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श्रम का सौंदर्य

हर रोज जब उसे यों ही लिफ्ट में बैठा हुआ देखता हूं तो मन विचलित हो जाता है कि आखिर कोई व्यक्ति कैसे इतना नीरस काम लगातार किए जा रहा होगा। धीमे स्वर में संगीत की रोजाना वही..

Author नई दिल्ली | November 2, 2015 21:43 pm

हर रोज जब उसे यों ही लिफ्ट में बैठा हुआ देखता हूं तो मन विचलित हो जाता है कि आखिर कोई व्यक्ति कैसे इतना नीरस काम लगातार किए जा रहा होगा। धीमे स्वर में संगीत की रोजाना वही एक-सी धुन, सालों पुरानी फटी गद्दे वाली छोटी-सी कुर्सी, जिस पर पीठ भी टिकाने की व्यवस्था नहीं है। उसी पर चुपचाप लिफ्ट के कोने में बैठ कर दो या तीन या फिर कोई और तल पर जाने वालों के लिए लिफ्ट का बटन दबाना, हर रोज लिफ्ट में चढ़ने वाले उन्हीं कुछ लोगों से कुछ सेकेंड की बातचीत और बीच में कभी गुनगुना लेना। इसके बाद फिर वही निचले तल से सबसे ऊपर वाले फ्लोर तक की यात्रा। यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है। दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में अक्सर बहुमंजिली इमारतों में ऐसे लोगों को काम करते देखा जा सकता है।

कई बार सोचता हूं कि उसकी जिंदगी एक छोटी-सी लिफ्ट में कैद होकर रह गई है। उसे शायद घुटन भी होती होगी। ऐसा भी काम क्या करना! इससे ज्यादा ऊब पैदा करने वाला काम कोई और क्या होगा! कई बार इस संदर्भ में उनसे बात करने की कोशिश भी की, लेकिन नहीं पूछ सका। कारण यह रहा कि उस व्यक्ति के चेहरे को पढ़ कर कभी ऐसा नहीं लगा कि इस मसले पर वास्तव में उसे भी ऐसा महसूस होता है, जैसा मुझे। एक संतोष का भाव दिखता है उसके चेहरे पर, मानो उसे इस काम को करने में मजा आता हो… श्रम के इसी साधन से उसे सुख मिलता हो! संभव है कि आता भी हो!

दरअसल, मेरे मन में ये भाव इसलिए आए कि हमने श्रम का सोपानीकरण कर रखा है। यानी यह काम श्रेष्ठ है और फलां काम निकृष्ट। ऐसा ही हम आमतौर पर अपने समाज से सीखते हैं। बचपन से हम ऐसा सुनते आते हैं कि यह काम अच्छा है और यह बुरा। फिर इसी के अनुरूप हमारी राय बननी स्वाभाविक ही है। हमने श्रम के सौंदर्य को बहुत संकीर्ण बना दिया है। ऐसा नहीं है कि भारत से इतर समाजों में ऐसा नहीं है, लेकिन भारत में श्रम के साधनों में विभेदीकरण की समस्या कुछ अधिक ही है। अपने आसपास इसे आसानी से खोजा जा सकता है। उदाहरण के लिए अक्सर हम विरोध प्रदर्शन के लिए जूता पॉलिश या फिर झाड़ू देने जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल करने लगते हैं, मानो ये निम्नतर कार्य हों।

जब हम विरोध के लिए ऐसे प्रतीकों को चुनते हैं तब शायद भूल जाते हैं कि यह एक तरह से उन सभी लोगों और समुदायों का अपमान है जो ऐसे पेशों से जुड़े होते हैं। या फिर हम यह जताने की कोशिश करते हैं कि ऐसे कार्यों का संबंध कम प्रतिभा से है। किन्हीं हालात में ऐसा हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई श्रम निम्नतर या श्रेष्ठतर हो जाएगा। ऐसा सोचते हुए क्या हम किसी समुदाय के बीच इस कथित ‘कम प्रतिभा’ की वजहों के बारे में भी कभी विचार करते हैं? क्या हम उन कारणों की पहचान कर पाते हैं, जिनके चलते वे पीछे छूट गए? क्या इसमें हमारी भी कोई भूमिका है?

हरेक श्रम का अपना महत्त्व है और इसका अनुपम सौंदर्य है। सबसे बढ़ कर श्रम के विविध स्वरूपों का सम्मान इसलिए भी आवश्यक है कि यह समानता को बढ़ावा देता है। जैसे अलग-अलग विशेषताओं से युक्त होने के बाद भी हर व्यक्ति समान है, उसी तरह अपनी विधा में अलग होते हुए भी हरेक श्रम समान है। इसमें विभेदीकरण न केवल मानव की गरिमा को कम करता है, बल्कि ऐसे सामाजिक परिवेश का भी निर्माण कर देता है जहां किसी व्यक्ति के बारे में हम अनेक प्रकार के दुराग्रह सिर्फ इसलिए पाल बैठते हैं कि वह किसी पेशा-विशेष से जुड़ा होता है। फिर इसकी अभिव्यक्ति गाहे-बगाहे हम बातचीत और व्यवहार में करते रहते हैं।

कहानी लिखना और जूता पॉलिश करना- ये दो अलग-अलग प्रकार के काम जरूर हैं और इनका महत्त्व अलग-अलग है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम दो प्रकार के श्रम साधनों के बीच सोपान स्थापित कर दें। बहुत संभव है कि दोनों पेशों से जुड़े लोगों को अपने-अपने कार्य की स्थितियां सामाजिक सुविधा या अभाव से मिली हों। विविधता मानव जीवन का आधार स्तंभ है, लेकिन काम के प्रकार का बंटवारा समुदाय विशेष के आधार पर नहीं होना चाहिए। कोई भी व्यक्ति कोई काम सहजता से करे, यही मानव विकास की निशानी होगी।

एक सच्चे नागरिक की हैसियत से हमारा यह दायित्व है कि हम सबके लिए एक अच्छे वातावरण का निर्माण करें, ताकि हर प्रकार के श्रम का सौंदर्य निखर सके। (सन्नी कुमार)

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