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दोस्ती बनाम दीवारें

अक्सर हमें ऐसे इंसान की तलाश होती है, जिससे हम अपना सुख-दुख, हर्ष-विषाद, हंसी-खुशी साझा कर सकें और अपनी इन्हीं अनकही भावनाओं को खुल कर व्यक्त करने के लिए हम सबको मित्र की जरूरत होती है।

Boy Girlसांकेतिक फोटो।

कुंदन कुमार

अक्सर हमें ऐसे इंसान की तलाश होती है, जिससे हम अपना सुख-दुख, हर्ष-विषाद, हंसी-खुशी साझा कर सकें और अपनी इन्हीं अनकही भावनाओं को खुल कर व्यक्त करने के लिए हम सबको मित्र की जरूरत होती है। सारे रिश्ते-नातेदारो में मित्रता ही एक ऐसा रिश्ता है जो एक दूसरे की संवेदनाओं और भावनाओं को समझता है और एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करता है। दरअसल, दोस्ती दो लोगों के बीच का ऐसा अनमोल रिश्ता है, जिसकी डोर भावना रूपी धागे से बंधी हुई है। खून का रिश्ता न होते हुए भी दोस्ती का रिश्ता खून के रिश्ते की बनिस्पत कुछ मामलों में ज्यादा बेहतर साबित होता है।

दोस्ती किसी से उसका धर्म, संप्रदाय, उसके लिंग या रंग-रूप या उसकी जाति देख कर नहीं होती। अगर ऐसा है तो उसे ठीक-ठीक दोस्ती कह पाना मुमकिन नहीं। यह जरूरी नहीं कि दो समान धर्म, जाति या लिंग के लोगों बीच ही दोस्ती हो, बल्कि दोस्ती किसी से भी हो सकती है। यह रिश्ता अमीरी और गरीबी के बंधनों को नहीं देखता! यहां तक कि मनुष्य और जानवरों की दोस्ती के किस्से भी हमारे यहां मशहूर रहे हैं। भारतीय सिनेमा ने अपने कलाकारों के माध्यम से समाज के सामने पशुओं और मनुष्य की मित्रता को अक्सर पर्दे पर दिखाया है। ‘हाथी मेरे साथी’ मनुष्य और जानवर की दोस्ती पर आधारित एक मशहूर हिंदी फिल्म है, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा था।

हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि रूढ़िवादी और पुरुषवादी सोच से ग्रस्त कुछ लोग ऐसे भी हैं जो दो एक लड़के और लड़की की दोस्ती को हमेशा संदेह की दृष्टि से देखते हैं। ऐसे लोग अक्सर यह दावा करते दिखाई दे जाते हैं कि एक लड़का और एक लड़की आपस में कभी दोस्त हो ही नहीं सकते। जबकि यह सच नहीं है। हालांकि पश्चिमी देशों में सह-शिक्षा और लड़के-लड़कियों की दोस्ती बहुत आम है। ये दोनों चीजें वहां के लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्स?ा है। जबकि हमारे देश में आज भी बहुतेरे ऐसे लोग हैं, जिनकी नजरों में सह-शिक्षा और लड़के-लड़कियों की दोस्ती जायज नहीं है!

हमारे देश में ही बहुतेरे जगह ऐसे लोग हैं जहां साथ में अगर लड़का और लड़की बात करते हुए या फिर साथ चलते हुए दिख गए तो उन्हें गालियां दी जाती हैं, उन पर फब्तियां कसी जाती हैं, गंदी टिप्पणियों से उनका तिरस्कार किया जाता है और कहीं उनके खिलाफ हिंसा भी की जाती है! देश में इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में भी कुछ अभिभावक अपने बच्चों को वैसे स्कूल में दाखिला दिलवाना चाहते हैं जहां लड़के एवं लड़कियां एक साथ नहीं पढ़ सकते! ऐसे अभिभावकों का मानना होता है कि सह-शिक्षा से बच्चे बिगड़ जाते हैं।

जबकि सच यह है कि जब लड़के और लड़कियां साथ में पढा़ई करते हैं तो एक दूसरे को बेहतर तरीके से समझ-बूझ सकते हैं। वे एक दूसरे की छोटी-बड़ी समस्याओं से रूबरू होते हैं! छोटे शहरों में कहीं आप किराए पर कमरा लेने जाएं और कहें कि हमें ऐसा कमरा चाहिए, जहां कभी-कभार हमारी महिला मित्र आ-जा सकें। फिर बगैर देर किए ही कमरा मालिक किराए पर कमरा देने से मना कर देता है और उस आदमी को इस नजर से देखता है, जैसे किसी महिला से दोस्ती कर उसने कोई गुनाह कर दिया है।

सही है कि लोगों के ऐसे नजरिये के पीछे उस रूढ़िवादी परंपरा का हाथ है, जिसने हमेशा महिलाओं को पुरुषों से कमतर आंका! समाज को सुधारने का दावा करने वाले संकीर्ण मानसिकता के रोग से ग्रस्त ऐसे लोग आधुनिक युग में समाज को कितना पीछे धकेल रहें हैं, शायद किसी को इस बात का अहसास भी नहीं है। अक्सर एक गलत धारणा हमारे सामने परोस दिया जाता है जिसमें यह दावा किया जाता है कि एक लड़के की बबार्दी के पीछे एक लड़की का हाथ होता है।

जबकि अपने आस-पड़ोस में झांककर देखें तो हमें ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे, जिसमें लड़के और लड़कियों की आपसी दोस्ताना जीवनशैली ने सफलता की अकल्पनीय दास्तान लिखी हैं। जान-बूझ कर ऐसे दृष्टांत को प्रचारित नहीं किया गया और लाख दबाने के बाद भी अगर एक-दो प्रसंग लोगों के सामने आ भी जाता है तो उसे अपवाद मान कर नकारने का भरसक प्रयास किया गया!

दरअसल पुरुषवादी सोच हमारे जीवन के हरेक पक्ष पर हावी होने का प्रयास करता है और शायद यही कारण है कि दो असमान लिंगों की दोस्ती ऐसे रुढ़िवादी सोच से ग्रस्त लोगों को रास नहीं आती! बदलते जमाने में इस तरह की सोच का चश्मा उतार कर स्त्रियों और पुरुषों की दोस्ती को सहज भाव से स्वीकार करना वक्त का तकाजा है।

जब संविधान और कानून लड़का और लड़की की दोस्ती को मान्यता प्रदान करता है तो फिर समाज को ऐसी दोस्ती को स्वीकारने में आखिरकार क्या समस्या हो सकती है? अगर समाज में कुछ लोगों की सोच समूचे समाज का प्रतिनिधित्व करती है तो प्रगतिशील विचारों के लोगों का फर्ज बनता है कि समाज में वह ऐसे दोस्ती को प्रोत्साहित करें। रूढ़िवादी और संकीर्ण मानसिकता पहले ही हमें बहुत नुकसान पहुंचा चुकी है। याद रखने की जरूरत है कि दोस्ती का दायरा असमानता के सभी बंधनों को खत्म कर समानता स्थापित करने का जरिया भी है।

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