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दायरों के पार

किसी के घर जाना होता है, तो मेरे लिए दो घंटे काटना भी मुश्किल हो जाता है।

मोनिका भाम्भू कलाना

अक्सर मैं एक जगह से दूसरी जगह जाती रहती हूं। एक जगह कई दिन लगातार बने रहना मेरे स्वभाव में नहीं है। किसी के घर जाना होता है, तो मेरे लिए दो घंटे काटना भी मुश्किल हो जाता है। पिछले दिनों जब घर लौटी, तो मुझे बाहर गए हुए सिर्फ दो दिन हुए थे। लेकिन वापस आकर ऐसा लगा जैसे वर्षों बाद घर लौटी हूं, क्योंकि एक ऐसा शहर छोड़ कर आई थी, जिसने मुझे जकड़ रखा था। काफी वक्त से उससे मुक्ति चाहती थी। वापस आकर लगा कि मैं उस शहर से मुक्त हो गई हूं, कुछ हल्की हो गई हूं। यह भी लगा कि मैं कुछ ठीक हो सकती हूं और कुछ दोबारा शुरू कर सकती हूं।

दरअसल, आपको कुछ भी नया शुरू करने के लिए पिछला छोड़ना पड़ता है। हालांकि मुझे बहुत सारी चीजें, जो मैं नहीं छोड़ना चाहती थी, वह भी छोड़नी पड़ी, लेकिन आगे जाने के लिए पिछला भूलना पड़ता ही है या छोड़ना पड़ता है। रेल तभी आगे बढ़ती है, जब पिछले स्टेशन और रास्तों के दृश्य पीछे छूटते हैं। छूटना जिंदगी में बहुत महत्त्वपूर्ण काम है और यह एक मजबूरी के बजाय बहुत रुचिकर काम भी हो सकता है, अगर कोई अपने ‘नास्टेल्जिया’ से ग्रस्त न हो और कुछ पीछे छोड़ने को एक कोशिश, एक प्रक्रिया के तहत देखे। किसी भी चीज को अगर पकड़ कर नहीं रखा जाए तो दुख बहुत कम हो जाएंगे, समस्याएं बहुत कम हो जाएंगी। हालांकि कई बार ऐसा होता है कि जीवन में इतना महत्त्वपूर्ण कुछ होता है कि हम उसे छोड़ नहीं पाते या छोड़ना नहीं चाहते।

अगर हमें सचमुच छोड़ने में दुविधा हो रही है और मजबूरीवश कुछ छोड़ना पड़ रहा है तो भी छोड़ने के बाद आमतौर पर हम देखते हैं कि उससे ज्यादा अच्छी परिस्थिति में हम हो सकते हैं। उससे ज्यादा उपलब्धियां हमारे पास हो सकती हैं, उससे अच्छी स्थितियां और अवसर हमारे पास हो सकते हैं और हम पहले से बहुत आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन छोड़ने के लिए जरूरी है कि हम चीजों या जिंदगी को पीछे मुड़ कर देखते रहें कि हमने अब तक जैसा भी जिया, जो कुछ किया, उसके तहत क्या प्रक्रिया रही, प्रकृति किस तरह चीजों को नियमित करती है और प्रकृति के नियम किस तरह निर्धारित होते हैं। यह सब सोचने पर कुछ भी ऐसा नहीं लगेगा कि अपने साथ गलत हो रहा है या ऐसा क्यों हो रहा है।

प्रकृति का एक विज्ञान है और इसकी एक निश्चित नियमित प्रक्रिया है, उसी के तहत सब कुछ घटित होता है। घटनाएं किसी विशेष के साथ होने से विशेष नहीं हो जातीं। घटनाएं तो घटनाएं हैं, लेकिन व्यक्ति की पकड़, उसका मोह और लगाव घटनाओं को उनके लिए विशिष्ट बना देता है। अगर हम अपने उसी नजरिए से देखें, जिस नजरिए से दूसरों की घटनाएं देखते हैं तो चीजों को समझना बहुत आसान हो जाएगा।

एक तरफ दूसरी चीज भी है कि हम जैसे अपने साथ हुई घटनाओं को देखते हैं, वैसे ही दूसरों के साथ हुई घटनाओं को देखेंगे तो संवेदना की जो मृत्यु हो रही है, उसे फिर से जीवन मिलेगा, सहानुभूति जो विरल हो गई है, वह बढ़ेगी। हमें समझ आ जाएगा कि जितना दर्द सुई चुभोने से हमें होता है, उतना ही दर्द दूसरे को भी होता है। सिर्फ इसलिए दर्द कम नहीं हो जाता कि हम सिर्फ आंखों से देख रहे हैं। आंखों से देखा हुआ सच दिल को महसूस हो, इसके लिए जरूरी है कि खुद को और दूसरे को एक ही धरातल पर रख कर हम देख सकें। हम इतनी गहराई खुद में पैदा कर सकें। इतनी स्थिरता खुद में पैदा कर सकें कि अपने और गैर का फर्क मिटा सकें।

जब हम अपने सोचने का क्षेत्र बढ़ाएंगे, तब जानेंगे कि चीजें सभी के साथ वैसे घटित हो रही हैं, जैसे हमारे साथ घटित हो रही हैं। बस उन्हें देखने का नजरिया बदलना पड़ेगा। उनको देखने का नजरिया सरल सीधा करना पड़ेगा। इतना सीधा कि अपने और दूसरों के साथ हुई घटना में फर्क नजर न आए। उतनी ही समानुभूति और संवेदना के साथ हम निरपेक्ष होकर घटनाओं को देख सकें। संवेदना इतनी हो कि लगे कि दूसरे के दर्द में भी हमें दर्द हो। हमारे दर्द में भी लगे कि नहीं, ऐसा कुछ खास नहीं है। ऐसा हो जाता है। बस यह एक प्रक्रिया विशेष है।

इससे चिपकने की जरूरत नहीं। अगर लगाव नहीं होगा, अनुरक्ति नहीं होगी, प्रेम नहीं होगा, तब मानवता कहां रहेगी। मगर यही गुण जब एक क्षेत्र में सीमित हो जाते हैं, बहुत छोटे हो जाते हैं तो यह गुण न रह कर एक मनुष्य, व्यक्तित्व और उसके गुणों की एक सीमा बन जाते हैं। उस दायरे को तोड़ने या लकीर से बाहर आने के लिए जरूरी है कि अतिरिक्त प्रयास किया जाए।

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