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दुनिया मेरे आगे: मशीन बनता मनुष्य

आज की दौड़ती-भागती दुनिया में कहां सुकून है! जिधर देखिए, उधर लोग भाग रहे हैं। कोई कहीं रुकता नहीं। रुकने की जगह पर भी भागता रहता है। भागना एक मुहावरा बन चुका है। लेकिन किसी को पता नहीं कि क्यों भाग रहे हैं!
Author April 9, 2018 02:23 am
हमेशा अपने आपको गति की दुनिया में झोंके रहना ठीक नहीं है। यह धीरे-धीरे मशीन बना डालती है।

विवेक कुमार मिश्र

आज की दौड़ती-भागती दुनिया में कहां सुकून है! जिधर देखिए, उधर लोग भाग रहे हैं। कोई कहीं रुकता नहीं। रुकने की जगह पर भी भागता रहता है। भागना एक मुहावरा बन चुका है। लेकिन किसी को पता नहीं कि क्यों भाग रहे हैं! पदार्थमय संसार में हर किसी को पदार्थ से इतना मोह है कि उसे पदार्थ के अलावा कुछ और न तो दिखता है, न देखना चाहता है। चारों तरफ एक हड़बड़ी का संसार बन जाता है। कहीं कुछ भी धैर्य के साथ नहीं है। बस भागम-भाग मची है।

इस स्थिति में जीवन को समझना और जीवन को जीने का एक जरिया देने की जरूरत है। जीवन का दृश्य घर से लेकर सड़क तक दिखता रहता है। अर्थ की दौड़ में भागती दुनिया सड़क पर दिखती रहती है, जिससे जीवन के उन तमाम सूत्रों को समझने में मदद मिलती है, जीवन आसान होता है। संसार को जानने-समझने के लिए हमें बार-बार सड़क पर आना पड़ता है। सड़क पर दौड़ती-भागती जिंदगी में जीवन के सूत्र मिल जाते हैं। ये सूत्र हमारे परिवेश से सीधे निकल कर आते हैं। किसी सड़क पर जन संकुल का रेला हो और सब अपनी गति से चले जा रहे हों, कहीं कोई हो-हल्ला न हो तो यह समझ में आता है कि लोगबाग शांत और अपनी स्थिति में जीवन को जीते हुए रह रहे हैं। वहीं एक दृश्य यह भी बनता है कि सड़क पर जन संकुल का रेला भले न हो तो भी बेतरतीब तरीके से लोग आ जा रहे हों तो तय है कि इन्हें कहीं नहीं जाना है। इनके पास भरपूर समय हो तो भी हर समय हड़बड़ी में रहते हैं। यह दीगर है कि हड़बड़ी में जीवन मिलता नहीं। खुशी के लिए पदार्थ से ज्यादा मन की जरूरत होती है। अपने आसपास के संसार को स्वीकार कर ही खुश रहा जा सकता है। यह तभी संभव है जब आप जीवन को जीएं… जीना सीखें। आसपास के संसार को देखें-जानें, स्वीकार करें। कभी पल भर रुक कर देखें, सोचें, फिर चलें।

हमेशा अपने आपको गति की दुनिया में झोंके रहना ठीक नहीं है। यह धीरे-धीरे मशीन बना डालती है। आदमी का मशीन हो जाना आज के दौर की सबसे बड़ी घटना बनती जा रही है। यह एक तरह का हादसा है, इससे मुक्ति तभी मिलेगी, जब मनुष्य की तरह बैठें, बातें करें, सुख-दुख से भरी दुनिया को जीएं। घड़ी-दो घड़ी आसपास की प्रकृति को निहारें। सामने खडेÞ आदमी से बातचीत करें, न कि यंत्र में खो जाएं। लेकिन देखता हूं कि लोगबाग अब जीवन को भी मशीन बना डालने पर आमादा हो गए हैं। यांत्रिकता जब हमारा स्वभाव बन जाती है तो न केवल हमारे लिए, बल्कि पूरे परिवेश, समाज और संस्कृति के लिए एक खतरा उपस्थित हो जाता है। हम सब हर बात की कीमत लगाते हैं, पर खुद के होने की, मनुष्य होने की निर्मिति की, सहज रह पाने की कीमत छोड़ कर भागते रहते हैं। इस कदर भागते हैं कि जान पर खतरा हो तो वह भी नहीं दिखता, क्योंकि यंत्र के साथ यंत्र हो रहे आदमी को कुछ नहीं दिखता, न आगे, न पीछे, न बाएं, न दाएं!

वह लाल बत्ती पर ड्राइविंग सीट पर बैठ कर खुद को अद्यतन कर रहा है। आज मोबाइल पर एक चलता-फिरता संसार हमारे साथ होता है। इसी संसार को देखने के लिए आदमी लाल बत्ती पर जो समय मिलता है, उसी में संसार और संसार की खबरों को देखते-देखते खो जाता है। उसे मालूम नहीं कि कब लाल बत्ती हरी हो गई। कब वाहनों का रेला पीछे आकर हॉर्न बजा रहा है… एक शोर मच जाता है… तब जाकर तंद्रा टूटती है तो महाशय आगे बढ़ते हैं। अब कौन समझाए कि इस तरह के महाशयों के चक्कर में हादसे हो जाते हैं। ऐसे भी समय की कौन-सी कमी है, लेकिन आदमी इस कदर यंत्र बनता जा रहा है कि किससे कहा जाए, क्या कहा जाए! मगर इतनी हड़बड़ी भी ठीक नहीं। मशीन के पीछे इतना भी क्या भागना कि मशीन ही बाकी रहे, इंसान नहीं।

तो इंसान को बचाने के लिए जरूरी है कि इंसान को इंसान की तरह बताया जाए कि आप इंसान हैं, यंत्र नहीं हैं… न यंत्र बनने की कोशिश कीजिए। यंत्र आपको चलाने लगे, इतनी दीवानगी ठीक नहीं है। ऐसे यंत्रीकृत समय से आदमी को निकालना ही इस समय की बड़ी चेतना है। यह एक तरह से मनुष्य की जीत पर भरोसे का पर्याय होगा। यंत्र का कोई दोष नहीं है। लोगबाग यंत्र में इस कदर डूब गए हैं कि ऐसा लगता है कि यंत्र नहीं तो जिंदगी नहीं। जहां रुकना है, वहीं आदमी तरंगों की गति पर सवार होकर नाचने-गाने लगता है। जहां पहिया रुक जाता है, वहीं आदमी चल पड़ता- यंत्र के साथ एक दूसरी दुनिया में भागने लगता है, यह यंत्र जिंदगी को कहीं का नहीं छोड़ता। भागती-दौड़ती जिंदगी के इस नशे में आदमी कितना बचा है, इसे ढूंढ़ने की जरूरत है।

 

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