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बरसो रे मेघा बरसो

मेघ तुम बरसना चाहते हो, तो सलीके से बरसना। गंवारों जैसे हुड़दंग करते हुए नहीं।

सांकेतिक फोटो।

सरस्वती रमेश

बाहर मेघ बरस रहा है। आंगन में बूंदें थिरक रही हैं। पानी सांप की तरह दौड़ रहा है। जैसे गौने से लौटी बेटी नैहर देख हुलस पड़ती है। मेघ भी हुलस-हुलस बरस रहा है। नदियों से आलिंगन करने को छटपटा रहा। पोखर, ताल, गढ़हे गड््ढे से मिलने को अधीर हो रहा। जहां-जहां है बरसाती पानी का ठिकाना, अपना ठौर खोज रहा है।

शहर के रहने वालों ने समझाया, ‘रुको। आए हो तो कुछ दिन आराम करो। इतनी जल्दी भी क्या है। बरस लेना बाद में।’ पर पानी नादान है। बिल्कुल नादान। अनाड़ी फिल्म के रामा की तरह। बूंदों का लाव-लश्कर ले दौड़ा जा रहा है। नदियों को पानीदार करने चल पड़ा है। तालाबों को भरने, पोखर, ताल गड््ढे सबको पानीमय करने। कुछ पानी धरती के पेट में भी पहुंचाने को लालायित है। ताकि साल भर जीव-जंतु, इंसान, पक्षी, कीट फतिंगे, किसी को पानी की कमी न हो। वह तो गंदले केचुओं तक को नहीं बिसारता। उनके रहने के लिए मिट््टी में भरपूर नमी उड़ेल जाता है। नन्हे जुगनुओं के लिए जंगल झाड़ियों को साल भर के लिए सिंचित कर जाता है।

पर उसे पता नहीं कुछ। अब तो यहां सब कुछ बदल गया है। जैसे बेटी के विदा होते ही उसके नैहर में मां-बाप के स्नेह के सिवा कुछ नहीं बचता। बरसाती पानी भी नए बने स्मार्ट सिटी के लिए गैर हो गया है। स्नेह है, मगर दूर का। दूर से ही दुआ सलाम, राम-राम। अब लोग सभ्य हो चुके हैं। उन्हें अपने पैरों में जरा भी मिट््टी लगना बर्दाश्त नहीं। बरसाती कीचड़-कादो भला कैसे सहन कर पाएंगे।

मेघ तुम बरसना चाहते हो, तो सलीके से बरसना। गंवारों जैसे हुड़दंग करते हुए नहीं। पढ़े-लिखे स्मार्ट बंदों की तरह व्यवहार करना। अगर नहीं, तो फिर लौट ही जाओ। देखो, ‘प्रेम रोग’ की नायिका गा रही है- ये गलियां ये चौबारा, यहां आना ना दोबारा… कि तेरा यहां कोई नहीं…।
मेघ, जहां छह-छह माह रुकता था, दादुर के संग उछलता- खेलता था, बकुलों का पेट भरता था, बत्तखों संग तैरता था, कमलिनियों संग जागता-सोता और हिरनों की प्यास बुझाता था, वहां अब आलीशान इमारतें बन गई हैं। चमचमाती, सुविधा संपन्न और ठोस।

इस ठोस को तरल से भला क्या प्रयोजन हो सकता है। आकाश और धरती छीन ली गई है। मेघ को बेघर करके छोड़ दिया गया है। लोग भूल गए हैं कि मेघ के आगमन पर वे कजरी गाकर हर्ष मनाते थे। झूम कर झूलते थे। तालाबों, पोखरों को पूजते थे। खेतों को सींचते और वर्षा ऋतु को अपने हृदय में स्थान देते थे। मेघ की पहली बूंद से संपर्क होते ही मिट््टी सुगंधित हो उठती थी। मगर वे दिन बीत चुके हैं। मेघ का रत्ती भर भी खयाल इंसानों को न रहा। किसी को फिक्र नहीं कि मेघ साल भर बाद आएगा तो कहां ठहरेगा। बूंदें कहां पड़ाव डालेंगी। बच्चे कहां कागज की नाव चलाएंगे और जानवर कहां नहाने जाएंगे।

अब जमीन तो पैर रखने भर की कहीं दिखाई नहीं देती। हर जगह बेसमेंट बने हैं। पार्किंग है। काम्प्लेक्स है। मयखाना है। जिमखाना है। बैंक है। सब कुछ बन चुका है। नगर का चहुंमुखी विकास हो चुका है। अब यहां किसी को मेघ की दरकार नहीं। अच्छा हो मेघ लौट जाए। किसी अनजाने देश में। जहां अब भी अग्नि, जल, मिट््टी, हवा और आकाश के सान्निध्य में लोग रहना पसंद करते हों।

मगर मेघ बुड़बक है। एकदम बुड़बक। जो बूंदों का झुंड लिए इधर-उधर भटक रहा है। अरे, यह स्मार्ट सिटी है। यहां हर ओर पक्की सड़कें बनी हैं। गगनचुंबी इमारतें बनी हैं। पक्की नालियां हैं। स्विमिंग पूल हैं। मल्टी स्टोरी पार्किंग हैं। नदी, तालाब, गड्ढे, बावड़ियां न जाने ये किस जमाने की बात होकर रह गई हैं। यहां पानी की टंकी हर वक्त लबालब रहती है। बस मोटर का बटन दबाया और मोटी धार में पानी हांफता हुआ हाजिर हो जाता है। दुकानों पर इफरात पानी की बोतलें मिलती हैं। जितनी मर्जी उतनी खरीद लो। जाने किस दुनिया के लोग हैं, जो एक एक बूंद पानी का रोना रोते हैं।

अरे घर में पानी नहीं तो बाजार से खरीद लो। मगर हम जैसे कुछ बोल रहे हैं- मेघ अब रुक जाओ। यहां तुम्हारी दरकार नहीं है, कहीं और जाकर बरसो। मगर मेघ कहां सुनने वाला है। साल भर बाद लौटा है। खुशी से झूम रहा है। गरज गरज कर बरस रहा है। सड़कें डूबती जा रही हैं। तलघर भरते जा रहे हैं। नालियां उफन चुकी हैं। मगर मेघ खुशी के मारे घरों में घुसा जा रहा है। राह चलते लोग हलकान हैं। गलियों में रहने वाले परेशान हैं। मगर बच्चे छतों पर कूद रहे हैं। बारिश में ‘रेन डांस’ कर रहे हैं। बरसो और तेज बरसो मेघ। हमारी खोखली, पथरीली, अहसानफरामोश, असंवेदनशील स्मार्ट सिटी पर खूब बरसो। तुम्हारा स्वागत है।

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