखा है कि एकल उपयोग प्लास्टिक से बनी पानी की बोतलों को सामने टेबल पर रख धरती को प्लास्टिक मुक्त बनाने की योजनाओं पर विचार-विमर्श किया जाता है। इतनी सुख-सुविधाओं में जीने वाले लोग भी अपने पीने के लिए एक बोतल पानी का इंतजाम करके घर से नहीं चलते और बाहर ऐसे प्लास्टिक के बोतल का इस्तेमाल करते हैं। आखिर धरती कैसे बचेगी, जब तक आप अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सचेत नहीं होते?

हमें अपनी सोच और आदत बदलने की जरूरत है। अगर धरती को बचाना है तो धरती के बारे में सोचना होगा। सिर्फ सोचना ही नहीं, करना भी होगा। जिस तरह कुछ आयोजनों में खाने की बर्बादी को लेकर भक्तगण संवेदनशीलता दिखाते हैं उसी तरह धरती के प्रति अपना धर्म निभाना आज की सख्त जरूरत है।

पढें दुनिया मेरे आगे (Duniyamereaage News) खबरें, ताजा हिंदी समाचार (Latest Hindi News)के लिए डाउनलोड करें Hindi News App.