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दुनिया मेरे आगे: एक भाषा का संघर्ष

हाल ही में बिहार के चंपारण में एक ई-शिलान्यास आयोजन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने भोजपुरी में ही अपने संबोधन की शुरुआत की। ऐसा वे पहले भी करते रहे हैं। हिंदी दिवस के अवसर पर वर्तमान उपराष्ट्रपति महोदय ने भी कहा था कि भाषाई विविधता हमारी सांस्कृतिक धरोहर है।

Swami Ramdev, Baba Ramdev Controversiesशिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के साथ पतंजलि आयुर्वेद के संस्थापक बाबा रामदेव।

अजीत दुबे

अभी हाल में बिहार विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने बिहार में साढ़े चार हजार से ऊपर सहायक प्राध्यापकों की भर्ती के लिए अधिसूचना जारी की है। उसमें मैथिली भाषा के लिए तैंतालीस, अंगिका के? लिए? चार और भोजपुरी के लिए महज? दो सीटों पर आवेदन मांगे गए हैं?। भोजपुरी न सिर्फ बिहार की सबसे बड़ी भाषा है, बल्कि यह हिंदी की भी सबसे बड़ी सह-भाषा है। भोजपुरी को पूरी दुनिया में बीस करोड़ से अधिक लोग बोलते हैं?। बिहार की कुल आबादी में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक है। ऐसी पृष्ठभूमि में भोजपुरी को लेकर चिंताएं गहरी होती जा रही हैं।

मॉरिशस सरकार ने 2011 में भोजपुरी भाषा को मान्यता देते हुए वहां के सभी ढाई सौ सरकारी हाई-स्कूलों में इसके पठन-पाठन की व्यवस्था की है। मॉरिशस सरकार की पहल पर ही एक सौ साठ और देशों के समर्थन से भोजपुरी गीत-गवनई को? दिसंबर, 2016 से विश्व सांस्कृतिक विरासत का दर्जा यूनेस्को द्वारा दिया गया है। पड़ोसी देश नेपाल में भी भोजपुरी प्राथमिक स्तर से पढ़ाई जा रही है। लेकिन यह आश्चर्य का विषय है कि इतनी बड़े जनसमुदाय की भाषा भोजपुरी की उच्च शिक्षा के लिए बिहार के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों में पढ़ाने की जिम्मेदारी सिर्फ दो सहायक प्रध्यापकों को होगी।?

बीते दिनों केंद्र की मौजूदा सरकार ने जिस राष्ट्रीय शिक्षा नीति को मंजूरी दी है, उसमें पांचवी कक्षा तक मातृभाषा में पढ़ाई का माध्यम रखने की बात कही गई है। वहीं विदेशी भाषाओं की पढ़ाई माध्यमिक स्तर से होगी। यह नीति ‘लोकल के लिए वोकल’, ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘भारतीयता’ पर आधारित शिक्षा देने के लक्ष्यों के साथ बनी है। मगर हम भोजपुरी, राजस्थानी जैसी अन्य भारतीय भाषाओं की उपेक्षा कर राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों को हासिल नहीं कर सकते हैं।

हाल ही में बिहार के चंपारण में एक ई-शिलान्यास आयोजन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने भोजपुरी में ही अपने संबोधन की शुरुआत की। ऐसा वे पहले भी करते रहे हैं। हिंदी दिवस के अवसर पर वर्तमान उपराष्ट्रपति महोदय ने भी कहा था कि भाषाई विविधता हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। इसको बचा कर रखने में ही सबकी भलाई है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी मातृभाषा को लेकर स्पष्टता की कमी है। एक तरफ सरकार कह रही है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में दी जाएगी और दूसरी तरफ वह भाषाओं के विकास को आठवीं अनुसूची से जोड़ कर देख रही है।

ऐसे में यह विचारणीय तथ्य है कि दोनों का एक साथ विकास भला कैसे संभव है? मातृभाषा अगर आठवीं अनुसूची के आधार पर तय होने लगेगी, तो उन भाषाओं के साथ छल और गहरा हो जाएगा, जो केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और उपेक्षा के कारण अभी तक आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं की गई हैं। महात्मा गांधी मानते थे कि मातृभाषा का स्थान कोई दूसरी भाषा नहीं ले सकती है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अपने मूल परिवेश में ही भोजपुरी, भारत सरकार की उपेक्षा की शिकार है। गौरतलब है कि 2017 में बिहार सरकार द्वारा भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता के लिए केंद्र को भेजे गए अनुशंसा प्रस्ताव पर किसी कार्रवाई की कोई जानकारी अभी तक उपलब्ध नहीं है। यह बेहद चिंताजनक है।

भूमंडलीकरण के इस दौर में विश्व के अनेक देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाने वाली एक भाषा का नाम है भोजपुरी। भाषा वैज्ञानिक प्रोफेसर जीएन देवी भोजपुरी को विश्व में सबसे तेजी से बढ़ती भाषा के तौर पर देख रहे हैं। इसके पास समृद्ध, गरिमामयी और श्रेष्ठ साहित्य की एक परंपरा है। यह पहले कैथी लिपि में लिखी जाती थी, लेकिन व्यापक राष्ट्रीय हितों को देखते हुए भोजपुरी ने अपनी लिपि के तौर पर देवनागरी को स्वीकार कर लिया है।

यह सर्वविदित तथ्य है कि भोजपुरी का पहला व्याकरण, हिंदी व्याकरण के काफी पहले तैयार कर लिया गया था। भोजपुरी आज बिहार, उत्तर प्रदेश के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है। मॉरिशस के ढाई सौ हाई स्कूलों और नेपाल के काठमांडू विश्वविद्यालय में भी इसकी पढ़ाई कराई जाती है। दुनिया के कई नामचीन विश्वविद्यालयों में भोजपुरी को लेकर उत्कृष्ट शोध हो रहे हैं?

विडंबना यह है कि आजादी के बाद कितने आश्वासन भोजपुरी मान्यता के संबंध में मिले, लेकिन कोई फलीभूत नहीं हुआ। इस पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं है कि भोजपुरी एक भाषा के तौर पर आज सशक्त और समृद्ध है। भोजपुरिया समुदाय अपनी मातृभाषा के प्रति सजगता जाहिर करता है और अपनी आने वाली पीढ़ियों को इसे सुरक्षित सौंपना चाहता है। वह चाहता है कि उसके अधिकारों को सुना जाए और उसकी मातृभाषा के अस्मिताबोध को राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जगह मिले। बीस करोड़ भोजपुरी भाषी मौजूदा सरकार कि तरफ उम्मीद की नजर से देख रहे हैं कि उनकी भाषा को? आठवीं अनुसूची में कब शामिल कर सम्मानित किया जाएगा। उनके बच्चे आखिर कब मातृभाषा में शिक्षा के अपने अधिकार को प्राप्त करेंगे।

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