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दुनिया मेरे आगे: भविष्य के लिए

जिस तरह नृत्य प्रतियोगिता का परिणाम तैयार करने में उसके जूरी सदस्य ने पूरा समय लगाया, ताकि एक सही निर्णय लेकर परिणाम घोषित किया जा सके, उसी प्रकार हमारे राज्य की अदालत भी समय लगा कर सभी स्रोतों से जानकारी लेकर ही किसी नतीजे पर पहुंच सकती है और इसके लिए हम सभी को इंतजार भी करना होगा।

Author Published on: March 24, 2020 4:30 AM
नृत्य करते बच्चे। (फोटो इंडियन एक्सप्रेस)

ओवैस अहमद सिद्दीकी
हाल ही में मेरे एक दोस्त ने मुझे अपने कॉलेज की एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया। वह नृत्य प्रतियोगिता थी, जो लगभग चार घंटे चली, जिसमें अलग-अलग कॉलेजों के विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। उनमें से कुछ का प्रदर्शन काफी सराहनीय था, जिन पर दर्शकों ने जमकर तालियां भी बजाईं। प्रतियोगिता समाप्त होने पर परिणाम आने में काफी समय लगा। देरी के कारण काफी प्रतियोगी और दर्शक बिना परिणाम जाने ही वहां से चले गए। परिणाम घोषित हुआ, जिस पर कुछ प्रतियोगी खुश थे तो कुछ काफी उदास भी नजर आ रहे थे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद सभी अपने-अपने घर चले गए। प्रतियोगिता को देख कर समझ आ रहा था कि आखिर क्यों लोगों को आजकल ‘बिग बॉस’, ‘डांस इंडिया डांस’ या ‘रोडीज’ आदि रियलिटी शो अधिक पसंद हैं।

दरअसल, एक ओर ये लोगों को खुद में व्यस्त रखने में मदद करते हैं, वहीं उनका भरपूर मनोरंजन भी करते हैं। इस आयोजन में जाने के अनुभव को अगर मैं हाल ही में दिल्ली में हुई हिंसा और उसके प्रभाव को समझने के लिए करता हूं तो मौजूदा स्थिति को दो तरह की दृष्टि से देखता हूं। पहला, जिसके अनुसार दो समुदायों के कुछ लोग आपस में प्रतियोगिता कर रहे हैं। दोनों समुदाय के सहयोगी सोशल मीडिया के जरिए अपने-अपने समुदायों को बढ़ावा देने में लगे हैं।

नृत्य कार्यक्रम की तरह कुछ प्रतियोगी और दर्शकों को इसके परिणाम से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि उनका काम तो केवल उस हिंसा से मनोरंजन करना था। इसलिए अब वे वहां से निकल कर शायद अगली प्रतियोगिता की तैयारी में लग जाते हैं। जिस तरह नृत्य प्रतियोगिता का परिणाम तैयार करने में उसके जूरी सदस्य ने पूरा समय लगाया, ताकि एक सही निर्णय लेकर परिणाम घोषित किया जा सके, उसी प्रकार हमारे राज्य की अदालत भी समय लगा कर सभी स्रोतों से जानकारी लेकर ही किसी नतीजे पर पहुंच सकती है और इसके लिए हम सभी को इंतजार भी करना होगा।

दूसरी दृष्टि के मुताबिक, मुझे प्रतियोगी, दर्शक और जज इनमें कोई खास फर्क नजर नहीं आता, क्योंकि हिंसा जिस प्रकार एक भयावह रूप ले लेती है, ऐसा लगता ही नहीं है कि हिंसा की यह प्रतियोगिता कोई और कर रहा है, कोई दूसरा इस प्रतियोगिता का दर्शक है और इसे सही या गलत बताने वाला कोई और है। ऐसा लगता है कि किसी न किसी रूप में, चाहे वह दफ्तर में अपने सहकर्मियों के साथ खाने पर होने वाली बात ही क्यों न हो, हम खुद ही इसके प्रतियोगी बन गए हैं। फिर इसे अपने जैसों के साथ उस पर खुश या उदास होकर बांटने वाले दर्शक भी हम ही हैं।

फिर अगर मैं इन दोनों दृष्टि से आजाद होता हूं तो महसूस होता है कि यह कोई ‘शो’ नहीं है, यह सिर्फ ‘रियलिटी’ यानी हकीकत है जो इन दिनों हम सबके साथ बीत रहा है और जिसका दोष हम किसी खास नेता, घटना या व्यवहार पर लगा रहे हैं। वह चंद दिनों, महीनों या सालों की नफरत नहीं है किसी समुदाय के प्रति, बल्कि इसके पीछे हमारे दैनिक जीवन में होने वाली कई छोटी-छोटी चीजें हैं, जिन पर हम कभी ध्यान भी नहीं देते और ये चीजें धीरे-धीरे हम सभी के दिमाग में संचय होती रहती हैं। इस नफरत के पीछे वह हर एक फिल्म जिम्मेदार है, जिसमें किसी खास समुदाय या जाति या जनजाति को हिंसक और रूढ़िवादी रूप में प्रदर्शित करके लोगों के मन में उनकी बुरी छवि बनाई जाती है।

इसके पीछे वे सभी टीवी चैनल जिम्मेदार हैं जो हर घटना का ब्योरा देते हुए बार-बार जनता से कहते हैं कि ‘सच आपके सामने है और फैसला आपको ही करना है कि क्या सही है और क्या गलत’! उनके ये शब्द घटना के तुरंत बाद प्रयोग किए जाते हैं। वह भी बिना किसी जांच-पड़ताल और अदालत से उसका फैसला आने से भी पहले। इस नफरत के लिए वे निजी कंपनियां भी जिम्मेदार हैं जिन्होंने करोड़ों की जनसंख्या को मुफ्त में फोन और इंटरनेट सेवाएं बांटी हैं, जिसके परिणामस्वरूप कोई भी व्यक्ति बस एक क्लिक पर अपना यूट्यूब चैनल खोल कर प्रत्यक्ष रूप से सभी को सही और गलत का फैसला लेने के लिए उकसा रहा है।

इन सभी छोटे-छोटे बदलावों के बीच सबसे बड़े जिम्मेदार हम खुद हैं, जिन्होंने ऐसी घटनाओं के बारे में सोचना बंद कर दिया है कि आखिर ऐसा क्यों किया जा रहा हैै! आखिर क्यों हमने अपने हर फैसले से पहले अपनी आने वाली पीढ़ियों और समाज पर उसके असर के बारे में सोचना बंद कर दिया है? मैं मानता हूं कि जो गलत है, उसे गलत कहना जरूरी है और दोषी को कड़ी सजा देना भी जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है पहले उस गलत को पहचानना जो किसी एक स्रोत से मिली जानकारी से नहीं हो सकता और न ही चुटकी बजाते ही हो सकता है। उसके लिए हम सभी को संयम बरतने की जरूरत है और जरूरत है एक दूसरे पर भरोसे की, क्योंकि कुछ गलत किसी भी शक्ल में भी हो सकता है।

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