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छवि के बरक्स बनारस

यों ही नहीं कहते कि बनारस में रस घुला है। मस्ती, अल्फाजों में ‘गुरु’ और ‘राजा’ का संबोधन, तारीफ भी गालियों से करना, चाय की दुकान पर एंजलीना जॉली से लेकर मिशेल ओबामा तक की बतकही एक साथ शायद बनारस में ही संभव है।

Author Published on: August 27, 2015 10:10 AM
छवि के बरक्स बनारस

यों ही नहीं कहते कि बनारस में रस घुला है। मस्ती, अल्फाजों में ‘गुरु’ और ‘राजा’ का संबोधन, तारीफ भी गालियों से करना, चाय की दुकान पर एंजलीना जॉली से लेकर मिशेल ओबामा तक की बतकही एक साथ शायद बनारस में ही संभव है। बाबा के धाम में उनके भक्तों का तांता और बाबा विश्वनाथ तक पहुंचने की तंग गलियां- सभी एक अलग-सी अनुभूति देते हैं। घाटों की शांति और गंगा की धारा का सुकून सारी परेशानियों को निगल जाता है, क्योंकि यहां आकर हर शख्स पिघल जाता है।

बनारस के इसी अल्हड़पन और रस की चर्चा दुनिया में हुई, यहां तक कि कई फिल्में भी बनीं इस पर। लेकिन अब हो यह रहा है कि फिल्मों के जरिए बनारस के अल्हड़पन को शायद फूहड़पन के रूप में दुनिया के सामने परोसा जा रहा है। लोग यह कहने लगे हैं कि क्या यह बनारस की संस्कृति को कलंकित करने की कोशिश नहीं है! यों बहुत संक्षेप में बनारस में ‘अस्सी’ को परिभाषित किया जाए तो यह इस शहर का ऐसा मोहल्ला है जो गंगा के किनारे बसा है।

विदेशी सैलानी से लेकर अध्ययन-अध्यापन करने वाले विद्यार्थी, पंडित-पुरोहितों की बहुतायत संख्या इस इलाके में रहती है। विवाद यह नहीं कि बनारस की आम जिंदगी की बोलचाल में गालियों को बनारस की एक पहचान के तौर पर पेश किया जाता है। बल्कि इस बहाने अगर यहां की छवि को गलत ढंग से प्रचारित किया जाएगा तो बनारस के बाशिंदों और यहां की संस्कृति को ठीक से समझने वालों को दुख तो होगा!

किसी नकारात्मक प्रवृत्ति पर सवाल उठाना ठीक है, लेकिन इसके बहाने वास्तविकता के साथ खिलवाड़ को कितना उचित माना जाए! बनारस देश के दूसरे हिस्सों के साथ-साथ विदेशी सैलानियों के लिए भी एक आकर्षक पर्यटन स्थल है। उनके भीतर बनारस की कैसी छवि बनेगी!

कभी अगर होली के मौके पर बनारस के घाटों का रुख किया जाए तो वहां जगह-जगह जमावड़ा दिखेगा कवि मंडलियों का। उनके गीतों में राजनीति, फिल्म तात्कालिक घटनाएं आदि सभी का समावेश होता है। बाबा से बनारस और बनारसियों के संबंध पर भी कई गीत प्रस्तुत होते है, जिनमें गाली-गलौज से लैस शब्दों का भी इस्तेमाल होता है।

लेकिन यह सब सहज माना जाता है, क्योंकि बनारसियों का ऐसा मानना है कि बाबा विश्वनाथ तो उनके घर के हैं, अपने हैं। पर यही अगर दूसरे नकारात्मक पहलू के साथ दुनिया के सामने रखा जाए तो जो लोग बनारस की संस्कृति से वाकिफ नहीं हैं, उन्हें यह गलत भी लग सकता है।

बनारस का एक बहुत चर्चित वाकया है। पीतल की मूर्तियों का बड़ा कारोबार बनारस में होता है और सैलानी कहीं का भी हो, उसे अंगरेज ही कहते हैं। एक बार कोई विदेशी सैलानी एक दुकान में पहुंचा और जाते ही उसने अंगरेजी में कहा- ‘आई वांट स्टेचू ऑफ मंकी गॉड!’ बनारसी दुकानदार ने उसे घूरा, एक बार और मौका दिया कि वह अपने बोल वापस ले ले, सुधार ले। उस दुकानदार ने आंखों से और सिर हिलाते हुए पूछा कि क्या चाहिए! फिर अंगरेज ने वही दोहराया।

बनारसी दुकानदार का दिमाग घूमा, दुकान से उतरा और बनारस की मोटी गालियों के साथ उसकी धुनाई कर दी। मामला थाने तक पहुंचा, माफी भी मांगी गई, दुकानदार की तरफ से नहीं, बल्कि अंगरेज की तरफ से और बाद में दुकानदार ने टूटी-फूटी अंगरेजी में उसे समझाया कि हम इन्हें पूजते हैं। हनुमानजी हमारे देवता हैं। और आप यकीन कीजिए, उस दुकानदार ने बिना पैसे के पीतल की मूर्ति उस अंगरेज को दी और पान भी खिलाया। आज भी वह अंगरेज सैलानी हर साल आता है और उस दुकान पर भी जाता है। कुछ ले या न ले, पर बनारस का रस साथ ले जाता है।

तो कुछ ऐसा है बनारस! इसी वाकये को पेश करने में अगर चूक हो तो वे सैलानी, जो साल भर बनारस की जमीन पर आते-जाते रहते हैं, उन पर क्या असर होगा और उनकी नजरों में बनारस की छवि कैसी होगी? संस्कृति के अपने संदर्भ होते हैं। जीवनशैली में घुली या रची-बसी बातें और व्यवहार एक लंबी प्रक्रिया और रोजमर्रा की जरूरतों से विकसित होता है। लेकिन बिना उसकी बुनियाद को समझे इन पहलुओं को गलत तरीके से पेश किया जाना उचित नहीं है।

बनारस में एक खास तरह का अल्हड़पन है, जो इसे दूसरे शहरों से अलग करता है। लेकिन अगर इसे फूहड़पन की नजरों से देखा जाएगा तो बनारसियों को दर्द होगा! कहते हैं, जहां का खाक भी है पारस, ऐसा शहर है बनारस! तो सौ बात की एक बात कि बनारस के रस का स्वाद लिया जाए, नमक-मिर्च मिला कर उसके स्वाद से खिलवाड़ नहीं किया जाए!

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